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Covid-19 Vaccination: भारत और पूरी दुनिया में कोविड-19 टीकाकरण

Covid-19 Vaccination

भारत अब भी कोविड-19 (Covid-19) महामारी की दूसरी लहर से जूझ रहा है, ऐसे में वैक्सीन की सप्लाई और रोलआउट को पूरे देश में बढ़ाया जा रहा है. 28 मई 2021 तक 120,656,061 लोगों को वैक्सीन की पहली डोज़ और 4,41,23,192 लोगों को दोनों डोज़ लग चुकी है.

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    नई दिल्ली. भारत अब भी कोविड-19 (Covid-19) महामारी की दूसरी लहर से जूझ रहा है, ऐसे में वैक्सीन की सप्लाई और रोलआउट को पूरे देश में बढ़ाया जा रहा है. 28 मई 2021 तक 120,656,061 लोगों को वैक्सीन की पहली डोज़ और 4,41,23,192 लोगों को दोनों डोज़ लग चुकी है. भारत में कोवैक्सीन और कोविशील्ड को सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल ऑर्गनाइजेशन (CDSCO) द्वारा इमरजेंसी इस्तेमाल की मंजूरी मिली है और वर्तमान में यही लोगों को लगाई जा रही है.

    कोवैक्सीन को भारत बायोटेक ने इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR)- नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (NIV) के साथ मिलकर देश में ही बनाया है. इसमें निष्क्रिय कोरोनावायरस है जिसे जब शरीर में इंजेकट किया जाता है तो इम्यून सेल्स इसकी पहचान करते हैं. फिर वह इम्यून सिस्टम को वायरस के खिलाफ एंटीबॉडी बनाने के लिए ट्रिगर करता है. क्लिनिकल ट्रायल के तीसरे चरण के एक अंतरिम विश्लेषण में, कोवैक्सिन बीमारी के हल्के और मध्यम मामलों में 78% प्रभावी पाई गई, जबकि कोविड-19 बीमारी के गंभीर मामलों में इसकी प्रभावकारिता 100% रही और अस्पताल में भर्ती होने वालों की संख्या में कमी आई. फिलहाल 4-6 हफ्ते के अंतराल पर इस वैक्सीन की दो डोज दी जा रही है.

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    देश में उपलब्ध दूसरी वैक्सीन है, कोविशील्ड जिसे ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राजेनेका ने बनाया है और भारत में इसका उत्पदान सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया द्वारा किया गया है. एक वायरल वेक्टर वैक्सीन होने की वजह से यह शरीर की कोशिकाओं को महत्वपूर्ण जानकारी देने के लिए एक अलग वायरस या वेक्टर के संशोधित संस्करण (मोडिफाइड वर्जन) का इस्तेमाल करता है. कोविड-19 के लिए जिम्मेदार कोरोनावायरस की सतह पर क्राउन जैसे स्पाइक होते हैं जिन्हें स्पाइक प्रोटीन कहा जाता है. वैक्सीन शरीर को इन स्पाइक प्रोटीन की कॉपी बनाने में मदद करता है. परिणामस्वरूप जब कोई व्यक्ति बाद में बीमारी के संपर्क में आता है तो शरीर वायरस को पहचानने और उससे लड़ने में सक्षम होगा. कोविशील्ड SARS-CoV-2 इंफेक्शन के लक्षण वाले मरीजों पर 76%, गंभीर रूप से बीमार और अस्पताल में भर्ती मरीजों पर 100% और 65 साल व उससे अधिक उम्र के लक्षण वाले मरीजों पर 85% प्रभावी है. भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय (MoHFW) ने वैक्सीन की दो खुराक के बीच 12 से 16 हफ्ते का अंतर रखने की सलाह दी है.

    इस साल अप्रैल में रशियन वैक्सीन, स्पुतनिक वी को भी इमरजेंसी इस्तेमाल की मंजूरी मिल चुकी है और जल्द ही इसे देश के वैक्सीनेशन सेंटर्स पर उपलब्ध कराया जाएगा. कोविशील्ड की तरह, स्पुतनिक वी भी एक वायरल वेक्टर वैक्सीन है और लेट स्टेज ट्रायल में यह कोरोनावायरस के खिलाफ 91.6% प्रभावी पाई गई. स्पुतनिक वी की भी दो डोज़ लगाई जाएगी जिनके बीच 21 दिन का अंतर होगा. हालांकि, इसकी दोनों डोज़ अन्य वैक्सीन से थोड़ी अलग है. इसका आधार है कि दो इम्यूनाइजेशन के इस्तेमाल से लंबे समय तक और टिकाउ इम्यून रिस्पॉन्स मिलता है और यह बीमारी से दीर्घकालिक सुरक्षा प्रदान करने में मददगार है, वैक्सीन की हर जाब (डोज) में एक अलग वेक्टर/निष्क्रिय वायरस का उपयोग किया गया है. स्पुतनिक लाइट नामक वैक्सीन के सिंगल जाब वर्जन विकसित करने का काम भी चल रहा है.

    दुनिया के दूसरे देशों में उपलब्ध अन्य वैक्सीन में शामिल है फाइज़र, मॉर्डना, जॉनसन एंड जॉनसन (जानसेन), साइनोफार्म, कोरोनावैक, नोवावैक, आदि. फाइज़र और मॉर्डना mRNA- बेस्ड वैक्सीन है. जो संक्रामक बीमारियों से बचाव के लिए नए तरह की वैक्सीन है. कमजोर या निष्क्रिय वायरस को शरीर में डालने की बजाय mRNA वैक्सीन कोशिकाओं को प्रोटीन या प्रोटीन का एक टुकड़ा बनाने में सक्षम बनाती है जो शरीर के इम्यून रिसपॉन्स को सक्रिय बनाता है. यदि शरीर असली वायरस के संपर्क में आता है तो इम्यून रिसपॉन्स इससे लड़ने के लिए एंटीबॉडी का उत्पादन कर सकता है. फाइजर इकलौती ऐसी वैक्सीन है जिसे 12 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए मान्यता मिली है. जॉनसन एंड जॉनसन (जानसेन) सिंगल डोज़ वायरल वेक्टर वैक्सीन है जबकि साइनोफार्म और कोरोनावैक में निष्क्रिय वायरस का उपयोग किया गया है.

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    भले ही वैक्सीन के ट्रायल फेज़ की प्रभावकारिता का आकलन किया गया हो, लेकिन इन वैक्सीन की असली प्रभावकारिता का पता लंबे समय में ही लगाया जा सकता है. भारत के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, जब वैक्सीन को इमरजेंसी इस्तेमाल के लिए प्रतिबंधित मान्यता दी जाती है, तो यह पता लगाने के लिए कि वैक्सीन कितने दिनों तक सुरक्षा प्रदान कर सकती है, इसका ट्रायल फॉलोअप 1-2 सालों तक चलता रहता है. वैक्सीन प्रभावकारिता वैक्सीन ट्रायल में किसी बीमारी से बचाव की उसकी क्षमता का माप है. कोविड-19 वैक्सीन के मूल्यांकन के दौरान लक्षण वाली बीमारी पर इसके प्रभाव पर अक्सर ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है, जबकि गंभीर बीमारी, अस्पताल में भर्ती मरीजों और मृत्यु रोकने संबंधी इसकी प्रभावकारिता जैसे कारकों पर ध्यान दिया जाना भी बहुत ज़रूरी है.



    ज़्यादातर वैक्सीन ने ग्लोबल एजेंसियों द्वारा निर्धारित 50-60% प्रभावकारिता के बेंचमार्क के मुकाबले 70-90% की प्रभावकारिता दिखाई है और इसलिए इन्हें सुरक्षित और प्रभावी माना जाता है. वैक्सीन की एक दूसरे से तुलना सावधानी के साथ की जानी चाहिए क्योंकि इनमें इस्तेमाल की जाने वाली तकनीक और जिन स्थितियों में इनका ट्रायल किया गया है, उसमें अंतर है. वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन और सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन सलाह देते है कि जो वैक्सीन पहले उपलब्ध है उसे लें और एक-दूसरे से तुलना न करें. महामारी की तीसरी लहर की संभावना को देखते हुए तेज़ी से ज़्यादा से ज़्यादा लोगों का टीकाकरण करना आज के समय की ज़रूरत है. बीमारी की गंभीरता को देखते हुए, इसके खिलाफ किसी भी तरह की सुरक्षा मददगार होगी.
    Published by:Anita
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