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इन बैंकों में है आपका बचत खाता तो जान लें ये बात, सरकार ने बदल दिया है ये कानून

इन बैंकों में है आपका बचत खाता तो जान लें ये बात, सरकार ने बदल दिया है ये कानून

सहकारी बैंकों पर अब आरबीआई की निगरानी होगी

सहकारी बैंकों पर अब आरबीआई की निगरानी होगी

पीएम मोदी की अगुवाई वाली केंद्रीय कैबिनेट ने को-ऑपरेटिव बैंकों (Co-operative Banks under RBI) को आरबीआई की निगरानी में लाने वाले अध्यादेश को मंजूरी दे दी है. इसके बाद अब इन सहाकारी बैंकों को शिड्यूल बैंकों की तरह ही रेग्युलेट किया जाएगा.

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    नई दिल्ली. को-ऑपरेटिव बैंकों (Co-operative Banks) पर सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए इसे रिज़र्व बैंक (RBI) के निगरानी के दायरे में ला दिया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यमक्षा में कैबिनेट ने इसके अध्यादेश को भी मंजूरी दे दी है. केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने कहा कि कैबिनेट ने एक अध्यादेश पारित किया था जिस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हो गए हैं. जावड़ेकर ने कहा कि अब जिस तरह शिड्यूल्ड बैंक को RBI रेगुलेट करता था उसी तरह अब सहकारी बैंकों पर भी नजर रखेगा. देश में 1482 शहरी सहकारी बैंक (Urban Cooperative bank) और 58 मल्टी-स्टेट कोऑपरेटिव बैंक हैं. कुल मिलाकर सभी 1540 सहकारी बैंक RBI के सीधे रेग्युलेशन में आ गए हैं.

    क्यों लिया सरकार ने यह फैसला
    हाल ही महाराष्ट्र में पीएमसी बैंक में घोटाले का मामला सामने आया था. पीएमसी बैंक आरबीआई की निगरानी के दायरे में नहीं आता था. दरअसल, को-ऑपरेटिव बैंकों की निगरानी का जिम्मा अभी तक RBI की कोऑपरेटिव बैंक सुपरवाइजरी टीम का होता था. लेकिन सामान्य तौर पर कोऑपरेटिव बैंक छोटे लोन बांटते हैं लिहाजा यह सेक्शन कम सक्रिय रहता है. यही कारण है कि कई बार गड़बड़ियों का पता वक्त पर नहीं चल पाता, जैसा PMC बैंक के मामले में हुआ. इतना ही नहीं छोटे कॉपरेटिव बैंक की जांच या ऑडिटिंग 18 महीने में एक बार होती है लेकिन PMC जैसे बड़े बैंक की ऑडिटिंग एक साल में होती है. ऐसे में अब इन पर भी शिड्यूल बैंक की तरह निगरानी होगी और ऑडिट बढ़ेगा.

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    बैंकों पर कैसे पड़ेगा सरकार के इस फैसले का असर?
    एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस फैसले से सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जनता में यह संदेश जाएगा कि उनका पैसा सुरक्षित है. रिज़र्व बैंक यह सुनिश्चित करेगा कि को-ऑपरेटिव बैंकों का पैसा किस क्षेत्र के लिए आवंटित किया जाना चाहिए. इसे प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग भी कहा जाता है.

    इन बैंकों के रिज़र्व बैंक के अधीन आने पर इन्हें भी अब आरबीआई के नियम मानने होंगे जिससे देश की मौद्रिक नीति को सफल बनाने में आसानी होगी. साथ ही, इन बैंकों को भी अपनी कुछ पूंजी RBI के पास रखनी होगी. ऐसे में इनके डूबने की आशंका कम हो जाएंगी. सरकार के इस फैसले से जनता का विश्वास देश के को-ऑपरेटिव बैंकों में और बढ़ेगा और देश में बैंकों की वित्तीय हालात ठीक होने के आसार बढ़ेंगे.

    ग्राहकों पर क्या होगा असर?
    टैक्स एक्सपर्ट का कहना है कि ये फैसला ग्राहकों के हित में है क्योंकि अगर अब कोई बैंक डिफॉल्ट करता है तो बैंक में जमा 5 लाख रुपये तक की राशि पूरी तरह से सुरक्षित है. क्योंकि वित्त मंत्री ने एक फरवरी 2020 को पेश किए बजट में इसे 1 लाख रुपये से बढ़ाकर 5 लाख रुपये कर दिया है.

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    अगर कोई बैंक डूब जाता है या दिवालिया हो जाता है तो उसके जमाकर्ताओं को अधिकतम 5 लाख रुपये ही मिलेंगे, चाहे उनके खाते में कितनी भी रकम हो. भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की सब्सिडियरी डिपॉजिट इंश्योरेंस एंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन (DICGC) के मुताबिक, बीमा का मतलब यह भी है कि जमा राशि कितनी भी हो ग्राहकों को 5 लाख रुपये मिलेंगे.

    क्या है यह अकाउंट बीमा का नियम?
    DICGC एक्ट, 1961 की धारा 16 (1) के प्रावधानों के तहत, अगर कोई बैंक डूब जाता है या दिवालिया हो जाता है, तो DICGC प्रत्येक जमाकर्ता को भुगतान करने के लिए उत्तरदायी होता है. उसकी जमा राशि पर 5 लाख रुपये तक का बीमा होता है.

    आपका एक ही बैंक की कई ब्रांच में खाता है तो सभी खातों में जमा अमाउंट पैसे और ब्‍याज जोड़ा जाएगा और केवल 5 लाख तक जमा को ही सुरक्षित माना जाएगा.

    यही नहीं, अगर आपके किसी एक बैंक में एक से अधिक अकाउंट और FD हैं तो भी बैंक के डिफॉल्ट होने या डूब जाने के बाद आपको एक लाख रुपये ही मिलने की गारंटी है. यह रकम किस तरह मिलेगी, यह गाइडलाइंस DICGC तय करता है.

    Tags: Bank, Bank interest rate, Business news in hindi, RBI, Rbi policy

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