सुधर रही है भारत की अर्थव्यवस्था, इन आंकड़ो से मिल रहे हैं संकेत, जानिए किन सेक्टरों में आ रही है तेज़ी?

सुधर रही है भारत की अर्थव्यवस्था, इन आंकड़ो से मिल रहे हैं संकेत, जानिए किन सेक्टरों में आ रही है तेज़ी?
सुधार रही है भारत की अर्थव्यवस्था, जानिए किन सेक्टरों में आ रही है तेज़ी?

कोरोनावायरस (Covid-19) के कारण अचानक झटके से रुक गई देश के अर्थव्यवस्था की गाड़ी फिर धीरे-धीरे सरकने लगी है. अब चाहे देश की सरकार हो, रिजर्व बैंक हो, नीति आयोग हो या फिर देश-विदेश के निवेशक, सबके सामने एक ही सवाल है कि भारत की अर्थव्यवस्था एक बार फिर कब अपनी पटरी पर पुरानी गति से दौड़ना शुरू करेगी.

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नई दिल्ली. कोरोनावायरस (Covid-19) के कारण अचानक झटके से रुक गई देश के अर्थव्यवस्था की गाड़ी फिर धीरे-धीरे सरकने लगी है. अब चाहे देश की सरकार हो, रिजर्व बैंक हो, नीति आयोग हो या फिर देश-विदेश के निवेशक, सबके सामने एक ही सवाल है कि भारत की अर्थव्यवस्था एक बार फिर कब अपनी पटरी पर पुरानी गति से दौड़ना शुरू करेगी, एक बार फिर कब देश के जीडीपी में वृद्धि की रफ्तार 6-7 प्रतिशत के स्तर पर पहुंचेगी? इस सवाल का जवाब ढूंढने में जुलाई 2020 के लिए जारी कोटक म्यूचुअल फंड की एक रिपोर्ट में पेश आंकड़े काफी महत्वपूर्ण संकेत दे रहे हैं, जिस पर एक नजर डालना रोचक होगा. इस रिपोर्ट में 10 आर्थिक क्षेत्रों के आंकड़ों की कोरोना के पहले से लेकर अब तक की तुलना की गई है, जिनसे अर्थव्यवस्था की दिशा को लेकर कुछ पुख्ता संकेत मिलते हैं.

1. मार्च में जब कोरोना महामारी की शुरुआत हुई थी उसी समय से पेट्रोल-डीजल की खपत में कमी शुरू हो गई थी, क्योंकि कंपनियों ने वर्क फ्रॉम होम शुरू कर दिया था, जिससे निजी गाड़ियों के ट्रांसपोर्ट में कमी आनी शुरू हो गई. मार्च में पेट्रोल की खपत 16% और डीजल की खपत 24% कम हो गई. अप्रैल महीने में जब लॉकडाउन अपने पीक पर था, उस समय देश में पेट्रोल और डीजल की खपत में क्रमशः 60% और 56% तक की कमी आ गई. लेकिन रिपोर्ट में जून के पहले 15 दिनों के जो आंकड़े दिए गये हैं, उनके मुताबिक पेट्रोल-डीजल की यह कमी एक बार फिर क्रमशः 18% और 15% पर पहुंच गई है.

2. देश के सारे उद्योग, सारी फैक्ट्रियां, सारे ऑफिस बिजली से चलते हैं और इनके बंद होने का सीधा असर बिजली की खपत पर पड़ना स्वाभाविक है. यह रुझान लॉकडाउन शुरू होने के बाद बिजली की खपत पर सीधा दिखा. लॉकडाउन की घोषणा 25 मार्च को हुई थी. इससे दो दिन पहले यानी 23 मार्च को देश में बिजली की खपत पिछले साल के इसी दिन की तुलना में 107% ज्यादा थी, लेकिन लॉकडाउन होने के 5 दिन बाद 30 मार्च को यह मांग साल दर साल 70% कम हो गई. यह मांग अगले पूरे महीने तक कायम रही और 27 अप्रैल को भी बिजली की इस मांग में 70% की कमी बनी रही. लेकिन इसके आगे दो महीनों में 25 मई पहुंच गया. इन आंकड़ों से क्या निष्कर्ष निकलता है?



3. देश में इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन के आंकड़े भी कुछ कह रहे हैं. लॉकडाउन से ठीक पहले 20 मार्च को देश में 45.8 करोड़ रुपये का इलेक्ट्रॉनिक टोल कलेक्शन हुआ. लेकिन इसके महीने भर बाद 20 अप्रैल को जब लॉकडाउन का दूसरा फेज शुरू हो चुका था, तब यही कलेक्शन घटकर 8.3 करोड़ रुपये तक आ गया. हालांकि इसके बाद के दो महीनों में 20 मई को यह कलेक्शन एक बार फिर बढ़कर 36.8 करोड़ रुपये पर पहुंच गया और 20 जून को वापस यह 50.4 करोड़ रुपये पर आ गया. साफ है कि देश में एक बार फिर माल का परिवहन गति पकड़ चुका है.
4. GST कलेक्शन देश में औद्योगिक गतिविधियों का सबसे सीधा और नजदीकी सूचकांक है. एक नजर इन पर डालते हैं. मार्च 2020 में जीएसटी कलेक्शन 98000 करोड़ रुपये था जो कि अप्रैल में घटकर 32000 करोड़ रुपये रह गया. मई में लॉकडाउन खुलने के बाद से हालात धीरे-धीरे बदलने लगे हैं और जीएसटी कलेक्शन मई और जून में बढ़कर क्रमशः 62000 करोड़ रुपये और 91000 करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है. जून का आंकड़ा वित्त वर्ष 2019-20 के दौरान संग्रह किए गये औसत मासिक जीएसटी का 90% है.

5. किसी भी माल को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने के लिए ई-वे बिल की जरूरत होती है. यानी ई-वे बिल के आंकड़े सीधे तौर पर औद्योगिक गतिविधियों, खास तौर पर मैन्युफैक्चरिंग से जुड़े होते हैं. तो ई-वे बिल के आंकड़े क्या कहते हैं? जून 2019 में कुल 4.97 करोड़ ई-वे बिल जारी हुए थे. मार्च 2020 में यह आंकड़ा 4 करोड़ था, जो कि अप्रैल में गिर कर 86 लाख रह गया. लेकिन मई में वापस 2.55 करोड़ ई-वे बिल जारी हुए और जून में यह आंकड़ा 3.99 करोड़ पर पहुंच गया जो कि साल भर पहले की तुलना में 80% है.

6. कृषि वैसे भी कोरोना काल में भारतीय अर्थव्यवस्था की सबसे आशाजनक लकीर बनकर उभरी है और खाद की खुदरा बिक्री के आंकड़े भी इसकी गवाही दे रहे हैं. मई 2019 में 20 लाख टन खाद की खुदरा बिक्री हुई थी, जो कि अप्रैल 2020 में 21 लाख टन थी. लेकिन मई 2020 में यह बिक्री दोगुनी यानी 40 लाख टन हो गई.

7. खाद की खुदरा बिक्री का यह रिकॉर्ड आंकड़ा खरीफ सीजन की बुवाई में हुई 18% बढ़ोतरी के आंकड़े से भी मेल खाती है. कृषि मंत्रालय के मुताबिक 2020-21 के दौरान 24 जुलाई तक खरीफ की बुवाई का रकबा 799.95 लाख हेक्टेयर है, जो कि 2019-20 में 675.07 लाख हेक्टेयर था. केवल जून की बात करें, तो 2019 में जहां कुल 155 लाख हेक्टेयर की बुवाई हुई थी, वहीं इस साल जून में यह आंकड़ा दोगुना होकर 316 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया.

8. ट्रैक्टर आधुनिक खेती का एक अभिन्न हिस्सा है और उसके रजिस्ट्रेशन का आंकड़ा भी एक बार फिर कृषि क्षेत्र की असाधारण प्रगति का सबूत है. साल 2019-20 के दौरान हर दिन औसतन 1265 ट्रैक्टर का रजिस्ट्रेशन हुआ था. यह आंकड़ा अप्रैल 2020 में 165 प्रतिदिन का रह गया और मई में यह और गिर कर औसतन 36 रोजाना ट्रैक्टरों तक पहुंच गया. लेकिन जून 2020 में एक बार फिर हर दिन औसतन 1126 ट्रैक्टर रजिस्टर हुए हैं.

9. मैन्युफैक्चरिंग पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (PMI) में लगातार दर्ज किया जा रहा सुधार भी देश की अर्थव्यवस्था की वही कहानी दुहरा रही है, जो अन्य आंकड़े कह रहे हैं. फरवरी 2020 में यह आंकड़ा 54.5 पर पहुंच गया था जो आने वाले महीनों में उद्योग जगत के आत्मविश्वास की कहानी कहता है. मार्च में हालांकि इसमें गिरावट आई लेकिन फिर भी 51.8 के साथ यह तेजी दिखा रहा था. हालांकि अप्रैल में लॉकडाउन के बीच यह इंडेक्स 27.4 तक गिर गया, जो जबर्दस्त निराशा दिखा रहा था. हालांकि मई में यह आंशिक तौर पर सुधर कर 30.8 हुआ और जून में यह मई के मुकाबले 50% बढ़कर 47.2 पर पहुंच गया है.

10. हालांकि अर्थव्यवस्था में आ रहे इस सुधार का एक अन्य पहलू ये भी है कि जिस तेजी से मैन्युफैक्चरिंग में बढ़ोतरी हुई है, उस लिहाज से रोजगार में बढ़ोतरी नहीं हुई है. फिर भी यह तो तय है कि बेरोजगारी के आंकड़े में तेजी से सुधार आया है. अखिल भारतीय स्तर पर बेरोजगारी की दर 12 अप्रैल से 10 मई तक 24% के इर्द-गिर्द रही, लेकिन इसके बाद इसमें लगातार कमी दर्ज की गई है. यह 7 जून को 17.5%, 14 जून को 11.63% और 21 जून को 8.48% पर आ गई है. हालांकि यह अब भी ऊपर है, लेकिन लॉकडाउन के दिनों की तुलना में यह एक तिहाई रह गया है.

देश की अर्थव्यवस्था की दशा-दिशा को बताने वाले इन 10 आंकड़ों में एक ही संदेश है और वह यह कि भारत ने वापस अपनी गति पाने की राह पर तेजी से कदम बढ़ा दिया है और यदि हालात इस तेजी से सुधरे तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होगा कि 2020-21 में भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया के तमाम दिग्गजों के अनुमानों को नकारते हुए 5% वृद्धि दर को वापस छू लेगी.

भुवन भास्कर,  कृषि विशेषज्ञ 
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