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केंद्र ने सरकारी हेलीकॉप्टर सेवा कंपनी पवन हंस की बिक्री रोकी, बोली जीतने वाली फर्म पर उठे थे सवाल

विजेता ने 211 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी.

विजेता ने 211 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी.

केंद्र सरकार ने उसकी और ओएनजीसी की हिस्सेदारी वाली कंपनी पवन हंस लिमिटेड की विनिवेश प्रक्रिया रोक दी है. बोली विजेता कंपनी के एक हिस्सेदार के खिलाफ एनसीएलटी के आदेश के संदर्भ में यह फैसला लिया गया है.

नई दिल्ली. केंद्र ने हेलीकॉप्टर सेवा देने वाली सरकारी कंपनी पवन हंस लिमिटेड की बिक्री को फिलहाल रोक दिया है. पवन हंस लिमिटेड की बोली 211.14 करोड़ रुपये में स्टार9 मोबिलिटी प्राइवेट लिमिटेड ने जीती थी.

इस कंपनी में अल्मस ग्लोबल की मेजोरिटी हिस्सेदारी है और उसके खिलाफ एनसीएलटी के आदेश को देखते हुए यह फैसला किया गया है. एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) के आदेश की कानूनी समीक्षा की जा रही है. उन्होंने कहा कि एनसीएलटी के आदेश का कानूनी परीक्षण कर रहे हैं और सौदा पूरा होने का पत्र जारी नहीं किया गया है.

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कंपनी पर आरोप क्या है
पवन हंस को मैसर्स स्टार9 मोबिलिटी प्राइवेट लिमिटेड ने खरीदा है. यह कंपनी 3 कंपनियों का गठजोड़ है. यह तीन कंपनियां हैं, मैसर्स बिग चार्टर प्राइवेट लिमिटेड, मैसर्स महाराजा एविएशन प्राइवेट लिमिटेड और अल्मस ग्लोबल ऑपर्चुनिटी फंड. पिछले महीने एनसीएलटी ने अल्मस ग्लोबल के खिलाफ आदेश पारित किया था. इस कंपनी पर अपने ऋणदाताओं के लिए मंजूर किए समाधान के तहत भुगतान नहीं करने का आरोप है. इसका मुख्यालय केमेन आइलैंड में है और दुबई मुख्याल वाली अल्मस कैपिटल मैनेज करती है. भारत में यह कंपनी कोलकाता में स्थित है. डीआईपीएएम के निर्देशों के अनुसार, अगर किसी कंपनी या उसके निदेशक के खिलाफ प्रतिबंध से जुड़ा कोई आदेश लागू है तो ऐसी कंपनियां बोली प्रक्रिया  के लिए अयोग्य हो जाएंगी. इससे पहले सेंट्रल इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड का विनिवेश भी इसी तरह से अधर में लटका था. जब उसके बोली विजेता के खिलाफ भी आरोप सामने आए थे.

सरकार बेच रही पूरी हिस्सेदारी
पवन हंस लिमिटेड में सरकार की 51 फीसदी और सार्वजनिक उपक्रम ओएनजीसी की 49 फीसदी हिस्सेदारी है. सरकार इसमें अपनी पूरी हिस्सेदारी बेच रही है. वहीं, ओएनजीसी ने कहा है कि वह भी अपनी पूरी हिस्सेदारी उसी बोली विजेता को बेचेगी जिसे सरकार ने चुना है. बिक्री की शर्ते भी वही होंगी जो बोलीदाता और सरकार के बीच तय हुई हैं. सरकार को दिसंबर में अपनी हिस्सेदारी के लिए तीन बोलियां मिली थीं. बाकी दो कंपनियों ने 181 करोड़ व 153 करोड़ रुपये की बोली लगाई थी.

Tags: Disinvestment

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