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    स्वच्छ उर्जा सेस- कोयले पर टैक्स को पूरी तरह से हटाने का क्या अर्थ है?

    प्रतीकात्मक तस्वीर
    प्रतीकात्मक तस्वीर

    जुलाई 2017 में भारत में जीएसटी की शुरूआत के साथ, कराधान कानून संशोधन अधिनियम 2017 (Taxation Laws Amendment Act, 2017) के तहत स्वच्छ उर्जा उपकर (Clean Energy Cess) को हटा दिया गया.

    • News18Hindi
    • Last Updated: November 21, 2020, 9:33 AM IST
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    आलोक परती

    भारत सरकार ने साल 2010 में कोयले पर उपकर (Cess on Coal) की शुरूआत की थी. यह कार्बन टैक्स (Carbon Tax) की तरह था, जिसे फाइनेंस एक्ट 2010 (Finance Act 2010) की दसवीं अनुसूची में सूचीबद्ध आइटमों पर एक्साइज ड्यूटी (Excise Duty) की तरह लगाया गया. ये आईटम हैं लिग्नाईट (Lignite) और पीट (Peat) कोयला. स्वच्छ उर्जा पहलों को बढ़ावा देने और इनके फाइनेंसिंग के लिए संसाधन जुटाने, स्वच्छ उर्जा के क्षेत्र में अनुसंधान को फाइनेंसिंग प्रदान करने एवं इसी तरह के अन्य प्रयोजनों को बढ़ावा देने के लिए यह उपकर (Cess) लगाया गया. फाइनेंस एक्ट 2010 से यह भी साफ था कि टैक्स से प्राप्त राशि को राज्यों को वितरित नहीं किया जाएगा. जब उपकर की शुरूआत की गई, उस समय इसकी दर 100 रुपये प्रति टन थी, किंतु जब इसे लागू किया गया तो 22/06/2010 के नोटिफिकेशन के मुताबिक यह 50 रुपये प्रति टन थी, जिसे 01/07/2010 से लागू किया गया.

    केंद्रीय बजट 2014-15 में, उपकर की दर को बढ़ाकर 100 रुपये प्रति टन कर दिया गया. स्वच्छ उर्जा पहलों और इनके लिए फाइनेंसिंग को बढ़ावा देना, स्वच्छ उर्जा के क्षेत्र में अनुसंधान को प्रोत्साहित करना इसका मूल प्रयोजन था, किंतु साल 2014 में दर बढ़ाकर सरकार ने फाइनेंसिंग का दायरा भी बढ़ाया, ताकि स्वच्छ पर्यावरण के क्षेत्र में अनुसंधान को बढ़ाया जा सके. 2015 में सरकार ने इस दर को बढ़ाकर 200 रुपये प्रति टन कर दिया और 2016 में इसे फिर से बढ़ाकर 400 रुपये प्रति टन कर दिया गया.



    जुलाई 2017 में भारत में जीएसटी की शुरूआत के साथ, कराधान कानून संशोधन अधिनियम 2017 (Taxation Laws Amendment Act, 2017) के तहत स्वच्छ उर्जा उपकर (Clean Energy Cess) को हटा दिया गया. कोयले के उत्पादन पर एक नया उपकर- जीएसटी क्षतिपूर्ति उपकर (GST Compensation Cess) लगाया गया, जिसकी दर समान यानि 400 रुपये प्रति टन रखी गई. इस आखिरी बदलाव का अर्थ यही है कि कोयले के उत्पादन से प्राप्त होने वाले कर को विभिन्न क्षेत्रीय विकास कार्यों के लिए उपयोग किया जाए.
    2010-11 से इस राष्ट्रीय स्वच्छ उर्जा फंड (National Clean Energy Fund) की शुरूआत हुई. 2010-11 से 2017-18 के बीच कोयला उपकर के रूप में तकरीबन 86,440.21 करोड़ रुपये की राशि जुटाई गई. यह आंकड़ा संसद में सरकार द्वारा दी गई जानकारी पर आधारित है. हैरानी की बात यह है इसमें से सिर्फ 29,654.29 करोड़ रुपये की राशि ही राष्ट्रीय स्वच्छ उर्जा फंड में स्थानांतरित की गई है और 15,911 करोड़ रुपये को उपयोग में लिया गया है. साल 2018-19 और 2019-20 के दौरान कोयला उपकर क्रमशः तकरीबन  38,500 करोड़ और 39,100 करोड़ रुपये था. अब राष्ट्रीय स्वच्छ उर्जा फंड में कुल राशि, एक लाख करोड़ से अधिक है. 2017 में जब जीएसटी की शुरूआत हुई, तब राष्ट्रीय स्वच्छ उर्जा कोष में तकरीबन रु 56000 करोड़ की बची राशि थी, जिसे  राज्य के क्षतिपूर्ति कोष में स्थानांतरित किया गया, जिसका उपयोग राज्यों के राजस्व की कमी की क्षतिपूर्ति के लिए किया गया. राज्य क्षतिपूर्ति फंड (State Compensation Fund) में इस राशि का स्थानांतरण, मूल प्रयोजन को नष्ट करता है और कोयला उत्पादन राज्यों से अन्य राज्यों को असमान एवं अनुपयुक्त स्थानांतरण (Unjustified Transfer of Funds) को दर्शाता है.

    भारत में कोयले का मूल्य वह मूल्य है जिस पर सीआईएल कोयला बेचता है, चूंकि यहां कोई कमर्शियल माइनिंग नहीं होता तथा सीआईएल और एससीसीएल 90 फीसदी से अधिक घरेलू बाजार को अपनी सेवाएं प्रदान करता है. भारत में पाया जाने वाला ज्यादातर कोयला बुरी गुणवत्ता का है. सीआईएल ने देश में पाए जाने वाले कोयले की श्रेणियों के आधार पर इनकी कीमत 447 से 1140 रुपये के बीच तय की है. कोयले पर कर जिसमें कोयला उपकर, रॉयल्टी, जिला फंड, अन्वेषण कोष (Exploration Fund) और जीएसटी शामिल हैं, जिसकी दर कोयले की श्रेणी के आधार पर 114 फीसदी से 60 फीसदी तय की गई है. ज्यादातर पावर प्लांट्स के लिए आपूर्ति किए जाने वाले कोयले की श्रेणी जी11 से जी 14 के बीच है तथा कराधान (Taxation) की दर अधिसूचित कीमत (Notified Price) पर तकरीबन 80 से 90 फीसदी है.

    भारत में अधिकतम कोयला बिजली उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया जाता है. देश में ज्यादातर पावर प्लांट्स में खपत की दर 600 ग्राम से 730 ग्राम के बीच है जो बोयलर (Boiler) की दक्षता पर निर्भर करती है. हम विशेष खपत के रूप में औसत 660 ग्राम ले सकते हैं और तब एक यूनिट बिजली की लागत तकरीबन 1 रुपये होगी, जिसमें से 50 फीसदी कर होगा. दूसरे शब्दों में कहा जाए तो हम जो बिजली बेचते हैं, उसमें 40 से 50 फीसदी कर होता है. सौर उर्जा की लागत बेहद कम हुई है और यह थर्मल पावर के साथ प्रतिस्पर्धा कर रही है. यह कहना गलत नहीं होगा कि यह तुलना उचित नहीं है. एक ओर सौर उर्जा उत्पादन पर बहुत ज़्यादा छूट और दूसरी ओर उंची कर एवं रेल भाड़े की दरें- यह उचित तुलना नहीं हो सकती.

    सरकार ने 2010 में स्वच्छ उर्जा के क्षेत्र में अनुसंधान और विकास को बढ़ावा देने के लिए एक फंड की शुरूआत की. 2014 में जब नई सरकार का गठन हुआ, इसने कर को 50 रुपये प्रति टन से बढ़ाकर 100 रुपये प्रति टन कर दिया, जिसके बाद अगले ही साल इसे बढ़ाकर 200 रुपये कर दिया गया. यह सिर्फ स्वच्छ उर्जा के मुद्दों तक ही सीमित नहीं था, बल्कि पूरा मामला पर्यावरण से जुड़ा था और यह प्राथमिक रूप से 'गंगा स्वच्छता परियोजना' (Ganga Cleaning Project) के लिए फंड जुटाने के लिए किया गया. 2016 में सरकार ने पेरिस में हुई COP21 बैठक के मद्देनज़र कर को फिर से बढ़ाकर 400 रुपये प्रति टन कर दिया. 2017 में यह उपकर, जीएसटी राज्य क्षतिपूर्ति फंड बन गया. अगर सरकार द्वारा निरंतर बदलाव और इस फंड के उपयोग पर ध्यान दें तो साफ है कि कर का उपयोग सरकार के तौर तरीकों एवं पदों में सुधार के लिए किया जा रहा था.

    उपकर को पूरी तरह से हटाने पर विचार कर रहा है PMO
    साफ है कि अब प्रधानमंत्री कार्यालय उपकर को पूरी तरह से हटाने पर विचार कर रहा है. यही कारण है कि इसे गुप्त नहीं रखा गया है. पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने पावर प्लांट्स से होने वाले विभिन्न उत्सर्जनों (Emissions) के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं. इसमें सबसे सख्त नियम सल्फर ऑक्साइड्स (Sulphur Oxides) के लिए निर्धारित किए गए हैं. भारतीय प्लांट्स में सल्फर की प्रतिशतता बहुत कम होती है, जिसमें कुछ मात्रा को आसानी से MOEF और CC धोकर (Washing the MOEF&CC) निकाला जा सकता है और इसके लिए एफजीडी इन्सटॉल करने की आवश्यकता होती है. वैकल्पिक समाधानों पर विचार किए बिना एफजीडी के इन्सटॉलेशन पर जोर देना बुद्धिमतापूर्ण नहीं (Unwise) है. अच्छा होगा कि इस मुद्दे पर खुलकर चर्चा एवं विचार-विमर्श किया जाए. प्रधानमंत्री कार्यालय के विचार संभवतया बिजली की कीमतों तक सीमित हैं, चूंकि कोयले पर उपकर कम करने/ हटाने से 40 पैसे का मार्जिन मिलेगा या एफजीटी इंस्टॉलेशन के लिए क्षतिपूर्ति को बढ़ाया जा सकेगा.

    उन मामलों में उपकर कम करने/ हटाने पर विचार करना चाहिए जहां कोयला कंपनी कोयले की गुणवत्ता में सुधार लाती है और अप्रत्यक्ष रूप से परिवहन की लागत कम करने, प्रदूषण कम करने, खपत कम करने, राख के निपटान (Ash Disposal ) और प्लांट में रखरखाव की लागत कम करने पर ध्यान देती है. सरकार द्वारा की गई कार्रवाई से केवल एफजीडी प्लांट्स के विदेशी आपूर्तिकर्ताओं को ही फायदा होगा. (लेखक पूर्व कोयला सचिव हैं.)
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