Bank Fraud: डेयरी सब्सिडी के लिए रातोंरात बकरियां बना दी गईं भैंस, किसानों के पैसे हड़पने का नया खेल!

सब्सिडी हड़पने के लिए बैंक में हुआ अनोखा फ्रॉड!  (Image credit: Twitter)
सब्सिडी हड़पने के लिए बैंक में हुआ अनोखा फ्रॉड! (Image credit: Twitter)

किसानों और पशुपालकों को मिलने वाली नाबार्ड की सब्सिडी का गलत तरीके से लाभ लेने के लिए सर्व हरियाणा ग्रामीण बैंक के अधिकारियों ने फाइलों पर बकरियों को भैंस के रूप में बदल दिया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 13, 2020, 8:53 AM IST
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नई दिल्ली. बैंकिंग सिस्टम के करप्ट अधिकारी किसानों (Farmers) और पशुपालकों के नाम पर आने वाले पैसे को डकारने का नया खेल खेलने लग गए हैं. पशुपालकों के लिए केंद्र सरकार द्वारा जारी पैसे के बंदरबांट का एक अनोखा मामला हरियाणा में सामने आया है. विजिलेंस और ऑडिट रिपोर्ट (Audit Report) में सब्सिडी के गोलमाल के इस नए पैटर्न का पता चला है. जिसमें रातोंरात बकरियों को भैंस में बदल दिया गया. मामला सर्व हरियाणा ग्रामीण बैंक (Sarva Haryana Gramin Bank) से जुड़ा हुआ है. जिसमें राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की सब्सिडी हड़प ली गई है. यह केस साल 2012 से 2015 के बीच का है, जिसमें भ्रष्टाचार की फाइल के पन्ने अब खुले हैं.

ग्रामीण बैंक (Bank) अधिकारी संगठन और गुड़गांव ग्रामीण बैंक श्रमिक संगठन के चीफ कॉर्डिनेटर मुकेश जोशी ने इस मामले में सीबीआई (CBI) को पत्र लिखकर जांच की मांग की है. जोशी ने इससे जुड़े कागजी साक्ष्य भी सार्वजनिक कर दिए हैं. फिलहाल, बैंक की दो शाखा में ऐसे केस हुए हैं. उन्होंने दावा किया कि अगर बैंक की लगभग 650 ब्रांचों की निष्पक्ष तरीके से जांच हो तो फिर किसानों के नाम पर आई अरबों रुपये की रकम का घोटाला सामने आएगा.

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मुकेश जोशी ने सार्वजनिक की लोन लेने में अनियमितता की रिपोर्ट




जोशी ने बताया कि इस बैंक की दो शाखाओं रनिया और केहवाला (सिरसा) में 7 करोड़ रुपये के 45 लोन बांटे गए और उसमें अवैध तरीके से करीब ढाई करोड़ की नाबार्ड (NABARD) की सब्सिडी ले ली गई. इसकी एक शिकायत हुई. बैंक के विजिलेंस ऑफिसर ने इस मामले की जांच की. कुछ अधिकारियों को बचाने के लिए जांच में कई खामियां छोड़ दी गईं. 400 बकरियां और 20 बकरों की खरीद आदि के लिए 20 लाख का प्रोजेक्ट देकर ऋण लिया गया. सब्सिडी के लिए क्लेम भेजा गया लेकिन क्लेम रिजेक्ट हो गया क्योंकि बकरियों के लोन पर सब्सिडी नहीं है.
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हेल्थ सर्टिफिकेट भी फर्जी लगाया! 

बताया गया कि डेयरी का लोन है तभी सब्सिडी (Subsidy) का लाभ मिल पाएगा. फिर बैंक अधिकारियों ने बकरियों को भैंस के रूप में कन्वर्ट करने में देर नहीं लगाई. जांच अधिकारी ने यह भी पाया कि पशुओं का हेल्थ सर्टिफिकेट (Health Certificate) भी फर्जी हैं और जीवन नगर में तो कोई पशु हॉस्पिटल ही नहीं है, जहां के सर्टिफिकेट लगाए हैं. ऑडिट रिपोर्ट में ऐसी अनियमितताएं सामने आने के बाद भी करोड़ों की सब्सिडी की जांच ठंडे बस्ते में डाल दी गई और अधिकारी लपेटे में आने से बच गए. ग्रामीणों की सेवा के उद्देश्य से बनाए गए इस बैंक में भ्रष्ट प्रबंधन के कारण सरकार को अरबों रुपये की हानि हो रही है. साथ ही जिन उद्देश्यों के लिए ये बैंक सृजित किया गया था उन उद्देश्यों की पूर्ति भी नहीं हो पा रही है.

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जांच रिपोर्ट में सामने आई गड़बड़ी


नाबार्ड पर भी इसलिए उठाए जा रहे हैं सवाल

दिलचस्प बात यह है कि ऑडिट रिपोर्ट में खुलासा होने के बाद भी नाबार्ड (National Bank for Agriculture and Rural Development) ने अब तक अवैध रूप से ली गई सब्सिडी को वापस नहीं लिया है. इसकी वजह से नाबार्ड प्रबंधन पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं. इस मामले को लेकर हमने नाबार्ड के चेयरमैन जीआर चिंताला (G.R. Chintala) से संपर्क किया लेकिन उनका जवाब नहीं मिला.

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देश के 62 किसान संगठनों की संस्था राष्ट्रीय किसान महासंघ (Rashtriya Kisan Mahasangh) के संस्थापक सदस्य बिनोद आनंद का कहना है कि ऑडिट रिपोर्ट के बाद भी अगर एग्रीकल्चर और ग्रामीण फाइनेंसिंग (Rural financing) के रेगुलेटर नाबार्ड ने अपनी सब्सिडी वापस नहीं ली है तो यह बहुत गंभीर बात है. उसे तो घपलेबाजों और उसमें मदद करने वाले बैंक कर्मियों पर इतनी सख्त कार्रवाई करनी चाहिए थी कि उसका एक संदेश जाए.

...तो फिर एक लाख करोड़ के नए फंड का क्या होगा?

मोदी सरकार द्वारा घोषित एक लाख करोड़ रुपये के एग्री इंफ्रास्ट्रक्चर फंड (Agri Infrastructure Fund) को भी नाबार्ड के जरिए ही खर्च किया जाना है, अगर नाबार्ड का यही रवैया रहा तो असली किसानों तक कैसे इस रकम का फायदा पहुंचेगा? सब्सिडी हड़पने वाले बैंक अधिकारियों को टर्मिनेट कर देना चाहिए. उनके अकाउंट से पैसे की वसूली करनी चाहिए. इसमें शामिल कोई कर्मचारी रिटायर हो गया हो तो उसकी पेंशन पेंशन बंद करके वसूली करनी चाहिए.

आनंद का कहना है कि हर साल अलग-अलग स्कीमों में अरबों रुपये जारी होते हैं लेकिन उसका फायदा असली लोगों को नहीं मिल पाता. अन्नदाता के प्रति नकारात्मक रवैये की वजह से बैंक अधिकारी उन्हें खेती और पशुपालन के लिए आसानी से फंड नहीं देते. जबकि, जो लोग सेटिंग करने वाले हैं उन्हें योजनाओं का लाभ मिलता है.
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