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PM मोदी के ड्रीम फार्मिंग प्रोजेक्ट को BJP शासित राज्यों ने भी नहीं किया लागू, जानिए पूरा मामला?

ओम प्रकाश | News18Hindi
Updated: February 21, 2020, 11:09 AM IST
PM मोदी के ड्रीम फार्मिंग प्रोजेक्ट को BJP शासित राज्यों ने भी नहीं किया लागू, जानिए पूरा मामला?
किसानों को दाम नहीं मिल रहा है और खरीदने वालों को महंगी मिल रही हैं सब्जियां (Symbolic picture)

सिर्फ पंजाब और तमिलनाडु में लागू हुआ कांट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट, किसानों को इससे कैसे मिलेगा फायदा?

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  • Last Updated: February 21, 2020, 11:09 AM IST
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नई दिल्ली. किसानों को लेकर मोदी सरकार के एक महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट कांट्रैक्ट फार्मिंग (अनुबंध खेती) को लागू करने में प्रदेश सरकारें दिलचस्पी नहीं दिखा रहीं. यहां तक कि एक भी बीजेपी शासित सरकार ने भी अब तक इसे अपने यहां लागू नहीं किया है. सिर्फ दो प्रदेश तमिलनाडु और पंजाब इसे लागू कर रहे हैं. लेकिन वहां भी जमीनी तौर पर इसे लेकर ज्यादा काम नहीं हो सका है. 22 मई 2018 को अनुबंध खेती का अंतिम मॉडल जारी किया गया था. अब सरकार ने बजट में कहा है कि वो कांट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट को लागू करने वाले राज्यों को प्रोत्साहन प्रदान करेगी.

सवाल ये है कि आखिर ऐसा क्या है कि मोदी सरकार भाजपा शासन वाले मुख्यमत्रियों को भी इसके लिए तैयार नहीं कर पाई है. जबकि केंद्र सरकार का दावा है कि इससे किसानों की किसानों की सबसे बड़ी टेंशन खत्म हो जाएगी. उनकी इनकम की गारंटी हो जाएगी. फसल का दाम पहले से ही तय हो जाएगा. किसानों के हित सुरक्षित हैं. तो फिर ये बात मुख्यमंत्री और किसान संगठन क्यों नहीं समझ पा रहे हैं.

अनुबंध खेती के लिए क्यों नहीं राजी हो रहींं राज्य सरकारेंं  



राष्ट्रीय किसान महासंघ के संस्थापक सदस्य विनोद आनंद कहते हैं "इस मॉडल को राज्य सरकारें इसलिए लागू नहीं कर पा रही हैं क्योंकि खेती में बड़े परिवर्तन के लिए बने मॉडल कांट्रैक्ट फार्मिंग गाइडलाइन को लेकर सरकार ने डेमोक्रेटिक तरीके से चर्चा नहीं की है. हर राज्य में किसानों और कृषि को लेकर अलग-अलग राजनीतिक मजबूरियां हैं. क्योंकि कहीं पर खेती का आकार बहुत छोटा है और कहीं पर किसान इसके लिए राजी नहीं दिखते.”



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क्या कांट्रैक्ट फार्मिंग में सुरक्षित है किसानों का भविष्य?


आनंद कहते हैं “उत्तराखंड में खेतों का आकार जैसा है उसमें कैसे कांट्रैक्ट फार्मिंग होगी इस पर कोई बातचीत नहीं हुई. कागज में तो यह अच्छा लगता है. लेकिन जमीन पर उतरना उतना ही कठिन है. वरना इसके लिए सबसे पहले बीजेपी शासन वाले ही राजी हो जाते. अच्छा होता कि अनुबंध खेती के लिए किसानों को ग्रामीण स्तर पर जानकारी दी जाती. उन्हें बताया जाता कि कंपनियां खेती करवाएंगी तो भी उनका हित कैसे सुरक्षित रहेगा. इसके बाद इसका मॉडल तैयार होता तो लोग इसे मानते. दिल्ली में बैठकर मॉडल बनाकर थोप दिया गया तो कोई राज्य कैसे अपनाएगा भले ही वो बीजेपी शासित ही क्यों न हो."

कांट्रैक्ट फार्मिंग का आधार

दरअसल, देश में बड़े किसानों को तो अपनी उपज का मार्केट पाना आसान होता है, लेकिन 86.2 फीसदी लघु एवं सीमांत किसानों (जिनके पास 2 हेक्टेयर से कम खेती है) को बड़ी मुश्किल होती है. इनके उत्पाद का सही मूल्य नहीं मिलता. क्योंकि मार्केट का अभाव है. गांवों-कस्बों के नजदीक मंडी नहीं हैं. इसलिए नरेंद्र मोदी सरकार ने यह तय किया क्यों न कुछ ऐसा किया जाए जिससे खरीदार और उपज का दाम पहले से तय हो जाए. आलू, प्याज और टमाटर जैसी चीजों के दाम को लेकर हर साल किसान आवाज उठाते हैं.

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किसानों को कैसे मिलेगा लाभ


इतने पैसे की सीधी बचत

>>इसे मंडी के मकड़जाल से बाहर रखा गया है. यानी मंडी कानून नहीं लागू होगा. जिससे उपज बेचने के लिए मंडी फीस देने की जरूरत नहीं होगी. इस समय अलग-अलग राज्यों में उपज की वैल्यू पर 0.5 से 2 फीसदी तक यह फीस लगती है और 7 फीसदी कमीशन एजेंट लेता है. एक्ट में आने वालों को इस पैसे की सीधी बचत होगी.

एक्ट है क्या?

>>किसानों के समूह से ही खरीदार कांट्रैक्ट करेगा. क्योंकि उसे बड़े पैमाने पर उत्पाद चाहिए होगा.

>>अगर किसान को नई तकनीक से खेती करनी है तो उसके लिए खरीद करने वाली कंपनी तकनीक मुहैया कराएगी. ताकि कम लागत में भी अधिक उत्पादन हो. जैसे आर्गेनिक उत्पाद चाहिए तो उसके सर्टिफिकेशन आदि से संबंधित सहायता.

>>उत्पाद की मात्रा और दाम पहले से तय होगा. किसानों के हित सुरक्षित रखने का दावा. निजी कंपनियां बुवाई के समय ही किसानों से एग्रीमेंट कर लेंगी कि वह फसल किस रेट पर लेंगी. रेट पहले ही तय हो जाएगा. ऐसे में किसान फायदा देखकर दाम बताएगा.

कैसे सुरक्षित है किसान का भविष्य

इस बारे में हमने कांट्रैक्ट फार्मिंग की गाइडलाइन बनाने वाले डिप्टी एग्रीकल्चर मार्केटिंग एडवाइजर डॉ. एसके सिंह से बातचीत की. उन्होंने बताया-

>>जब किसी चीज का दाम 100 रुपये फिक्स किया गया और मार्केट में दाम 110 रुपये हो गया तो किसान को ऑब्जेक्शन हो सकता है. ऐसे सूरत में सरकार ने तय किया है कि यदि किसी उपज का दाम 10 फीसदी तक बढ़ता है तो यह पैसा खरीदार किसान को देगा.

>>यदि 10 फीसदी से ज्यादा बढ़ जाता है तो शेष बढ़ा खरीदार और उत्पादक यानी किसान दोनों शेयर करेंगे.

>>यदि 100 रुपये दाम तय हुआ और मार्केट में दाम रह गया 90 तो भी किसान को 100 रुपये ही मिलेंगे. यदि उससे अधिक कम हो गया तो शेष घटे हुए दाम में से दोनों शेयर करेंगे.

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मंडी तंत्र से बाहर रहेंगे ऐसे किसान


दावा: किसानों के जोखिम को जीरो करेगी ऐसी खेती

News18 hindi से बातचीत में फामर्स इनकम डबलिंग कमेटी के चेयरमैन डॉ. अशोक दलवाई का कहना है कि खेती-किसानी में जोखिम ही जोखिम है. किसान हमेशा इसी चिंता में घिरा रहता है कि जो फसल वो उगा रहा है उसका उचित दाम मिलेगा या नहीं. कांट्रैक्ट फार्मिंग एक्ट इस जोखिम को जीरो कर देता है. इसलिए जल्द से जल्द सभी राज्यों को इसे लागू कर देना चाहिए. इसमें किसानों के हितों का पूरा ध्यान रखा गया है.

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First published: February 21, 2020, 9:39 AM IST
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