Opinion: पहले मौसम अब कोरोना के दुष्चक्र में पिसे किसान, कैसे डबल होगी 'अन्नदाता' की आमदनी

किसान क्रेडिट कार्ड पर सिर्फ 4 फीसदी लगता है ब्याज
किसान क्रेडिट कार्ड पर सिर्फ 4 फीसदी लगता है ब्याज

लॉकडाउन से अगर फसल की कटाई में देरी हुई और इस बीच बारिश हो गई तो गेहूं और दलहन की फसलों का रंग बदल जाएगा. जिसकी कीमत बाजार में कम लगेगी. ऐसे में किसानों की आमदनी बढ़ेगी तो बिल्कुल नहीं लेकिन कम जरूर हो जाएगी.

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नई दिल्ली. कोरोना वायरस (Coronavirus Covid-19) महामारी को फैलने से रोकने के लिए जिस दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता कर्फ्यू का ऐलान किया उस दिन राशन और सब्जी की दुकानों पर लोग टूट पड़े. लोगों को सबसे ज्यादा चिंता आटा, चावल, दाल और सब्जियों की थी. संकट की इस घड़ी में कोई भी व्यक्ति फ्रिज, टीवी, मोबाइल और गाड़ी लेने के लिए नहीं दौड़ा. दौड़ा तो अन्न लेने के लिए. वही अन्न जो किसान उगाता है. जिन किसानों की कीमत कुछ शहरी लोग नहीं जानते. यही अन्नदाता हमारे नेताओं की नीतियों, जलवायु परिवर्तन और अब चीन से पैदा हुए एक वायरस के दुष्चक्र में पिस रहा है.

कटाई में देरी से बदल जाएगा रंग, घट जाएगी आमदनी
खेतों में गेहूं और सरसों की फसल खड़ी है. किसान इस वक्त खेतिहर मजदूर न मिलने की समस्या से जूझ रहे हैं. ऐसे में अगर कटाई और थ्रेसिंग में देरी हुई तो फसल को नुकसान पहुंचेगा. किसानों का कहना है कि अगर फसल कटाई में देरी हो गई और इस बीच बारिश हुई तो गेहूं और दलहन की फसलों का रंग बदल जाएगा. जिसकी कीमत बाजार में कम लगेगी. सरसों और चने की फसल खेत में ही सूखने की वजह से उसके दाने वहीं गिरकर कम हो गए.

हालांकि, केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर की पहल पर लॉकडाउन में खेती-किसानी की गतिविधियों को छूट मिल गई है. लेकिन ज्यादातर लोग डर के मारे बाहर नहीं निकल रहे हैं. इससे कृषि गतिविधियां सुस्त पड़ गईं हैं. दिल्ली-एनसीआर और मुंबई जैसे शहरों में आकर दिहाड़ी मजदूरी या ठेके पर नौकरी करने वाले जो लोग लॉकडाउन की वजह से वापस अपने गांव लौटे हैं वो भी खेतों में नहीं जा पा रहे हैं. क्योंकि कोरोना वायरस संक्रमण की आशंका में वो अपने गांव पहुंचने के बाद भी 14 दिन कोरेंटाइन में हैं. इसलिए किसान इस वक्त खेतिहर श्रमिकों की समस्या से जूझ रहे हैं.
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गेहूं की फसल कटाई में देरी से होगा किसानों को नुकसान (Photo-Ajay Kumar)




सबसे ज्यादा चिंता आंधी और बारिश की है. मार्च में ही जब फसल तैयार होने के कगार पर थी तब 15 प्रदेशों में सामान्य से बहुत ज्यादा बारिश हुई. जबकि 6 प्रदेश अधिक बारिश वाली श्रेणी में थे. इसमें से ज्यादातर वो हैं जहां सबसे ज्यादा गेहूं, सरसों और दलहन की पैदावार होती है. बारिश भी 10-20 नहीं बल्कि 400 फीसदी से ज्यादा हुई है. उधर, आठ राज्यों में किसान सूखे से परेशान हैं.

बारिश ने तोड़े सारे रिकॉर्ड
भारतीय मौसम विभाग (IMD) के मुताबिक इस साल 1 मार्च से 1 अप्रैल तक झारखंड में सामान्य से 463 फीसदी अधिक बारिश दर्ज की गई. बिहार में 451, उत्तर प्रदेश में 422, हरियाणा में 482, पंजाब में 256, राजस्थान में 384, मध्य प्रदेश में 262, महाराष्ट्र में 156 और छत्तीसगढ़ में 361 फीसदी तक अधिक बरसात हुई. आप अंदाजा लगा सकते हैं कि यहां पर किसानों का कितना नुकसान और क्या हाल हुआ होगा. दूसरी ओर, प्रधानमंत्री फसल बीमा से पैसा मिलने की शर्तें इतनी कठिन हैं कि अब इससे किसानों का मोहभंग हो रहा है.

बारिश और कोरोना वायरस लॉकडाउन के चलते किसानों को हुए नुकसान की भरपाई के लिए हरियाणा सरकार के अलावा किसी भी राज्य में कोई पहल नहीं हुई है. हरियाणा में सरकार ने अनुमान लगाया है कि गेहूं की खरीद में 20 दिन की देरी हो सकती है. इसलिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के ऊपर 125 रुपये प्रति क्विंटल तक की दर से बोनस देने का फैसला लिया गया है. यहां 1925 रुपये प्रति क्विंटल गेहूं का एमएसपी है. लेकिन किसानों को इसका दाम 2050 रुपये तक मिलेगा. सभी राज्यों में फसल का ऐसा दाम नहीं मिलेगा.

कितनी चुनौतियों से जूझता किसान

पिछले एक साल में ही प्राकृतिक आपदाओं से 114.295 लाख हेक्टेयर फसली क्षेत्र तबाह हो गया है. किसानों के 71,755 पशु मारे गए हैं. ये तो फाइलों में दबे पड़े सरकारी आंकड़े हैं. जमीन पर हालात कहीं ज्यादा खतरनाक हैं. केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अधिकारी मानते हैं कि मानसून के बदलते पैटर्न से गेहूं, धान, मक्का, मूंगफली और आलू जैसी कुछ फसलों के उत्पादन पर असर पड़ेगा. क्योंकि भारत में कृषि क्षेत्र जलवायु परिवर्तन के प्रति बहुत संवेदनशील है.

अधिक तापमान फसल की पैदावार को कम कर देता है. बारिश उसे बर्बाद कर देती है. अनुकूल मौसम न हो तो खर पतवार और कीटों की संख्या बढ़ती है. इसी साल आपने देखा होगा कि पाकिस्तानी टिड्डियों के हमले ने राजस्थान और गुजरात में किसानों को बड़ा नुकसान किया है. दोनों प्रदेशों में करीब 1.5 लाख हैक्‍टेयर फसल बर्बाद हो गई है.

पिछले दो साल में डाई, तितली, गाजा, फेथाई, फैनी और बुलबुल नाम के चक्रवातों ने तटीय क्षेत्रों के किसानों के जीवन को और संकटमय बना दिया है. प्राकृतिक और आदमी द्वारा खुद की पैदा की गई मुसीबतों से लड़कर किसान जो कुछ पैदा करता है उसका भी बाजार में उचित मूल्य नहीं मिलता.

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मार्च में बेमौसम बारिश और ओले की वजह से गेंहू, सरसों, चना, मसूर जैसी फसलें खराब हुई हैं


नहीं मिलता उचित दाम

इसी साल 4 फरवरी को मोदी सरकार ने लोकसभा में बताया है कि गेहूं पैदा करने में किसान को प्रति क्विंटल 923 रुपये खर्च करने पड़ते हैं. सरकार ने इस खर्च पर 108.6 फीसदी मुनाफ जोड़कर इसका एमएसपी 1925 रुपये प्रति क्विंटल तय किया. जबकि दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने माना है कि एक क्विंटल गेहूं पैदा करने में किसान 1744 रुपये खर्च करता है. उन्होंने इस पर 50 फीसदी मुनाफा यानी 872 रुपये जोड़कर इसका एमएसपी 2616 रुपये तय किया है.

सवाल ये खड़ा हुआ कि एक ही देश में एक ही फसल पैदा करने की लागत के सरकारी आंकड़े में इतना अंतर क्यों है? मैं खुद किसान परिवार से आता हूं. जानता हूं कि लागत बढ़ने से खेती करना कितना मुश्किल होता जा रहा है. क्योंकि फसलों का उचित दाम ही नहीं मिलता.

फसलों का उचित दाम न मिलने से उनकी आमदनी नहीं बढ़ रही है. सरकार ने 2022 तक उनकी आमदनी दोगुनी करने का लक्ष्य तो रखा है लेकिन अब तक की प्रगति से इस लक्ष्य को पाना आसान नहीं दिखता. क्योंकि किसान की ज्यादातर फसलों के दाम की कोई गारंटी नहीं है.

सारी दुनिया अपना प्रोडक्ट मैक्सिमम रिटेल प्राइज (MRP) पर बेचती है लेकिन किसानों की फसल का मिनिमम सपोर्ट पाइस (MSP) तय होता है. मतलब उद्योग जगत अपने उत्पाद का अधिकतम रेट लेता है और किसान न्यूनतम.

यूं ही नहीं ‘कृषक परिवारों के स्‍थिति आंकलन सर्वेक्षण 2013’ में पता चला था कि बिहार में किसानों की एक महीने की कमाई सिर्फ 3558 और यूपी में 4923 है. पंजाब का किसान हर महीने 18059 रुपये कमाता है. यह देश में अधिकतम है. लेकिन जब हम राष्ट्रीय स्तर पर किसानों की औसत मासिक आय निकालते हैं तो यह महज 6426 रुपये होती है.

इसमें से भी उसके 6223 खर्च हो जाते हैं. महीने में उसके पास सिर्फ 203 रुपये बचते हैं. इस भयावह हालात के बाद भी उनके घाटे की भरपाई सरकारी नीतियों से नहीं हो पा रही है. हालांकि, पीएम किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं के जरिए किसानों को नगद पैसे देकर उनकी माली हालत सुधारने की कोशिश जारी है.

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कितना नुकसान सहता है किसान

कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा ने बताया कि आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी-Organisation for Economic Co-operation and Development) की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2000 से 2016-17 के बीच यानी 16 साल में भारत के किसानों को उनकी फसलों का उचित दाम न मिलने के कारण करीब 45 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है. इस नुकसान की भरपाई के लिए न तो कोई सरकार कभी आगे आई और न ही रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने इस पर चिंता जाहिर की.

आज भारत के हर किसान परिवार पर औसतन 47,000 रुपये का कर्ज लदा हुआ है. तकरीबन 68 प्रतिशत किसान-परिवारों की आमदनी नकारात्मक है. करीब 80 फीसदी किसान बैंक लोन न चुका पाने की वजह से आत्‍महत्‍या कर रहे हैं और इस वक्‍त देश में क़रीब 60 फीसदी किसान परिवार कर्ज में डूबे हैं. लेकिन जमीनी स्‍तर पर उनके लिए काम नहीं दिखता. ऊपर से प्राकृतिक आपदा, कृषि से जुड़े लोगों का भ्रष्टाचार और अब कोराना वायरस की मार.

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