किसानों की बढ़ेगी आमदनी: मड क्रैब हैचरी टेक्नोलोजी को मिला 2030 तक का पेटेंट, केकड़े का बढ़ेगा निर्यात

शुरू करें ये खास बिजनेस

शुरू करें ये खास बिजनेस

नई दिल्ली. झींगा और केकड़ा पालने वाले किसानों के लिए काफी अच्छी खबर आई है. इस सेक्टर में बिजनेस करने वाले अब झींगा मछली (Shrimp) के साथ-साथ उन्नत किस्म के केकड़े (Mud Crab) का भी निर्यात कर सकेंगे.

  • Share this:

नई दिल्ली. झींगा और केकड़ा पालने वाले किसानों के लिए काफी अच्छी खबर आई है. इस सेक्टर में बिजनेस करने वाले अब झींगा मछली (Shrimp) के साथ-साथ उन्नत किस्म के केकड़े (Mud Crab) का भी निर्यात कर सकेंगे.

केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के तहत काम करने वाले मरीन प्रोडक्ट्स एक्सपोर्ट डेवलपमेंट अथॉरिटी (Marine Products Export Development Authority) ने मड क्रैब हैचरी टेक्नोलोजी का पेंटेंट प्राप्त कर लिया है। यह पेंटेंट भारत सरकार के डिजाइन और ट्रेड मार्क्स महानियंत्रक की तरफ से साल 2030 तक के लिए मिला है।

दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में भारी मांग

एमपीईडीए (MPEDA) के अध्यक्ष के. एस. श्रीनिवास ने बताया कि मड क्रैब हैचरी टेक्नोलोजी का पेटेंट वर्ष 2011 से वर्ष 2030 तक (20 वर्षों के लिए) के लिए मिला है। पुराने वर्ष से इसलिए, क्योंकि पेटेंट के लिए आवेदन वर्ष 2011 में ही दिया गया था। उन्होंने बताया कि मड क्रैब (वैज्ञानिक नाम – Scylla serrata) की दक्षिण पूर्व एशियाई देशों में बहुत अधिक मांग है। इन देशों में जीवित केकड़ों को स्वादिष्ट समुद्री भोजन के रूप में अत्यधिक पसंद किया जाता है।
यह भी पढ़ें- PM-किसान सम्मान निधि की आठवीं किस्त जारी, जानिए इससे जुड़ी दूसरी योजनाएं और उनके फायदे

इस संस्थान ने किया है विकसित

मड क्रैब के लिए हैचरी टेक्नोलोजी को Rajiv Gandhi Centre for Aquaculture (RGCA) ने विकसित किया है। यह समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (MPEDA) की अनुसंधान और विकास शाखा (R&D Branch) है। संस्थान का कहना है कि यह भारतीय एक्वाकल्चर के इतिहास में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है, क्योंकि केंद्र सरकार ने देश में पहली बार इस प्रोद्योगिकी के लिए पेटेंट प्रदान किया है।



किसानों को होगा लाभ

श्रीनिवास का कहना है कि यह तकनीक उन किसानों के लिए वरदान होगा, जो झींगा मछली की खेती पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय एक्वाकल्चर के लिए विविध प्रजातियों पर काम करना चाहते हैं। उनके लिए चारे की आवश्यकताओं को काफी हद तक इस तकनीक से पूरा किया जा सकेगा। एमपीईडीए इस उपलब्धि को देश के एक्वाकल्चर किसानों और आरजीसीए के युवा वैज्ञानिकों को समर्पित कर रहा है जिन्होंने इस मनोबल बढ़ाने वाले उपलब्धि को हासिल करने के लिए अथक परिश्रम किया है।

कठिन प्रक्रिया के बाद मिला है पेटेंट

आरजीसीए ने भारत में मड क्रैब के लिए कोई और हैचरी न होने को ध्यान में रखते हुए मड क्रैब की हैचरी प्रौद्योगिकी के पेटेंट अधिकार के लिए वर्ष 2011 में पेटेंट, डिज़ाइन और ट्रेड मार्क्स महानियंत्रक के पास आवेदन किया था। लंबी और कठिन प्रक्रिया का पालन करने के बाद यह पेटेंट प्रदान किया गया है।

इसके लिए, दुनिया के विभिन्न अनुसंधान संस्थानों ने प्रसिद्ध विशेषज्ञों के साथ इस विषय पर चर्चा की, जिन्होंने विभिन्न शोध संदर्भों को संदर्भित किया और तथ्यों और आंकड़ों के साथ आरजीसीए के वैज्ञानिकों के साथ कई बैठकों का आयोजन किया। विभिन्न मुद्दों का पता लगाने के बाद, आखिरकार 20 साल के लिए एमपीईडीए-आरजीसीए की हैचरी प्रौद्योगिकी को पेटेंट अधिकार देने का निर्णय लिया गया, जो भारत में अद्वितीय है।

यह भी पढ़ें- गूगल कर रहा था मनमानी, इटली ने लगाया 904 करोड़ रुपए का जुर्माना

अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज