शॉपिंग के बाद बस ‘आंखे दिखाएं’ और घर चले जाएं, कुछ ऐसा होगा देश का नया पेमेंट सिस्टम

शॉपिंग के बाद बस ‘आंखे दिखाएं’ और घर चले जाएं, कुछ ऐसा होगा देश का नया पेमेंट सिस्टम
चेहरा दिखाएं, फोन नंबर क्यों बताना, जब हम आपको चेहरे से पहचान सकते हैं

जब आपका चेहरा ही दुनिया के लिए पहचान है तो क्या जरूरत है पेमेंट के लिए अन्य चीजों की. इसी पर आधारित नई टेक्नोलॉजी फेशियल रेकग्निशन की शुरुआत भारत में हो चुकी है. इसके जरिए आप जल्द एटीएम पर चेहरा दिखाकर कैश निकाल सकेंगे. आज हम आपको डिजिटल प्राइम टाइम में इससे जुड़ी सभी जानकारियां दे रहे हैं...

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 21, 2020, 8:07 AM IST
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नई दिल्ली. चेहरा दिखाएं, फोन नंबर क्यों बताना, जब हम आपको चेहरे से पहचान सकते हैं...अब ऐसा ही कुछ दुकानों के बाहर आपको लिखा मिल सकता है. इसकी शुरुआत भारत में होने ही वाली है. देश के बैंकिंग सिस्टम को बेहतर और सुरक्षित बनाने के लिए लगातार नए फीचर्स जोड़े जा रहे हैं. RBI अब अपने ग्राहकों के लिए फेशियल रेकग्निशन टेक्नोलॉजी (Facial Recognition Payment Technology) की शुरुआत करने जा रहा है, इसके जरिए ग्राहक बिना समय गंवाए शॉपिंग कर घर जा सकते है. इसके अलावा ऐसा ही एटीएम भी लगाने की तैयारी है जहां आप बिना कार्ड के जाएंगे और चेहरा दिखाकर कैश निकाल सकेंगे.

हालांकि, अभी भी फेशियल रेकग्निशन टेक्नोलॉजी (Facial Recognition Technology) का इस्तेमाल देश की कई कंपनियां कर रही हैं. भारत बड़े पैमाने पर फेशियल रेकग्निशन टेक्नोलॉजी स्थापित करने जा रहा है जिससे अपराधियों को पकड़ने, लापता की शिनाख्त, अज्ञात शवों की पहचान मुमकिन हो पाएगी. लेकिन इससे कई मानवाधिकार कार्यकर्ता चिंतित हैं. क्योंकि उनका मानना है कि नागरिकों की आजादी को लेकर ये जोखिम भरा हो सकता है.

कैसे होता है चेहरा दिखाकर पेमेंट
आज हम अपने डिजिटल प्राइम टाइम में फेशियल रेकग्निशन टेक्नोलॉजी के बारे में बता रहे हैं. भारत में डिजिटल पेमेंट टेक्नोलॉजी की तरफ तेजी से बढ़ रहा है. लोग हर तरह के पेमेंट के लिए पेटीएम, फोनपे, गूगल पे, जैसे कई ऐप से डिजिटल पेमेंट करते हैं. लेकिन, दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था चीन Facial Recognition Payment टेक्नोलॉजी का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करता है यानी चीन के लोग चेहरे की पहचान से पेमेंट करते हैं. आपको जानकार हैरानी होगी कि इस समय चीन में 100 से भी ज्यादा शहरों में इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जा रहा है.



फेशियल रेकग्निशन पेमेंट करने के लिए लोग कैमरे से कनेक्ट POS मशीन के सामने खड़े होते हैं और पेमेंट करते हैं. इसके लिए पहले उन्हें अपने चेहरे को बैंक अकाउंट या डिजिटल पेमेंट सिस्टम से लिंक करवाना होता है. इस सेवा की शुरुआत चीन में साल 2017 में हुई थी. फेशियल रिकॉग्निशन सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल पहले से ही बड़े स्तर पर किया जाता रहा है. लगभग हर क्षेत्र में यह टेक्नोलॉजी काफी मददगार साबित हुई है. अब इसे पेमेंट प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है.





वहीं अगर भारत की बात करें, तो यहां फेशियल रिकॉग्निशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ने लगा है. हैदराबाद के राजीव गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर एंट्री के लिए इसकी शुरुआत की गई इसके बाद दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर भी इसका ट्रायल शुरू हो चुका है.

रेलवे ने भी बढ़ते अपराधों पर रोक लगाने के लिए फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल शुरू कर दिया है. बेंगलुरु, मनमाड और भुसावल स्टेशनों पर इसका उपयोग होने लगा है. इसकी मदद से अब रेलवे पुलिस फोर्स यानी आरपीएफ इसके जरिए आसानी से अपराधियों की पहचान कर सकती है. इस टेक्नोलॉजी के तहत अपराधियों के चेहरों की मैपिंग की जाती है.

मैपिंग करने के बाद उनकी फोटो क्लिक करते ही देश के हर स्टेशन पर पहुंच जाती है. इसके लिए वीडियो सर्विलांस प्रणाली स्थापित की जा रही है. इस साल प्रथम चरण में दक्षिण-पश्चिम रेलवे ने हाल में 6 प्रमुख स्टेशनों में वीडियो सर्विलांस प्रणाली शुरू की है. भारतीय रेलवे मार्च 2020 तक सभी स्टेशनों और सभी रेलवे कोचों में सीसीटीवी कैमरा लगाने की योजना पर काम कर रहा है.

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी सिस्टम को विकसित करने के लिए पूरी तैयारी कर चुका है. सिस्टम अगले छह महीने में पूरी तरह से तैयार हो जाएगा. इसमें चेहरे की पहचान का केंद्रीय डाटाबेस बनेगा. केंद्रीय डाटाबेस में करीब 5 करोड़ तस्वीरें रहेंगी जो कई डाटा केंद्रों जैसे पुलिस रिकॉर्ड, अखबार, पासपोर्ट और सीसीटीवी नेटवर्क से ली गई होंगी. अब तक यह साफ नहीं हो पाया है कि आधार का भी डाटा इसके लिए इस्तेमाल होगा या नहीं. आधार के तहत सरकार ने देश की पूरी आबादी का बायोमीट्रिक डाटा लिया है.



क्या है फेशियल रेकग्निशन टेक्नोलॉजी
अब सवाल उठता हैं कि आखिरी ये टेक्नोलॉजी कैसे काम करती हैं. तो आपको बता दें कि यह बायोमेट्रिक सॉफ्टवेयर की एक श्रेणी है जो किसी व्यक्ति के चेहरे की विशेषताओं को गणितीय रूप से मैप करती है. डाटा को फेसप्रिंट के रूप में इकट्ठा करती है. यह सॉफ्टवेयर किसी व्यक्ति की पहचान के लिए डीप लर्निंग एल्गोरिदम का प्रयोग करता है. चेहरे की विशेषताओं के आधार पर लोगों की पहचान करने का यह कंप्यूटराइज्ड तरीका है. यह टेक्नोलॉजी कैमरे से चलती है. अभी तक हम इस टेक्नोलॉजी की अच्छी बातों पर बात कर रहे थे. लेकिन कई लोगों को इससे अपनी प्राइवेसी छिनने की टेंशन है.

लेकिन उठ चुके हैं सवाल
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, पहली बार इस टेक्नोलॉजी पर सवाल तब उठे जब अमेरिका में यात्री ने ट्वीट कर अमेरिकी सरकार के उस अभ्यास पर सवाल उठाए जिसमें उसने देखा कि अमेरिका में आने और जाने वाले हर यात्री पर इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल होता है. मानवाधिकार संस्थाएं इस टेक्नोलॉजी का विरोध करती आई हैं. एयरपोर्ट पर सुरक्षा को पुख्ता करने के लिए भारत, सिंगापुर, ब्रिटेन और नीदरलैंड्स फेशियल रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल करते आ रहे हैं.

मानव अधिकारों की रक्षा के लिए काम करने वालों एक्टिविस्ट कहते हैं कि अभी तक ये स्पष्ट नहीं है कि डाटा किस तरह से इकट्ठा किया जाएगा और इसका इस्तेमाल कैसे किया जाएगा या फिर डाटा के स्टोरेज को कैसे नियमित किया जाएगा. इस बात का डर बना हुआ है कि सिस्टम का इस्तेमाल आम लोगों की निगरानी के लिए किया जा सकता है.

गूगल की पेरेंट कंपनी अल्फाबेट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुंदर पिचाई ने यूरोपियन यूनियन की तरफ से लेटेस्ट टेक्नोलॉजी फेशियल रिकॉग्निशन पर अस्थाई रोक लगाने के प्रस्ताव को मानते हुए कहा है कि मुझे लगता है कि सरकार को इस मामले को जल्द निपटाना चाहिए. साथ ही इस टेक्नोलॉजी के लिए फ्रेमवर्क भी तैयार करना होगा. उन्होंने आगे कहा है कि विशेषज्ञों को फेशियल रिकॉग्निशन टेक्नोलॉजी को कैसे उपयोग किया जाए, इस पर भी विचार करना होगा.



विरोध के बाद सरकार को बंद करनी पड़ी फेशियल रिकग्निशन टेक्नोलॉजी

मई 2019 में सैन फ्रांसिस्को अमेरिका का पहला शहर बना जिसने इस तकनीक के बेचने और इस्तेमाल दोनों पर बैन लगा दिया. अमेरिका में इस तकनीक पर बढ़ते असंतोष के बाद यह फैसला लिया गया. सरकार फेशियल रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल कई साल से कर रही है, लेकिन क्लाउड कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक के बाद यह कहीं ज्यादा शक्तिशाली हो गई है. ऑकलैंड, बर्कले, और समरविले में भी ऐसे नियम लागू कर दिये गए हैं.

टेक्नोलॉजी के जानकार कहते हैं कि फोन नंबर और ई-मेल आईडी के पासवर्ड डाटाबेस में स्टोर होते हैं, वैसे ही फेस का डाटा भी कंपनियों के डाटा में स्टोर हो जाता है. अगर किसी वजह से यूजर्स का डाटा लीक होता है तो बड़ी मुश्किलें खड़ी हो जाएंगी. क्योंकि आम तौर पर पासवर्ड हैक हो जाने के बाद बदलने का ऑप्शन होता है, लेकिन फेस डाटा को सुरक्षित रखने के लिए किसी तरह के ऑप्शन नहीं मिलते है.
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