Budget 2021-22: उपज और खेती का रकबा बढ़ा, अब क्या किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए हो सकते हैं बड़े ऐलान?

पिछले एक साल के अन्दर खरीफ की फसल के बुवाई के रकबे में साढ़े आठ प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है.

पिछले एक साल के अन्दर खरीफ की फसल के बुवाई के रकबे में साढ़े आठ प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है.

फसल का रिकार्ड उत्पादन और फसल की रोपाई-बुवाई के रकबे में लगातार इजाफा कृषि क्षेत्र के बढ़वार की ये कहानी हर साल थोड़े हेरफेर के साथ चलते रहती है. रिकार्ड उत्पादन के लुभावने जुमले के बीच यह सवाल दबा रह जाता है कि फसलों के उत्पादन के बढ़ने के साथ किसानों की आमदनी भी बढ़ रही है कि नहीं.

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नई दिल्ली. देश को आर्थिक संकट से निपटने में किसानों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, लेकिन किसान आंदलोन के बीच बजट में इस बात की उम्मीद की जा सकती है कि घाटे का सौदा बनती खेती को संकट से उबारने की कोशिश की जाएगी? नये साल के बाद अब बजट पेश करने की तारीख नजदीक आ रही है. इसके साथ ही अब यह सवाल भी जोर पकड़ता जा रहा है. सारी चीजें रुक जाती हैं लेकिन पेट की भूख नहीं रुकती, सासों के चलते रहने तक पेट में भूख जागती रहती है. जाड़े की हाड़ कंपाती ठंढ़ हो या मई-जून की तपती दुपहरिया जिन्दगी से भूख का यही रिश्ता किसानों को खेत की तरफ हांकता है. ये हमने कोरोना-काल की चढ़ती के दिनों में देखा और इस वक्त में भी देख रहे हैं. कोरोना-काल में सारी चीजें ठप थीं लेकिन तब भी खेती-बाड़ी चल रही थी. और, सच पूछिए तो महामारी के महासंकट के बीच से अभी अर्थव्यवस्था उबरती हुई दिख रही है तो उसमें बड़ा योगदान खेती-बाड़ी का है.

ये बात अटपटी लग रही हो तो यकीन के लिए रिजर्व बैंक की रिपोर्ट कुछ पंक्तियों पर नजर डालना ठीक होगा. लॉकडाउन से क्रमवार छुटकारा पाती अर्थव्यवस्था की सेहत का जायजा लेते हुए रिजर्व बैंक ने 2020 के अक्टूबर माह की मॉनेटरी पॉलिसी रिपोर्ट में लिखा कि कोरोनाबंदी में आर्थिक गतिविधियां बुरी तरह प्रभावित हुईं लेकिन ‘सामान्य मॉनसून, खरीफ के फसलों की जबर्दस्त बुवाई और रिजर्वायर की अच्छी हालत के कारण कृषि का क्षेत्र चमकदार रहा. प्रधानमंत्री गरीब कल्याण रोजगार योजना तथा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में बढ़ी मजदूरी के कारण भी ग्रामीण क्षेत्रों में मांग में बढ़ोत्तरी हुई.’

याद कीजिए, कोविड-काल में फंसी अर्थव्यवस्था के बीच आये जीडीपी के आंकड़ों को. बीते साल 27 नवंबर को प्रेस इन्फार्मेशन ब्यूरो ने सांख्यिकी एवं कार्यक्रम क्रियान्वयन मंत्रालय के हवाले से लिखा था कि साल 2019-20 की शुरुआती दो तिमाहियों में सकल घरेलू उत्पाद(जीडीपी) क्रमशः 5.2 प्रतिशत और 4.4 प्रतिशत बढ़ा था लेकिन साल 2020-21 की पहली और दूसरी तिमाही में जीडीपी में लगातार गिरावट आयी. पहली तिमाही में गिरावट 23.9 प्रतिशत की रही और दूसरी तिमाही में 7.5 प्रतिशत की. लेकिन जीडीपी की इस ऐतिहासिक गिरावट के बीच भी कृषि-क्षेत्र ने बढ़ोत्तरी दर्ज की. कृषि-क्षेत्र साल 2019-20 की ही तरह कोरोना-बंदी के साल 2020-21 की शुरुआती दो तिमाहियों में 3.4 प्रतिशत की दर से बढ़ा.

एक साल में फसल बुवाई का रकबा साढ़े 8 प्रतिशत बढ़ा
रिजर्व बैंक ने अक्टूबर (2020) वाली अपनी रिपोर्ट में सूचना दी गई कि 2019-20 में रबी की फसल के रिकार्ड उत्पादन के बाद दक्षिण-पश्चिम मॉनसून की दरियादिली से 2020-21 में खरीफ की फसल की बुवाई का रकबा बढ़ चला है और आसार ग्रामीण क्षेत्रों में उपभोग के बढ़ने के हैं. रिजर्व बैंक की रिपोर्ट से पहले केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर ये खुशखबरी सुना चुका था कि साल 2019-20 में खरीफ की फसल की बुवाई का रकबा 935 लाख हेक्टेयर था जो 2021 में बढ़कर 1015 लाख हैक्टेयर हो चुका है और साल भर के अन्दर खरीफ की फसल के बुवाई के रकबे में साढ़े आठ प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है.

उत्पादन बढ़ता है लेकिन क्या आमदनी बढ़ती है?

फसल का रिकार्ड उत्पादन और फसल की रोपाई-बुवाई के रकबे में लगातार इजाफा कृषि क्षेत्र के बढ़वार की ये कहानी हर साल थोड़े हेरफेर के साथ चलते रहती है. रिकार्ड उत्पादन के लुभावने जुमले के बीच यह सवाल दबा रह जाता है कि फसलों के उत्पादन के बढ़ने के साथ किसानों की आमदनी भी बढ़ रही है कि नहीं. होता अक्सर यही है कि हर बदलते साल के साथ किसानों की फसल को उपजाने पर आने वाली लागत बढ़ जाती है लेकिन बाजार में फसल के वाजिब और लाभकर दाम नहीं मिल पाते. कभी न्यूनतम समर्थन मूल्य में इजाफा नहीं होता और जब होता है तो इतना नहीं कि बढ़ी हुई मुद्रास्फीति के साथ उस इजाफे का कोई मेल हो. ज्यादातर किसानों को अक्सर लागत से कम कीमत पर अपनी उपज बेचनी पड़ती है. बाजार का अपना नियम है, आपूर्ति ज्यादा हुई तो कीमत नीचे चली आती है.



कोरोना काल में कम कीमत पर फसल बेचने पर मजबूर हुए किसान

मिसाल के लिए कोरोनाबंदी के दौर को ही लें. मार्च के आखिर के हफ्ते में कोरानाबंदी लागू हुई. वह वक्त रबी की फसल को बेचने का था. लेकिन मंडी तक माल पहुंचे कैसे? वाहनों की आवाजाही बंद थी, मंडियों के दरवाजे बंद थे. लोग अपनी-अपनी रिहाइश के इलाकों में रुके-थमे लॉकडाउन के ढीले पड़ने के इंतजार में थे. ऐसे में कटाई-पिटाई और ढुलाई के लिए मजदूरों का टोटा था. लॉकडाउन के तुरंत बाद का वक्त किसानों पर भारी पड़ा. अप्रैल और मई (2020) माह की स्थिति के सर्वेक्षण के आधार अजीम प्रेमजी युनिवर्सिटी के सेंटर फॉर सस्टेनेबल एम्पॉयमेंट ने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि लगभग 88 प्रतिशत किसानों को बाजार में प्रचलित आम कीमत से कम पर उपज बेचनी पड़ी. लगभग 37 प्रतिशत किसान अपनी खड़ी फसल घर तक ही ना ला पाये और कुल 15 प्रतिशत किसान अधिशेष उपज के बावजूद उसे बेच ना सके.

कोरोनाबंदी में किसानों को दोहरी मार झेलनी पड़ी. उपज की बिक्री के मोर्चे पर और फसल की लागत के मोर्चे पर भी. लाकडाउन के कारण रबी की फसल की कटाई के लिए हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश और तेलंगाना जैसे राज्यों में किसानों को प्रवासी खेत-मजदूर कम संख्या में मिले, नतीजतन फसल की कटाई पर पहले की तुलना में उन्हें ज्यादा खर्च करना पड़ा. फसल की कटाई में लगने वाली मशीनरी पर होने वाले खर्चों में भी बढ़ोत्तरी हुई. लागत तो बढ़ी लेकिन बाजार में सामान औने-पौने दाम बिका.

आमदनी बढ़ाने की चुनौती

लागत और उपज से वसूल होने वाली कीमत का अन्तर जीविका में घाटे की कहानी बनकर किसानों की किस्मत का अमिट लेखा बन गया है. सरकार किसानों की आमदनी में प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष इजाफे के लिए कदम उठाती है लेकिन वह पर्याप्त साबित नहीं होता. जैसे प्रधानमंत्री किसान-सम्मान निधि (पीएम-किसान) योजना का ही उदाहरण लें.

इस योजना के अन्तर्गत आमदनी में सहायता राशि के तौर पर किसानों को साल में किश्तवार कुल 6,000 रुपये दिये जाते हैं. साल 2019 में शुरू हुई ये योजना लोकप्रिय तो है लेकिन आमदनी बढ़ाने के मामले में ये योजना ऊंट के मुंह में जीरा की तरह है. इस योजना के दायरे में सिर्फ भूस्वामी छोटे और सीमांत किसान आते हैं. जीविका के लिए कृषि-कर्म पर निर्भर भूमिहीन खेत-मजदूर इस योजना के लाभार्थियों में शामिल नहीं. विशेषज्ञ बताते हैं कि कुल साढे 14 करोड़ लोगों को पीएम-किसान योजना के लाभार्थी होने चाहिए लेकिन योजना सिर्फ 8 से 9 करोड़ किसानों को ही लाभार्थियों के दायरे में समेटती है.

दूसरी बात, किसानों की इस तादाद को राज्यवार पीएम-किसान निधि के हुए भुगतान के हिसाब से देखें बड़ा अन्तर दिखायी देता है. मिसाल के लिए बड़ी किसान-आबादी वाले राज्य उत्तरप्रदेश का उदाहरण लें. पीएम-किसान योजना से संबंधित सरकारी बेवसाइट पर दर्ज आंकड़ों के मुताबिक वित्तवर्ष 2020-21 में यूपी में योजना के कुल लाभार्थियों (2 करोड़ 71 लाख) में मात्र 78 प्रतिशत (2 करोड़ 12 लाख) को ही राशि की तीसरी किस्त का भुगतान हुआ है. ओडिशा में पीएम-किसान योजना के लाभार्थी किसानो ं(40 लाख 49 हजार) में केवल 59 प्रतिशत (23 लाख 94 हजार) किसानों को तीसरी किश्त की राशि अदा हुई है. पश्चिम बंगाल में यह आंकड़ा 71 प्रतिशत का है तो गुजरात में 77 प्रतिशत का. लेकिन इस कड़ी के दूसरे छोर पर मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और बिहार जैसे राज्य भी हैं जहां योजना के लाभार्थी किसानों में 90 प्रतिशत या इससे ज्यादा तादाद में किसानों को तीसरी किश्त की रकम मिली है.

किसानों की आमदनी बढ़ाने का एक आजमाया तरीका न्यूनतम समर्थन मूल्य में बढ़ोत्तरी का रहा है. सरकार ने इस दिशा में कोशिश की. साल 2019-20 के खरीफ और रबी की फसल का न्यूमतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाने की घोषणा हुई. कहा गया समर्थन मूल्य तय करने के लिए जिस फार्मूले का इस्तेमाल हुआ है उसमें ध्यान रखा गया है कि किसानों को उपज की लागत 1.5 गुना मूल्य मिले.

लेकिन विशेषज्ञों ने तय फार्मूले की आलोचना की, ध्यान दिलाया कि स्वामीनाथन आयोग ने अपनी सिफारिशों में फसल के न्यूनतम मूल्य को लागत से ड्योढ़ा रखने के लिए जो फार्मूला सुझाया था, उसका पालन नहीं हुआ. आयोग ने कहा था कि एमएसपी को निर्धारित करते वक्त फसल की लागत के आकलन में ध्यान रखा जाना चाहिए कि किसान को बीज, खाद, कीटनाशक आदि के साथ-साथ खेत-मजदूरों पर कितना खर्चा करना पड़ा. घर के जिन सदस्यों ने खेती-बाड़ी के लिए काम किया उनके परिश्रम का मूल्य भी जोड़ा जाय और ये भी देखा जाय कि खेती की जमीन से क्या रेंट हासिल होता. लेकिन, विशेषज्ञ के मुताबिक एमएसपी के निर्धारण में सरकार ने ऐसे फार्मूले का पालन नहीं किया.

देश की किसान-आबादी में छोटे और सीमांत किसानों की तादाद सबसे ज्यादा (82 प्रतिशत) है. किसानों की आमदनी को दोगुना करने की दिशा में राह सुझाने के लिए बनायी गई अशोक दलवई समिति ने अपने 14 खंडों की रिपोर्ट के दूसरे खंड में दर्ज किया है कि सीमांत और छोटे किसान-परिवारों की औसत आमदनी (साल 2015-16 में 2011-12 के मूल्यों को आधार मानकर) 61,138 रुपये है. तो, गणित बड़ा सीधा सा है कि देश के लगभग 80 प्रतिशत किसान-परिवारों को खेती-बाड़ी से महीने के पांच हजार रुपये ही मिल पाते हैं. और, इस रकम में देश के अधिसंख्य किसान-परिवार वैसा भी जीवन गुजारने की उम्मीद नहीं पाल सकते जैसा कि सरकारी महकमे में चपरासी की नौकरी पर नया-नया बहाल, सातवें वेतनमान के हिसाब से महीने के 20 हजार रुपये तनख्वाह पाने वाला नागरिक.

जाहिर है, हर बार की तरह इस बार भी किसानों की बजट से आस बंधी होगी. वे उम्मीद पालेंगे कि बजट में ऐसा कुछ हो जो उनकी कभी ठहरी तो कभी गिरती आमदनी को संभाले, बजट में कुछ ऐसा हो किसानों को लगे कि आमदनी दोगुनी करने के वादे की तरफ सरकार सचमुच आगे बढ़ी है.
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