Economic Survey 2021: क्यों खास है इस बार का आर्थिक सर्वे? जानिए और भी किन बातों पर होगी सभी की नज़र

मुख्य आर्थिक सलाहकार के वी सुब्रमण्यम और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण

मुख्य आर्थिक सलाहकार के वी सुब्रमण्यम और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) आज संसद में आर्थिक सर्वे पेश करेंगी. इसके साथ ही बजट 2021 की औपचारिक शुरुआत भी हो जाएगी. कोरोना के असर से उबर रही अर्थव्यवस्था के बीच इस बार का आर्थिक सर्वे कई मयानों में खास हो सकता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 29, 2021, 8:01 AM IST
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नई दिल्ली. आज यानी 29 जनवरी से वित्त वर्ष 2021-22 के लिए बजट की औपचारिक शुरुआत हो रही है. आज संसद में इकोनॉमिक सर्वे (Economic Survey) पेश किया जाएगा. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण (Nirmala Sitharaman) ने आज जब संसद में इकोनॉमिक सर्वे पेश करेंगी तो अर्थशास्त्री, पॉलिसीमेकर्स, रिसर्चर्स से लेकर अन्य सभी की नज़रे इस बात पर होगी कि वित्त वर्ष 2021-22 के लिए आर्थिक वृद्धि (Economic Growth) का क्या अनुमान है. आमतौर पर इस सर्वे को लेकर कहा जाता है कि यह देश की अर्थव्यवस्था को लेकर सरकार की आधिकारिक रिपोर्ट है. इसमें आर्थिक ग्रोथ के अलावा और भी ऐसी बाते होंगी, जिसके बारे में आपको जानना चाहिए.

क्या होता है आर्थिक सर्वे?

आर्थिक सर्वे देश की अर्थव्यवस्था पर एक तरह का आधिकारिक रिपोर्ट होता है. आमतौर पर इसे आम बजट से एक दिन पहले पेश किया जाता है. इस साल वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण शुक्रवार यानी आज संसद में इसे पेश करेंगी, जोकि आम बजट पेश होने से तीन दिन पहले ही होगा.

आर्थिक सर्वे में क्या होता है?
इससे अर्थव्यवस्था की हालत के बारे में पूरी जानकारी विस्तार से दी जाती है. यह भी बताया जाता है कि भविष्य को लेकर क्या संभावनाएं हैं और आर्थिक मोर्चे पर कौन सी चुनौतियों का सामना करना होगा. इसमें विभिन्न सेक्टर्स की जानकारी होती है और उनमें रिफॉर्म्स व उपायों के बारे में भी बताया गया होता है. इस सर्वे के आउटलुक को देखते हुए ही भविष्य में नीतियां बनाई जाती हैं.

इकोनॉमिक सर्वे तैयार करने की जिम्मेदारी किसकी होती है?

आर्थिक सर्वे तैयार करने की जिम्मेदारी भारत के मुख्य आर्थिक सलाहकार और उनकी टीम की होती है. वर्तमान में मुख्य आर्थिक सलाहकार कृष्णमूर्ति सुब्रमण्यम हैं.



आर्थिक अनुमान में क्या होता है?

आर्थिक सर्वे में अनुमान के अलावा यह भी बताया जाता है कि आखिर क्यों यह माना जाए कि इस अनुमान के मुताबिक अर्थव्यवस्था में ग्रोथ दिखेगी या गिरावट आएगी. इसमें कई बार यह भी बताया जाता है कि किन रिफॉर्म्स की वजह से आर्थिक ग्रोथ को बढ़ाया जा सकेगा.

क्या सरकार इसका पालन करने के लिए बाध्य है?

केंद्र सरकार आर्थिक सर्वे का पूरी तरह से पालन करने के लिए बाध्य नहीं है. यह केवल पॉलिसी गाइड के तौर पर काम करता है. पहले भी ऐसे कई मौके रहे हैं, जब आर्थिक सर्वे और सरकार की नीतियों में विरोधाभास देखने को मिला है. आर्थिक सर्वे इस बात का पूरी तरह से संकेत नहीं देता है कि आम बजट में किन बातों का ऐलान होगा. कई बार आर्थिक सर्वे में पॉलिसी को लेकर जिन बदलावों की सिफारिश की गई होती है, उसे प्रस्तावित बजट में शामिल भी नहीं किया जाता है.

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इस बार के सर्वे में इन तीन बातों पर सभी की खास नज़र होगी.

जीडीपी ग्रोथः इस बार आर्थिक सर्वे में वित्त वर्ष 2021-22 के लिए सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का अनुमान और चालू वित्त वर्ष के लिए जीडीपी आकलन पर होगी. इसी महीने जारी किए गए अपने एडवांस आकलन में केंद्रीय सांख्यिकी कार्यायल (CSO) ने कहा है कि 2020-21 के लिए आर्थिक ग्रोथ -7.7 फीसदी रहेगी.

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) का कहना है कि 2021 में भारत की अर्थव्यवस्था 11.5 फीसदी रहेगी और 2022 में यह 6.8 फीसदी के आसपास रहेगी. भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए इसे ही सबसे बेहतरीन परिदृश्य माना जा रहा है. दरअसल, यह वी शेप्ड रिकवरी को दर्शाता है. इसमें अर्थव्यवस्था जितनी तेजी से लुढ़कती है, उतनी ही तेजी से उबरती है. सरकार के प्रोत्साहन और नीतियों से मांग तेजी से बढ़ती है. इनकम और आउटपुट बढ़ता है, मांग बढ़ती और लोग ज्यादा खर्च करते हैं. कंपनियां अपनी क्षमता का विस्तार करती हैं और ज्यादा लोगों को नौकरी देती हैं.

कोविडनॉमिक्सः दुनियाभर की अर्थव्यवस्थाओं पर कोरोना वायरस महामारी का बुरा असर पड़ा है. हम सभी जानते हैं कि भारत भी इससे अछूता नहीं रहा है. कोरोना की वजह से रेवेन्यू कम हुआ है और टैक्स अनुपालन पर भी असर पड़ा है. लॉकडाउन और फिर उसके भी बाद भी लंबे समय के प्रतिबंध की वजह से कई कंपनियों को अपना कामकाज बंद करना पड़ा है. इससे टैक्स कलेक्शन में गिरावट आई है. वहीं दूसरी ओर स्वास्थ्य सुविधाओं पर खर्च में भारी इजाफा हुआ है. ऐसे में सरकार कई बिज़नेस को मदद करने का ऐलान कर सकती है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत दुनियाभर के कई लीडर्स ने इस महामारी को युद्ध तक करार दिया है. ऐसे में इस बार के सर्वे में कोरोना पर विशेष ध्यान होगा. इसके आर्थिक असर को खत्म करने के लिए अपरंपरागत वित्तीय नीति के बारे जानकारी हो सकती है. हर साल आर्थिक सर्वे में एक स्पेशल चैप्टर होता है, जिसमें नये आइडिया के बारे में बताया जाता है. पिछले ‘थालीनॉमिक्स’ का जिक्र था. ऐसे में क्या इस साल ‘कोविडनॉमिक्स’ का जिक्र होगा?

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फार्म इकोनॉमिक्सः मई 2020 में जब निर्मला सीतारमण ने कृषि रिफॉर्म का ऐलान किया तो बहुत लोगों को लगा कि मोदी सरकार के पास किसानों के प्रति अपने वादे को पूरा करने के लिए बड़ा प्लान है. इसके बाद सरकार जिन तीन कानूनों को संसद में पास कराया, वे मूल रूप से किसानों के उत्पादन के बैरियर-फ्री ट्रेड को लेकर भी था. सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का फ्रेमवर्क भी तैयार किया. इसमें यह भी प्रावधान है कि अगर किसी उत्पाद की रिटेल कीमतें बढ़ती हैं तो उसके स्टॉक लिमिट भी तय की जाएगी.

पिछले कई सालों में कई राजनीतिक पार्टियों ने ऐसे रिफॉर्म्स का ऐलान किया है. यही कारण है कि मौजूदा विरोध में राजनीतिक पार्टियां उतनी मुखर नहीं नज़र आ रही हैं. ऐसे में इस बार के इकोनॉमिक सर्वे में इन रिफॉर्म्स की जरूरत पर एक बार फिर ज़ोर दिया जा सकता है.
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