मनरेगा को कृषि क्षेत्र से जोड़ने की वकालत, फायदे में होंगे मजदूर और किसान

मनरेगा को कृषि क्षेत्र से जोड़ने की वकालत, फायदे में होंगे मजदूर और किसान
अभी 60-70 हजार करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद साल में मनरेगा मजदूरों को सरकार औसतन 51 दिन ही रोजगार उपलब्ध करवा पा रही है. कृषि क्षेत्र से जोड़ने पर 200 दिन तक मिल सकता है काम

अभी 60-70 हजार करोड़ रुपये खर्च करने के बावजूद साल में मनरेगा मजदूरों को सरकार औसतन 51 दिन ही रोजगार उपलब्ध करवा पा रही है. कृषि क्षेत्र से जोड़ने पर 200 दिन तक मिल सकता है काम

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नई दिल्ली. मनरेगा (MGNREGA) की ड्रॉफ्टिंग कमेटी से जुड़े रहे विनोद आनंद ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून को कृषि से जोड़ने की वकालत की है. उनका कहना है कि इस वक्त मजदूर और किसान दोनों संकट में हैं. इसे जोड़ने से दोनों की समस्या एक साथ हल हो जाएगी. मजदूर को ज्यादा रोजगार और पैसा मिलेगा और कृषि क्षेत्र में लागत कम हो जाएगी. मनरेगा में अभी भ्रष्टाचार बहुत है. ग्राम प्रधान ज्यादातर काम कागज में करवाते हैं. लेकिन जब इसे कृषि से जोड़ दिया जाएगा तो किसान खेत में काम करवाएगा. आनंद का कहना है कि 200 से 300 रुपये सरकार दे और 100 रुपये किसान. इससे मजदूर के पास ज्यादा पैसा होगा.

60-70 हजार करोड़ रुपये खर्च करने के बाद इसकी सच्चाई ये है कि 100 दिन रोजगार (Employment Guarantee) देने के बावजूद औसतन 51 दिन काम मिलता है.  जबकि कृषि क्षेत्र से जोड़ने के बाद मजदूरों को 200 दिन तक काम मिल सकता है. लोकसभा में पेश की गई ग्रामीण विकास मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार 2018-19 में इस स्कीम के तहत प्रति परिवार औसत 51 दिन ही रोजगार मिल पाया था.

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साल भर में औसतन 51 दिन ही मिला मनरेगा से काम (File Photo)




उत्तर प्रदेश और बिहार में तो राष्ट्रीय औसत से कम 42-42 दिन, हरियाणा में 34 दिन, पंजाब में महज 30 दिन, मध्य प्रदेश में 52 और राजस्थान में प्रति मजदूर औसतन 57 दिन ही रोजगार मिला. जबकि यह सब कृषि प्रदेश हैं. योजना को खेती के लिए लागू करने के बाद काफी बदलाव आ सकता है. इस समय ग्रामीण विकास और कृषि मंत्रालय एक ही व्यक्ति के पास है इसलिए इसमें तकनीकी दिक्कत भी नहीं आएगी.
ग्रामीण अर्थव्यवस्था के जानकार पुष्पेंद्र सिंह ने भी ऐसी ही मांग उठाई है. उनका कहना है कि कृषि क्षेत्र के लिए मनरेगा श्रमिकों की मजदूरी 300 रुपये कर दी जाए. इसमें से 200 रुपये सरकार दे और 100 रुपए किसान. इससे खेती-किसानी की लागत कम हो जाएगी और इन मजदूरों की मेहनत का इस्तेमाल गैर जरूरी कार्यों में बंद हो जाएगा.

हालांकि, अब तक केंद्र सरकार इसके लिए राजी नहीं दिख रही है. एक इंटरव्यू में कृषि एवं ग्रामीण विकास मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा है कि मनरेगा मजदूरों को किसानों के खेतों में भेजने पर उसका हिसाब-किताब रखना मुश्किल होगा. ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियां जारी रखने के उद्देश्य से ही सरकार ने मनरेगा श्रमिकों को प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण) और प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना में काम शुरू करने की अनुमति दी है.

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कृषि क्षेत्र में मजदूरों का बड़ा संकट है


पहली बार एक लाख करोड़ से अधिक हुआ बजट

-साल 2006 में मनरेगा शुरू होने के बाद पहली बार इसका बजट 1 लाख रुपये के पार पहुंच गया है. मोदी सरकार ने कोरोना वायरस संकट को देखते हुए इसका बजट बढ़ा दिया है. अब 2020-21 में इस पर 1,01,500 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे. जबकि पिछले वर्ष इस पर 71 हजार करोड़ रुपये खर्च हुए थे. हालांकि 2020-21 के बजट में सरकार ने 61,500 करोड़ रुपये का बजट ही घोषित किया था. कोविड-19 को देखते हुए इसमें 40 हजार करोड़ और जोड़े गए हैं. ग्रामीण विकास मंत्री तोमर का कहना है कि इससे कुल 300 करोड़ से अधिक मानव दिवस सृजित होंगे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी.

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लॉकडाउन के बावजूद यहां 25 दिन में खरीदा गया रिकॉर्ड 70 लाख मिट्रिक टन गेहूं

 
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