अरविंद सुब्रमण्यन बोले- 2019 के चुनाव में सरकार का इकॉनमिक रिपोर्ट कार्ड भी रखेगा मायने

अरविंद सुब्रमण्यन ने यह भी कहा कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम का विचार, बहुत दिन से अटका पड़ा है लेकिन सरकार को इसे लागू करते वक्त बहुत ही सावधान रहना होगा.

News18Hindi
Updated: December 9, 2018, 6:11 AM IST
अरविंद सुब्रमण्यन बोले- 2019 के चुनाव में सरकार का इकॉनमिक रिपोर्ट कार्ड भी रखेगा मायने
पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रहमणियन
News18Hindi
Updated: December 9, 2018, 6:11 AM IST
(रौनक सिंह गुंजन)

पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यन ने अपनी नई किताब 'ऑफ काउंसिल: द चैलेंजिस ऑफ मोदी-जेटली इकॉनोमी (Of Counsel: The Challenges of the Modi-Jaitley Economy)’ में बताया कि कैसे नोटबंदी के लागू होने के बाद ही राजनीतिक रूप से सफल दिखाई देने लगा.

News18 को दिए एक साक्षात्कार में अरविंद सुब्रमण्यन ने यह स्पष्ट किया कि आगामी लोकसभा चुनाव 2019 के लिए इकॉनमिक रिपोर्ट कार्ड सरकार के लिए कैसे जरूरी है. उन्होंने इस बात पर भी चर्चा की कि क्यों ऋण माफी और मिनिमम सपोर्ट प्राइस से खेती के संकट दूर नहीं हो सकते.

अरविंद सुब्रमण्यन ने यह भी कहा कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम का विचार, बहुत दिन से अटका पड़ा है लेकिन सरकार को इसे लागू करते वक्त बहुत ही सावधान रहना होगा.

यह भी पढ़ें:  नोटबंदी पर अरुण जेटली, 2014 से पहले बैंकों को लूटा गया था हमने उनका गला दबाया

यहां पढ़ें साक्षात्कार के संपादित अंश -

सवाल - किताब का विचार कैसे आया? 
Loading...

मैं पदमुक्त होने की तैयारी में था उसी वक्त मेरे दिमाग में किताब का विचार आया. मैं और मेरी टीम एक दिन साथ बैठी और हमने पाया कि हमने बहुत सारी चीजों पर काम किया है. उदाहरण के लिए कुछ भाषण जो मैंने दिए हैं और कुछ अलग चीजें जो मैंने लिख रखी हैं. तो हमने सोचा कि इन सभी चीजों का संकलन किया जाए जो कि इकॉनमिक सर्वे में नहीं है. हालांकि जब मैं चीजों को इकट्ठा करने बैठ तो मुझे लगा कि कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर मैं अपनी राय दे सकता हूं और वह मौजूद चर्चा में कुछ नया जोड़ सकते हैं.

सवाल - आपने नोटबंदी को 'बड़ा, कठोर, मौद्रिक झटका' करार दिया है. क्या गलत हुआ?

दो पहेलियां है जिनके बारे में मैंने किताब में बात की है. पहली पहेली यह है कि एक ओर नोटबंदी के बाद जहां नकदी की भारी कमी हो गई और कई लोगों पर इसका असर पड़ा तो क्यों यह राजनीतिक तौर पर सफल हो गया, खासतौर से उत्तर प्रदेश चुनाव में. दूसरी पहेली जिस पर किसी का ध्यान नहीं है वह यह है कि सप्लाई का 86 फीसदी धन वापस ले लिया गया जबकि GDP पर इसका असर लगभग नहीं दिखा.

यह भी पढ़ें:   EC को कालेधन पर बोलने का हक नहीं: अरुण जेटली

सवाल यह है कि क्या यह इसलिए है कि हम जीडीपी को सही तरह से नहीं मापते, क्या ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हम अनौपचारिक क्षेत्र को नहीं मापते, क्या ऐसा इसलिए हुआ कि आप यह नहीं समझ सके कि नकदी कैसे काम करती है या ऐसा इसलिए हुआ कि कई सारे अनौपचारिक इंतजाम थे, जिसके चलते अर्थव्यवस्था में इतना लचीलापन था. अब जबकि मैं अध्ययन क्षेत्र में हूं तो मैं पीछे जाकर इन तीनों सवालों का विश्लेषण करुंगा क्योंकि अगर आप भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था को जानना चाहते हैं तो यह वे तीन महत्वपूर्ण सवाल हैं.

सवाल - क्या आपको लगा है कि नोटबंदी और जीएसटी साल 2019 के चुनाव के लिए महत्वपूर्ण कारक होंगे?

निश्चित रूप से सरकार का आर्थिक रिकॉर्ड चुनावों में एक मुद्दा होगा. इसमें किसान, विकास, नौकरियां शामिल है. तथ्य यह है कि सरकार ने शौचालय, बिजली, आवास, बीमा, कम मुद्रास्फीति दिया है. जीएसटी, नोटबंदी के साथ-साथ सरकार के आर्थिक रिकॉर्ड का आकलन किया जाएगा. यह एक आकर्षक चुनाव होगा.

सवाल - आलोचकों का कहना है कि यूनिवर्सल बेसिक इनकम (Universal Basic Income -UBI)के लिए भारत अभी तैयार नहीं है. क्या आप इससे सहमत हैं?

यह भी पढ़ें:  GDP के नए आंकड़ों पर जेटली बोले- कांग्रेस ने पहले की तारीफ, अब विरोध क्यों?

नहीं मैं ऐसा नहीं मानता. मेरी जम्मू और कश्मीर सरकार से इस पर बातचीत हुई. वह अविकसित UBI फॉलो कर रहे हैं. मेरी नीतीश कुमार से भी बातचीत हुई, जो इस विचार के प्रति बहुत उत्साहित हैं. मेरा मानना है कि केंद्र, राज्यों को खर्त करने की आजादी दे तो संभव है कि कुछ राज्य UBI फॉलो करेंगे.

सवाल - बीते कुछ सालों से खेती से जुड़ी समस्याएं स्थायी हो गई हैं. MSP और ऋण माफी, किसानों की दो प्रमुख मांगे हैं. इस बड़ी समस्या का क्या निदान है?

मुझे लगता है कि एमएसपी समाधान नहीं है क्योंकि अनाज के बाहर हम खरीद के जरिए इन कीमतों का समर्थन नहीं कर पा रहे हैं. दशकों से लगभग सभी फसलों के लिए हमारे पास एमएसपी है और हम खरीद नहीं पाए हैं. एमएसपी का भी बहुत खराब प्रभाव पड़ता है. उदाहरण के लिए चावल के लिए एमएसपी के चलते लोग इसकी ज्यादा खेती करने को प्रोत्साहित हुए. हमारे पास चावल के भारी स्टॉक हैं, ऐसे चावल हैं जो हम अंतरराष्ट्रीय बाजारों में निर्यात करना शुरू करते हैं और हमारे व्यापार भागीदार नाराज हो सकते हैं. इसके अलावा इसमें पानी, उर्वरक लगता है.

मुझे लगता है कि हमें एमएसपी नीति पर फिर से विचार करना चाहिए और किसानों को प्रत्यक्ष हस्तांतरण की ओर बढ़ना चाहिए क्योंकि हमें कृषि संकट के बारे में कुछ गंभीरता से करने की आवश्यकता है. हमें कुछ नया करना है क्योंकि पुरानी चीजें काम नहीं कर रही हैं और हमें ऐसे तरीके अपनाना है जो पर्यावरण और कृषि के लिए टिकाऊ हो.

ऋण माफ करना भी अपने आप में बड़ी समस्या है. जो शख्स उधार नहीं लेता उस पर दबाव बढ़ता है. जो उधार लेता है और वापस देता है उसे भी दंड भुगतना पड़ता है. ऐसे में पैसे वापस जमा करने की संस्कृति खत्म हो जाती है. इससे लंबे समय तक समस्या का हल नहीं हो सकता.

यह भी पढ़ें:  OPINION । राजनीतिक गणित के चलते RBI से टकराव के मामले में पीछे हटी सरकार 
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर