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सरकार ने कागजों में 100 दिन रोजगार की गारंटी दी, लेकिन काम दिया साल में 51 दिन, ये है मनरेगा का सच

सरकार ने कागजों में 100 दिन रोजगार की गारंटी दी, लेकिन काम दिया साल में 51 दिन, ये है मनरेगा का सच

साल भर में औसतन 51 दिन ही मिला मनरेगा से काम (File Photo)

साल भर में औसतन 51 दिन ही मिला मनरेगा से काम (File Photo)

मनरेगा से ग्रामीण अर्थव्यवस्था ठीक होने का ख्वाब और उसका सच! यूपी में एक परिवार को अगर साल में 100 दिन का रोजगार मिल भी जाए तो भी महीने में मिलेगा सिर्फ 1675 रुपये और बिहार में सिर्फ 1591 रुपये. साल भर में औसतन 51 दिन ही मिला इस स्कीम से काम. क्या दिल्ली-मुंबई में काम कर चुका कोई परिवार इतनी रकम के लिए गांव में टिकेगा?

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नई दिल्ली. कोरोना वायरस लॉकडाउन (lockdown) की त्रासदी में पिसकर अपने घर पहुंचे मजदूरों के लिए हम जिस मनरेगा योजना की बदौलत गांवों में रोजगार मिलने का ख्वाब पाले बैठे हैं दरअसल, वो उनके ज्यादा काम नहीं आने वाली. मनरेगा में रोजगार देने के नियमों में इतने पेंच हैं कि यूपी में एक परिवार को इसके तहत काम करके साल भर में महज 20,100 रुपये ही मिल पाएंगे. वो भी तब जब सौ दिन काम मिल जाए. क्या आप उम्मीद करते हैं कि महंगाई के इस जमाने में महज 1675 रुपये में एक महीना तक कोई परिवार काम चला लेगा? शहरों में बैठे कुछ लोगों को लगता ही होगा कि मनरेगा (MGNREGA) में रोजगार का मतलब साल भर काम है. लेकिन असल में ऐसा है नहीं.

कोरोना वायरस के चक्कर में काम छूटने के बाद लाखों की संख्या में मेहनतकश अपने गांवों में पहुंच गए हैं. सरकारों ने काम करने के इच्छुक लोगों को  मनरेगा जॉब कार्ड (Job card) बनवाने का सब्जबाग दिखा दिया है. रजिस्ट्रेशन चालू भी हो गया है. लेकिन फायदा कितना मिलेगा, यह आपको हम समझा दे रहे हैं.

इस योजना के तहत प्रत्येक उस ग्रामीण परिवार को एक वित्त वर्ष में कम से कम सौ दिनों का काम प्रदान किया जाता है, जिसका व्यस्क सदस्य अकुशल काम करने का इच्छुक हो. कभी इस योजना से जुड़े रहे विनोद आनंद कहते हैं कि गारंटी 100 दिन की है लेकिन सभी मजदूरों को इतने दिन रोजगार नहीं मिल पाता. रोजगार मिलता भी है तो रेगुलर नहीं होता. इसमें मजदूरी और काम के दिन बढ़ाने की जरूरत है.

दिल्ली, मुंबई या किसी और शहर से घर पहुंच गए लोगों का जॉब कार्ड बन जाएगा. लेकिन क्या वे बिहार में महज 19,100 और यूपी में 20,100 रुपये में साल भर काम करना चाहेंगे. वो भी तब जब इस स्कीम के तहत साल में औसतन 51 दिन ही काम मिल पाता है.

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मनरेगा के तहत काम करते मजदूर (File Photo)


कितना पैसा मिलेगा?

-लॉकडाउन को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक अप्रैल से इसकी मजदूरी में 20 रुपये प्रतिदिन की वृद्धि कर दी है. बढ़ी मजदूरी के बाद सबसे ज्यादा 304 रुपये  हरियाणा में मिलेगा.

-यूपी में 201 रुपये प्रति दिन का रेट है. जबकि सबसे कम 191 रुपये की दर झारखंड और बिहार में होगी. इसके हिसाब से अगर 100 दिन की भी मजदूरी जोड़ लीजिए तो बिहार में प्रति माह का औसत 1591 और यूपी में 1675 रुपये आएगा.

किसके लिए है यह स्कीम?   

ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के मुताबिक मनरेगा स्कीम ग्रामीण परिवारों को तब आजीविका के विकल्प प्रदान करती है जब रोजगार (Employment) का कोई बेहतर विकल्प न हो. जब कोई काम न हो तब के लिए यह एक आजीविका सुरक्षा व्यवस्था है.

गारंटी 100 दिन की, औसतन 51 दिन ही मिलता है काम 

-इस स्कीम में गारंटी तो 100 दिन रोजगार (Employment Guarantee) देने की है, लेकिन क्या ऐसा हो पाता है? जवाब ये है कि इतना काम पाने वालों की संख्या बहुत कम है. लोकसभा में पेश की गई ग्रामीण विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट के मुताबिक 2018-19 में इस स्कीम के तहत प्रति परिवार औसत 51 दिन ही रोजगार मिल पाया था.

-उत्तर प्रदेश और बिहार में तो राष्ट्रीय औसत से कम 42-42 दिन, हरियाणा में 34 दिन, पंजाब में महज 30 दिन, मध्य प्रदेश में 52 और राजस्थान में प्रति मजदूर औसतन 57 दिन ही रोजगार मिला. सबसे ज्यादा 92 दिन तक काम मिजोरम के मजदूरों को मिला.

-यूपी में औसतन 42 दिन काम मिला. यानी इस स्कीम से जुड़े प्रत्येक परिवार को साल में सिर्फ 8442 रुपये मिले. जबकि बिहार में 8022 रुपये. हरियाणा में सबसे अधिक मनरेगा मजदूरी है लेकिन इसने औसतन 34 दिन ही काम दिया. इसका मतलब ये है कि प्रत्येक परिवार को साल भर में यहां 10336 रुपये ही मिले.

सबसे ज्यादा रोजगार इस राज्य में मिलेगा

मनरेगा के तहत सबसे ज्यादा दिन रोजगार छत्तीसगढ़ में मिलेगा. यहां पर सरकार ने साल में 150 दिन की रोजगार गारंटी दे दी है. बढ़े हुए 50 कार्य दिवस के खर्च का वहन राज्य सरकार खुद करेगी. जबकि शेष 100 दिन का पैसा केंद्र सरकार देगी. कोई भी राज्य ऐसा फैसला कर सकता है.

इस तरह मिलता है पैसा

गोरखपुर के एक ग्राम प्रधान अर्जुन मौर्य ने बताया कि अब पैसा सीधे मजदूर के बैंक अकाउंट में जाता है. काम होने से पहले, काम होते हुए (मजदूरों के साथ) और काम कंपलीट होने के बाद की फोटो एप पर डाउनलोड करनी पड़ती है.

मनरेगा को कृषि से जोड़ने की मांग 

ग्रामीण अर्थव्यवस्था के जानकार चौधरी पुष्पेंद्र सिंह कहते हैं कि अगर इस स्कीम को कृषि कार्य से जोड़ दिया जाए तो एक साथ कई समस्याओं का समाधान हो जाएगा. कृषि क्षेत्र के लिए मनरेगा श्रमिकों की मजदूरी 300 रुपये कर दी जाए. इसमें से 200 रुपये सरकार दे और 100 रुपए किसान. तब इन्हें कम से कम 200 दिन काम मिल जाएगा. कृषि क्षेत्र की लागत कम हो जाएगी और इन मजदूरों की मेहनत का इस्तेमाल गैर जरूरी कार्यों में बंद हो जाएगा.

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10 करोड़ लोगों को साल में 100 दिन काम मिले तो कितना बड़ा होगा मनरेगा का बजट


बजट कम, कैसे मिलेगा शहरों से आए लोगों को काम

पुष्पेंद्र सिंह कहते हैं कि 2020-21 में इसका बजट 61,500 करोड़ रुपये का है, जबकि पिछले वित्त वर्ष में इस पर 71 हजार करोड़ खर्च हुए थे. अब शहरों से जोग लोग गांवों में आए हैं उन्हें मिलाकर यदि 10 करोड़ लोगों को रोजगार देना पड़ा तो 20 हजार रुपये सालाना औसत को जोड़ने पर इसका बजट 2 लाख करोड़ रुपये का बनाना पड़ेगा. क्या सरकार ऐसा करेगी?

...फिर भी इस नेक काम में मनरेगा की अहम भूमिका

पैसे की बात पीछे छोड़ दी जाए तो मनरेगा को खारिज नहीं किया जा सकता. मनमोहन सिंह सरकार में गरीबों के लिए शुरू की गई यह स्कीम रोजगार विहीन लोगों के लिए एक ताकत बनकर उभरी. यही नहीं इसे मोदी सरकार ने भी जारी रखा हुआ है. कुछ नहीं से कुछ बेहतर वाली स्थिति है. इसके जरिए जल संकट को कम करने की दिशा में काफी काम करवाया गया है.

यह ‘जल शक्ति अभियान का बड़ा हिस्सा है. ग्रामीण विकास मंत्रालय का दावा है कि इसके तहत 1 अप्रैल 2014 से लेकर 31 मार्च 2019 तक देश के छोटे-बड़े 20,03,744 तालाबों  को ठीक करवाया गया. दावा है कि इसके जरिए महाराष्ट्र में जलयुक्त शिवहर अभियान से 22,590 गांवों में सकारात्मक असर पड़ा. जबकि मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन योजना के तहत इसके जॉब कार्ड धारकों द्वारा राजस्थान के 12,056 गांवों में जल संकट से निपटने का काम करवाया गया.

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Tags: Mahatma Gandhi NREGA yojna, Modi government, Rural economy, Village society

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