Home /News /business /

बजट 2022 : इनकम टैक्स को अलविदा कहने का यही है सही समय

बजट 2022 : इनकम टैक्स को अलविदा कहने का यही है सही समय

इनकम टैक्‍स की जगह एक्‍सपेंडिचर टैक्‍स अपनाने का यही उपयुक्‍त अवसर है. आयकर अब केवल वेतनभोगियों व मध्‍यम वर्ग की परेशानियां बढ़ाने का साधन मात्र रह गया है.

इनकम टैक्‍स की जगह एक्‍सपेंडिचर टैक्‍स अपनाने का यही उपयुक्‍त अवसर है. आयकर अब केवल वेतनभोगियों व मध्‍यम वर्ग की परेशानियां बढ़ाने का साधन मात्र रह गया है.

धनी लोगों से आय कर वसूलने में हमारी व्‍यक्तिगत आयकर व्‍यवस्‍था असहाय है. इसके प्रावधान जहां एक ओर धनी लोगों को कर चोरी ओर अत्‍यधिक खपत के लिये प्रोत्‍साहित करते हैं, वहीं दूसरी ओर सामान्‍य वेतनभोगी वर्ग को परेशानियों में डालते हैं. इसलिये अब व्‍यक्तिगत कर वसूली का आधार आय (income) की बचाय व्‍यय (expenditure) को करना ही बेहतर है.

अधिक पढ़ें ...

नई दिल्ली. Budget 2022 : देश की व्‍यक्तिगत कर व्‍यवस्‍था में अब आमूलचूल परिवर्तन करने का समय आ गया है. इनकम टैक्‍स की जगह एक्‍सपेंडिचर टैक्‍स अपनाने का यही उपयुक्‍त अवसर है. आयकर अब केवल वेतनभोगियों व मध्‍यम वर्ग की परेशानियां बढ़ाने का साधन मात्र रह गया है. धनवान व्‍यक्तियों से कर वसूली में यह असहाय है. इसलिए अब भारत को आय कर वसूलने का आधार आय (income) नहीं व्‍यय (expenditure) को बनाना चाहिए.

कितनी विडंबना है कि एक सामान्‍य वेतन पाने वाला व्‍यक्ति पहले आयकर टैक्‍स अदा करता है और फिर बची हुई आय को खर्च करता है. दूसरी ओर, धनी लोग पहले खर्च करते हैं और फिर बची हुई आय पर इनकम टैक्‍स देते हैं. इनकम टैक्‍स की जगह एक्‍सपेंडिचर टैक्‍स लागू करके कर लगाने का आधार अगर व्‍यय को किया जाये तो इससे आम आयकरदाता की परेशानियां दूर होंगी. काला धन पनपने से रुकेगा. बचत की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा और देश का व्‍यक्तिगत टैक्‍स संग्रहण भी बढ़ेगा.

ये भी पढ़ें : महंगाई का झटका! 20 फीसदी तक महंगे हुए साबुन और डिटर्जेंट, जानें किस कंपनी ने और क्‍यों बढ़ाए दाम

आईटीआर से मिलेगी मुक्ति
अगर व्‍यक्तिगत इनकम टैक्‍स को अलविदा कह दिया जाये तो करीब 6.32 लाख लोगों को वार्षिक आयकर रिटर्न (annual Income Tax Returns -ITR) भरने के बोझ से मुक्ति मिलेगी. आईटीआर नये उद्यमियों और उभरते स्‍टार्ट-अप्‍स का हौसला तोड़ने का हथियार बन चुका है क्‍योंकि यह उन्‍हें व्यक्तिगत कर अनुपालन से छूट प्रदान नहीं करता है. इनकम टैक्‍स के जटिल नियमों के कारण लोगों को बहुत से रिकॉर्ड और फाइल रिटर्न्‍स सब्मिट करनी पड़ती है और उन्‍हें संभाल कर रखना पड़ता है. आयकर विभाग (income tex department) लाखों रिटर्न को जांचने, प्रश्‍नों का उत्‍तर देने (queries), स्‍पष्‍टीकरण देने और रिफंड करने तथा आयकरदाताओं के साथ पत्राचार करने में ही उलझा रहता है.

संस्‍थानों का बोझ होगा कम
अगर व्‍यक्तिगत इनकम टैक्‍स को हटा दिया जाता है तो टीडीएस के साथ जुड़े बहुत से संस्‍थानों को भी बहुत सी रिटर्न्‍स को एकत्रित, प्रेषित और जमा कराने के सिरदर्द से मुक्ति मिल जाएगी. आज यूएई, कतर, कुवैत, ओमान, सऊदी अरब, बरमूडा, दारूसअलाम और ब्रूनेई आदि बहुत से देश हैं जहां इनकम टैक्‍स देने की जरूरत नहीं है. वहां लोगों को सामाजिक सुरक्षा में योगदान देना होता है.

वेतनभोगी वर्ग का उत्‍पीड़न
इनकम टैक्‍स का बोझ भारत के मध्‍यम वर्ग वेतनभोगी लोगों के सिर पर है. धनी लोगों की आय के स्रोत का बड़ा भाग सैलरी नहीं बल्कि लाभांश (dividends) और पूंजीगत लाभ (capital gains) होते हैं. इनकम टैक्‍स आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे कि पूरे भारत में केवल 8,600 लोग ही ऐसे हैं जिन लोगों ने माना है कि उनकी वार्षिक आय 5 करोड़ रुपये है. 42,800 लोगों ने अपनी आय वार्षिक 1 करोड़ रुपये से अधिक घोषित की है. 4 लाख लोगों की ही वार्षिक आय आयकर विभाग के कागजों में 20 लाख रुपये वार्षिक से ऊपर है.

इस प्रकार, भारत के 99% कर भुगतान करने वाले लोगों को ही आईटीआर दाखिल करने के लिए मजबूर किया जा रहा है. जबकि वे किसी न किसी बहाने कर के रूप में राशि का भुगतान करते हैं. जो लोग इनकम टैक्‍स का भुगतान करते हैं वे इनकम टैक्‍स देने से किसी भी तरह से बच नहीं सकते क्‍योंकि वे वेतभोगी वर्ग से आते हैं और टीडीएस के रूप में उनसे पहले ही टैक्‍स काट लिया जाता है.

ये भी पढ़ें : अब Axis Bank ग्राहकों को नेट बैंकिंग के लिए बार-बार नहीं डालना होगा यूजरनेम और पासवर्ड

व्‍यक्तिगत इनकम टैक्‍स वेतनभोगी लोगों से ही सही तरीके से एकत्रित होता है. दूसरा वर्ग किसी न किसी तरीके से टैक्‍स भरने से बच जाता है. इसे विडंबना ही कहेंगे कि वेतनभोगी वर्ग पहले आय पर टैक्‍स देता है और फिर बची हुई आय खर्च करता है. वहीं दूसरी ओर गैर वेतनभोगी वर्ग पहले कई तरह के व्‍यय मदों (expenses heads) में अपनी आय खर्च करता है और अपनी कर देयता (tax liability) घटा देता है.

व्‍यापार (business) और पेशेवर श्रेणी (professional category) में आने वाले लोगों द्वारा किराये, फोन, बिजली, घरेलू और विदेशी यात्राओं और मनोरंजन पर किया गया खर्च टैक्‍स कर कटौती योग्‍य व्‍यय (tax deductible expenditure) में शामिल है. केवल 2,200 डॉक्‍टरों चार्टर्ड अकाउंटेंट्स और वकील आदि प्रोफेशनल्‍स ने अपने पेशे से अपनी आय 1 करोड़ रुपये बताई है. बड़े किसान टैक्‍स नहीं भरते हैं. राजनीतिक पार्टियां भी ये सुनिश्‍चित करती हैं कि उन्‍हें टैक्‍स न भरना पड़े.

ये आंकड़े बताते हैं इनकम टैक्‍स की कमजोरी
वित्‍तवर्ष 2020-21 में कुल 24,23,020 करोड़ का टैक्‍स रेवेन्‍यू प्राप्‍त हुआ था. इसमें इनकम टैक्‍स 6,38,000 रुपये (26.30%) था. कॉर्पोरेट टैक्‍स का हिस्‍सा 6,81,000 करोड़ रुपये (28%), जीएसटी का 6,90,500 (28.5%), एक्‍साइज ड्यूटी का 2,67,000 करोड़ (11%), कस्‍टम्‍स का 1,38,000 करोड़ रुपये (5.70%) और सर्विस टैक्‍स का हिस्‍सा 1,020 करोड़ रुपये (0.045%) था.

एक्‍सपेंडिचर टैक्‍स से कालेधन पर रोक
कर चोरी भारत में एक सामान्‍य मानसिकता बन चुकी है. टैक्‍स प्‍लानिंग या टैक्‍स बचाव (tax avoidance) जायज है. लेकिन कर चोरी अपराध है. इससे एक समानांतर अर्थव्‍यवस्‍था प्रॉपर्टी और सोने के रूप में पनप जाती है. अगर व्‍यक्तिगत आयकर को एक्‍सपेंडिचर टैक्‍स में बदल दिया जाये तो वास्‍तविक आय को कर चोरी कर काले धन में बदलने को कोई रास्‍ता ही नहीं रहेगा. सारा फंड अर्थव्‍यवस्‍था की उत्‍पादक आवश्‍यकताओं के लिये उपलब्‍ध रहेगा.

बैंकों की ऋण क्षमता बढ़ेगी
बैंक प्राय: जमा का 3 फीसदी नकद आरक्षित अनुपात (CRR) के तहत  रखते हैं और 97 फीसदी कर्ज के रूप में दे देते हैं. इसमें वैधानिक तरलता अनुपात (Statutory Liquidity Ratio-SLR) भी शामिल हैं. बैंक ऐसा इसलिए करते हैं, क्‍योंकि उन्‍हें पता है कि डिपॉजिट्स के रूप में यह 97 फीसदी रकम वापस बैंक में आ जायेगी जिसे बैंक 3 फीसदी सीसीआर रखकर फिर कर्ज के रूप में बांट देंगे.

यही बैंकों की ऋण निर्माण प्रक्रिया (credit creation process) है. अगर बैंकों में किसी वैध तरीके से काला धन जमा होता है तो यह धन आपूर्ति को बढ़ायेगा और इससे उत्‍पादकता में सुधार होगा. ऐसा होने से बैंकों की ऋण देने की क्षमता में भी बढ़ोतरी होगी.

बस आय का आधार ही बदलना है
एक्‍सपेंडिचर टैक्‍स, इनकम टैक्‍स से बहुत ज्‍यादा भिन्‍न नहीं है. इन दोनों में एक मूलभूत अंतर यह है कि जहां एक्‍सपेंडिचर टैक्‍स का आधार किसी का खर्च है वहीं आयकर का आधार कुल आय है. अमीरों पर ज्‍यादा टैक्‍स लगाने के लिये एक्‍सपेंडिचर टैक्‍स को ज्‍यादा तार्किक बनाया जा सकता है. क्‍योंकि अभी अमीरों द्वारा खर्च किया जाने वाला पैसा अभी भी देश की पूंजी में शामिल नहीं है क्‍योंकि उसे आयकर छू भी नहीं पाता है.

ये भी पढ़ें : Tax standard deduction : जानिए क्‍या है यह छूट और क्‍यों इसमें बढ़ोतरी की मांग कर रहे हैं कर्मचारी

बजट सही अवसर
भारत को इनकम टैक्‍स को अलविदा कहकर एक्‍सपेंडिचर टैक्‍स अपनाने पर गंभीरता से विचार करना चाहिये. बजट इसे लागू करने का उपयुक्‍त अवसर है. टैक्‍स लेने के लिये आय को आधार बनाने की बजाय खर्च को आधार बनाने से न केवल अतार्किक आयकर के हानिकारक और असमान प्रभावों को कम किया जा सकेगा बल्कि यह अत्‍यधिक उपभोग (extravagant consumption) की प्रवृत्ति पर अंकुश लगाकर बचत को बढ़ावा देगा.

लेखक : ए.एस. मित्‍तल

(लेखक पंजाब योजना बोर्ड के उपाध्‍यक्ष और ASSOCHAME, Northern Regional council के अध्‍यक्ष हैं. इस लेख में प्रकट किये गये विचार लेखक के निजी विचार हैं और ये विचार NEWS18 के विचारों का किसी भी रूप में प्रतिनिधित्‍व नहीं करते हैं.)

Tags: Budget, Income tax

विज्ञापन
विज्ञापन

राशिभविष्य

मेष

वृषभ

मिथुन

कर्क

सिंह

कन्या

तुला

वृश्चिक

धनु

मकर

कुंभ

मीन

प्रश्न पूछ सकते हैं या अपनी कुंडली बनवा सकते हैं ।
और भी पढ़ें
विज्ञापन

टॉप स्टोरीज

अधिक पढ़ें

अगली ख़बर