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सावधान! बाजार में बिक रही है कैंसर की बीमारी से जुड़ी नकली दवाएं, मुश्किल में मरीजों की जान

नकली दवाएं बाजार में आने लगी हैं

नकली दवाएं बाजार में आने लगी हैं

कैंसर की दवा (Cancer Medicine) खानेवालों के लिए ये खबर पढ़ना बहुत जरूरी है. दरअसल बांग्लादेश के साथ अन्य देशों से विभिन्न बीमारियों की दवाओं के नकली रूप (illegal Medicine) में आने से कई लोगों की नींद उड़ गई है.

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    नई दिल्ली. कैंसर की दवा (Cancer Medicine) खानेवालों के लिए ये खबर पढ़ना बहुत जरूरी है. दरअसल बांग्लादेश के साथ अन्य देशों से विभिन्न बीमारियों की नकली दवाओं के आने से कई लोगों की  नींद उड़ गई है. इससे न सिर्फ घरेलू फार्मा कंपनियों की आमदनी पर असर पड़ रहा है, बल्कि मरीजों की जान को भी खतरा है. हालत ये है कि कैंसर के जिन रोगियों को इन दवाओं को लेने की सलाह दी जाती है, उनमें से 12% लोगों तक ये नकली दवाएं पहुंच जाती हैं.

    तस्करी कर देश में लाई जा रही हैं अवेध दवाएं
    टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक एक्सपर्ट्स और कंपनियों द्वारा की गई पुष्टि के मुताबिक, बड़ी फार्मा कंपनियों के नाम पर कैंसर तथा लीवर से जुड़ी नकली और औषधि विभाग से बिना मंजूरी मिली दवाओं का 'ग्रे' मार्केट बढ़ रहा है. चूंकि ये दवाएं तस्करी कर देश में लाई जा रही हैं, यही वजह है की इसलिए इसका सही-सही आंकड़ा मौजूद नहीं है. लेकिन एक अनुमान के मुताबिक केवल कैंसर की दवाओं का यह ग्रे मार्केट करीब 300 करोड़ रुपये से अधिक का है.

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    12% लोगों तक ये नकली दवाएं पहुंचती हैं  
    कैंसर रोग विशेषज्ञ के अनुमानों के मुताबिक कैंसर के जिन रोगियों को इन दवाओं को लेने की सलाह दी जाती है, उनमें से 12% लोगों तक ये नकली दवाएं पहुंच जाती हैं. बड़ी बात यह है कि इन दवाओं का क्लीनिकल ट्रायल भी नहीं हुआ है और इन्हें ड्रग कंट्रोलर्स की मंजूरी भी नहीं मिली है. इतना ही नहीं एंप्लॉयीज स्टेट इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन (ESIC) और सेंट्रल गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम (CGHS) जैसी सरकारी संस्थान भी इन दवाओं को खरीद रहे हैं.

    कई बड़ी कंपनियों को खामियाजा भुगतना पड़ रहा है 
    अन्य दवाओं की तरह ये दवाएं भी रिटेलर्स द्वारा नहीं, बल्कि डिस्ट्रिब्यूटर्स के जरिए बेची जाती हैं. इसलिए कारोबार करने वाले लोगों की पहचान करने में आसानी होगी. नोवार्टिस, जानसेन, आस्ट्रा जेनेका, ताकेडा और ईसाई जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. इसका बड़ा कारण यह है कि आस्ट्रा जेनेका की ऑसिमेटिनिव नामक जिस दवा की कीमत 2 लाख रुपये से अधिक है, वहीं इस दवा की कॉपी महज 4,500 रुपये में मिल जाती है. कई अन्य महंगी दवाओं का भी यही हाल है.

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    इस तरह रोका जा सकता है फर्जीवाड़ा
    ईसाई फार्मा के एमडी संजीत सिंह लांबा ने TOI को बताया कि दवाओं पर बार कोडिंग के जरिये इस फर्जीवाड़े को रोका जा सकता है. सरकार ने घरेलू बिक्री के लिए इसकी बार कोडिंग की घोषणा कर दी है, जो फिलहाल वॉलंटरी है. लेकिन, हम सरकार से आग्रह करते हैं कि वह इसे अनिवार्य कर दे.

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