कोरोना संकट की वजह से बर्बादी की कगार पर छोटे-मझोले NBFCs! मोरेटोरियम ने बढ़ाई पूंजी की चिंता

कोरोना संकट की वजह से बर्बादी की कगार पर छोटे-मझोले NBFCs! मोरेटोरियम ने बढ़ाई पूंजी की चिंता
कोरोना की वजह से बर्बादी की कगार पर छोटे-मझोले NBFCs! मोरेटोरियम से बढ़ी चिंता

कोरोना संकट के बाद बड़ी संख्या में NBFCs बर्बादी की कगार पर आ गए हैं. एक तरफ लॉकडाउन में नया काम नहीं है, पुराने पेमेंट रुके हुए हैं और ये सरकार के एलान का फायदा उठाने की हालत में भी नहीं हैं. कुछ बड़े ब्रांड को छोड़ दें तो छोटे और मझोले नॉन बैंकिंग फाईनेंशियल कंपनियों की हालत इतनी खस्ता हो गई है कि उन्होंने MSMEs को नया कर्ज लगभग देना बंद कर दिया है.

  • Share this:
नई दिल्ली. कोरोना संकट के बाद बड़ी संख्या में NBFCs बर्बादी की कगार पर आ गए हैं. एक तरफ लॉकडाउन में नया काम नहीं है, पुराने पेमेंट रुके हुए हैं और ये सरकार के एलान का फायदा उठाने की हालत में भी नहीं हैं. कुछ बड़े ब्रांड को छोड़ दें तो छोटे और मझोले नॉन बैंकिंग फाईनेंशियल कंपनियों की हालत इतनी खस्ता हो गई है कि उन्होंने MSMEs को नया कर्ज लगभग देना बंद कर दिया है. असल में NBFCs बैंकों से उधार लेकर MSMEs को कर्ज देते हैं. कर्ज पर मोरोटोरियम लगा तो NBFCs के कर्जदारों ने EMI देना बंद कर दिया. जबकि NBFCs को मोरेटोरियम का फायदा नहीं मिला.

आत्मनिर्भर भारत पैकेज के तहत बैंकों ने बांड खरीद के जरिए NBFCs का नकदी संकट दूर करने की कोशिश की. लेकिन इसका फायदा सिर्फ बड़े NBFCs को मिला. लेकिन 90 फीसदी MSMEsया ग्राहकों को स्मॉल और मीडियम साईज NBFCs ही कर्ज देते हैं. इनका एक्सेस कैपिटल मार्केट में भी नहीं हैं अब ये सिडबी या नाबार्ड से सीधे फंडिंग या स्पेशल विंडो की मांग कर रहे हैं.

ये भी पढ़ें: जानें गोल्‍ड या इक्विटी म्‍यूचुअल फंड में बेहतर कौन? कहां मिलेगा तगड़ा मुनाफा



MSMEs के लिए 3 लाख करोड़ के इमरजेंसी क्रेडिट लाईन गारंटी स्कीम में बैंकों ने करीब सवा लाख करोड़ रूपए का कर्ज मंजूर कर लिया है. लेकिन NBFCs का योगदान बेहद कम है. इस पर वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने गंभीर चिंता जताई है. लेकिन इसके असली कारणों पर विचार होना भी जरूरी है.
आमतौर पर ख़राब क्रेडिट प्रोफाईल के चलते जिन ग्राहकों को बैंकों से लोन नहीं मिल पाता उन्हें NBFCs रिपेंमेंट कैपेसिटी और रिस्क के मुताबिक उंची ब्याज़ दरों पर कर्ज दे देते हैं जो 14-20 फीसदी के आसपास होती है. ऐसे में आरबीआई के मोरोटोरियम के ऐलान यानि EMI नहीं देने की छूट के बाद नुकसान भी इसी ब्याज़ दर के हिसाब से उठाना पड़ रहा है. जिससे उनका बैंलेसशीट एनपीए में तब्दील होता जा रहा है.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज