क्या मोदी सरकार के कृषि सुधार के बाद भारत दुनिया का सबसे बड़ा फूड एक्सपोर्टर देश बनेगा?

मध्यप्रदेश, पंजाब और हरियाणा में बिलों के विरोध में ट्रैक्टर रैलियां भी निकाली गई थीं.
मध्यप्रदेश, पंजाब और हरियाणा में बिलों के विरोध में ट्रैक्टर रैलियां भी निकाली गई थीं.

हाल ही के मानसून सत्र में तीन कृषि विधेयकों पर संसद की मुहर लगी है. विपक्षी दलों ने इस विधेयक का विरोध भी किया था. ऐसे में अब यह जानना जरूरी है कि मोदी सरकार के कृषि संबंधित तीनों विधेयक कृषि क्षेत्र सेक्टर के लिए कितने उदारवादी और दूरगामी साबित हो सकते हैं?

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 16, 2020, 11:18 PM IST
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नई दिल्ली. संसद (Parliament) के मानसून सत्र (Monsoon Session) में तीन कृषि विधेयकों (Agriculture Bills) पर मुहर लगी थी. मोदी सरकार को इन तीनों बिलों को पास कराने के लिए बड़ी मशक्कत करनी पड़ी थी. सदन में विपक्ष ने इन बिलों को किसानों और कामगारों के लिए अहितकारी बताकर इसका पुरजोर विरोध किया था. विधेयकों के विरोध में देशभर में कई आंदोलन भी उग्र हुए थे. आइए जानते हैं मोदी सरकार के कृषि संबंधित तीनों विधेयक कृषि क्षेत्र सेक्टर के लिए कितने उदारवादी और दूरगामी साबित हो सकते हैं?

बिल के प्रति विरोध की आग
कृषि बिलों के विरोध के दौरान सदन की मर्यादा पार करने पर 8 सांसदों को निलंबित कर दिया गया था. वहीं, मध्यप्रदेश, पंजाब और हरियाणा में बिलों के विरोध में ट्रैक्टर रैलियां भी निकाली गई थीं. इसके साथ ही लंबे समय से बीजेपी की सहयोगी पार्टी शिरोमणि अकाली दल (Shiromani Akali Dal) भी इस बिल का विरोध कर रहा था. बिल को लेकर कहा जा रहा है कि इससे कृषि का निजीकरण हो जाएगा जिससे किसानों की स्थिति और दयनीय हो जाएगी. मोदी सरकार के मंत्रियों ने विरोधियों के इस कथन को तर्कहीन बताया और कहा कि 'मूल्य गारंटी कार्यक्रम' जारी रहेगा.

मूल्य तय कर फसल खरीदती है सरकार
देश में यह एक बहुत भावनात्मक विषय है. बता दें कि किसानों के लिए संकट की स्थिति न पैदा हो इसके लिए सरकार दो दर्जन से अधिक फसलों के मूल्य तय करती है और अपने कल्याणकारी कार्यक्रमों के लिए गेहूं और चावल के साथ दालें और तिलहन भी खरीदती है और 5 लाख से अधिक उचित मूल्य की दुकानों की श्रृंखला के माध्यम से बड़े पैमाने पर सब्सिडी का वितरण भी करती है. हरियाणा के एक किसान के मुताबिक, सरकार को सभी किसानों को इस बात की गारंटी देनी चाहिए कि वे अपनी फसल चाहे नामित अनाज बाजार में बेचें या निजी खरीदारों को, उन्हें कम से कम न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) मिले.



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कृषि बिलों में सुधार से बदलेगा देश का स्वरूप
विश्लेषकों और विशेषज्ञों का मानना है कि नए कृषि बिलों से भारत के कृषि स्वरूप में बड़ा बदलाव आएगा. क्योंकि नई प्रणाली में देशभर के किसानों को प्रोत्साहित किया जाएगा. नए बिलों में मौजूद प्रावधान के मुताबिक, किसान खुद के दामों पर फसल को बेचने का हकदार है. इसके साथ ही किसान दूसरे राज्यों में भी अपनी फसल को आसानी से बेचने जा सकता है. जिससे बिचौलियों की भूमिका खत्म होने से उनकी आय में वृद्धि होगी. कुलमिलाकर यह तीनों विधेयक किसानों के लिए वरदान साबित होंगे.

भविष्य में मजबूत होगी स्थिति
विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, भारत की अर्थव्यवस्था के अन्य क्षेत्रों में खेती काफी पिछड़ गई है. शहरी क्षेत्रों में 14 फीसदी की तुलना में ग्रामीण गरीबी दर लगभग 25% है. अधिनिर्णय ने खाद्य आपूर्ति को कमजोर बना दिया है, जिसका एक कारण कोरोना वायरस भी है. कोविड-19 के कारण आपू्र्ति श्रृंखलाओं के टूटने से खाद्य मुद्रास्फीति में 9.7 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन बिल के समर्थकों का कहना है कि कुछ परिवर्तनों के साथ यह प्रणाली भविष्य में और मजबूत होगी.

जमाखोरी और कालाबाजारी का होगा विस्तार
अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के अनुसार, नई प्रणाली से किसानों की स्थिति और भी अधिक दयनीय हो जाएगी, क्योंकि कॉर्पोरेट और बहुराष्ट्रीय कंपनियां किसानों से सस्ते दामों पर फसल खरीदकर महंगे दामों पर बाजारों में बेचेगी जिससे जमाखोरी और कालाबाजारी का विस्तार होगा.

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खाद्य निर्यात के लिए पावरहाउस बन सकता है देश
नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी अमिताभ कांत का कहना है कि देश में 10 फीसदी से भी कम खाद्य उप्तादन होता है और इसके भंडारण की कमी के चलते एक साल में 12.3 बिलियन डॉलर का नुकसान उठाना पड़ता है. कांत का मानना है कि यदि भारत वैश्विक मानदंडों पर अपनी उत्पादकता को बढ़ाए तो वह वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकता है और नई प्रणाली से देश खाद्य निर्यात के क्षेत्र में पावरहाउस बनकर उभर सकता है.
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