इकोनॉमिक सपोर्ट को लेकर भारत की चिंता बढ़ा रही IMF की ये रिपोर्ट, जानें पूरी बात

इकोनॉमिक सपोर्ट को लेकर भारत की चिंता बढ़ा रही IMF की ये रिपोर्ट, जानें पूरी बात
भारत G-20 देशों में सबसे ज्यादा वित्तीय सहायता देने वाला चौथा देश है

मौजूदा महामारी के बीच अर्थव्यवस्था को उबारने के लिए दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों द्वारा उठाए गए कदम ने बेहतर भूमिका निभाई है. इससे पहले की तुलना में कर्ज लेना सरल हुआ है और कॉरपोरेट्स पूंजी जुटा पा रहे हैं.

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नई दिल्ली. कोरोना वायरस महामारी और इसकी वजह से लॉकडाउन ने दुनियाभर की सरकारों का वित्तीय खर्च बढ़ा दिया है. बड़े स्तर पर देखें तो अधिकतर देशों में वहां की सरकारों ने अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए प्रत्यक्ष वित्तीय प्रोत्साहन (Direct Fiscal Stimulus) का विकल्प चुना है. इसमें मौद्रिक सहायता (Monetary Support) भी शामिल है. प्रत्यक्ष वित्तीय प्रोत्साहन के मामले में अमेरिका और यूरोपीय देश (European Nations) सबसे आगे रहे हैं.

IMF ने भारत के लिए क्या कहा?
भारत में इकोनॉमिक सपोर्ट (Economic Support in India) की बात करें तो भारत G-20 देशों में सबसे ज्यादा वित्तीय सहायता (Fiscal Support) देने वाला चौथा देश है. अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (International Monetary Fund) के आंकड़ों से इस बारे में जानकारी मिलती है. इस मामले में ब्राजील शीर्ष पर है, जिसने अपने कुल सकल घरेलू उत्पाद (Gross Domestic Product) का कारीब 12 फीसदी वित्तीय प्रोत्साहन पर खर्च किया है. लेकिन, आर्थिक सपोर्ट के तरीके पर ध्यान दें तो भारत और तुर्की ने बिल्कुल अलग रवैया अपनाया है.

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प्रत्यक्ष खर्च पर ज्यादा भरोसा


अनुमान के मुताबिक, भारत ने अर्थव्यवस्था में प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता के रूप में GDP का 1.2 फीसदी ही खर्च किया है. तरलता उपाय व अन्य मौद्रिक सहायत के जरिए अप्रत्यक्ष वित्तीय प्रोत्साहन के रूप में भारत ने जीडीपी का 4.9 फीसदी खर्च किया है. अधिकतर उभरती अर्थव्यवस्थाओं की सरकारों ने प्रत्यक्ष खर्च को ज्यादा तवज्जो ​दी है. अन्य मौद्रिक उपायों को उन्होंने दूसरे विकल्प के रूप में रखा है.

कितना सही है भारत का तरीका?
अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट से इस बारे में कुछ संकेत मिलते हैं. IMF ने रेखांकित किया है कि बीते दो महीनों के दौरान कई देशों में तरलता सहायता से वित्तीय हालत सुधरी है. इस रिपोर्ट में आईएमएफ ने कहा, 'मार्केट रिकवरी में सबसे अहम भूमिका केंद्रीय बैंकों द्वारा उठाए गए कदमों ने निभाई है.'

क्रेडिट लेना पहले की तुलना में आसान हुआ है. यहां तक की घरेलू कॉरपोरेट बॉन्ड मार्केट यील्ड (Bond Market Yields) में भी गिरावट आई है और प्राइवेट सेक्टर के लिए फंड जुटाना आसान हुआ है. विदेशी निवेशकों से मिलने वाले ब्याज से भी उभारती अर्थव्यवस्थाओं को मदद मिली है. इसमें भारत भी शामिल है. भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने तरलता उपाय में एक फैसला अपरंपरागत टार्गेटेड लॉन्ग-टर्म रेपो रेट का लिया था. इससे क्रे​डिट की शर्तें सरल हुई हैं.

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अर्थव्यवस्था के अनुमान से उलट है बाजार की चाल
लेकिन, इसका एक दूसरा पक्ष भी है. आईएमएफ का कहना है कि आर्थिक स्थिति बेहतर न होने के बावजूद भी वैश्विक स्तर पर बाजारों में बेहतर कारोबार देखने को मिल रहा है. चालू वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) में 5 फीसदी की गिरावट का अनुमान है, लेकिन इक्विटी इंडेक्स में लगातार बढ़त देखने को मिल रही है. लाइवमिंट ने अपनी एक रिपोर्ट में बैंक ऑफ अमेरिका ग्लोबल फंड मैनेजर्स सर्वे का हवाला देते हुए कहा है कि वैश्विक स्तर पर 78 फीसदी फंड मैनेजर्स का मानना है कि साल 1998 के बाद मार्केट ओवरवैल्यूड है.

आईएमएफ ने इस रिपोर्ट में कुछ अनिश्चितताओं को लेकर चेतावनी भी दी है. इसमें व्यापारिक तनाव, कोरोना वायरस महमारी का दूसरा चरण और उम्मीद से ज्यादा गहरी मंदी है. इक्विटी और बॉन्ड मार्केट में करेक्शन देखने को मिल सकता है. ऐसे में संभव है कि भारत भी इससे न बच सके.
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