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फिच ने भारत का GDP आर्थिक ग्रोथ अनुमान 7% से घटाकर 6.8% किया, जानिए इससे जुड़ी सभी बातें

News18Hindi
Updated: March 22, 2019, 11:51 AM IST
फिच ने भारत का GDP आर्थिक ग्रोथ अनुमान 7% से घटाकर 6.8% किया, जानिए इससे जुड़ी सभी बातें
फिच ने भारत का GDP आर्थिक ग्रोथ अनुमान 7% से घटाकर 6.8% किया, जानिए इससे जुड़ी सभी बातें

दुनिया की बड़ी रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने अप्रैल से शुरू हो रहे अगले वित्त वर्ष (FY20) में भारत की आर्थिक विकास दर अनुमान 7 फीसदी से घटाकर 6.80 फीसदी कर दिया है.

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  • Last Updated: March 22, 2019, 11:51 AM IST
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दुनिया की बड़ी रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने अप्रैल से शुरू हो रहे अगले वित्त वर्ष (FY20) में भारत की आर्थिक विकास दर अनुमान 7 फीसदी से घटाकर 6.80 फीसदी कर दिया है. वहीं, वित्तवर्ष 2020-21 में 7.10 प्रतिशत की दर का अनुमान लगाया है. फिच का कहना है कि आरबीआई ने फरवरी की मौद्रिक नीति समीक्षा में उदार रवैया अपनाते हुए रेपो रेट में 0.25% कटौती की थी. इस साल इतनी ही कटौती और की जा सकती है. फिच के मुताबिक महंगाई दर तय लक्ष्य से नीचे रहने की वजह से आरबीआई ऐसा कर सकता है.

2020-21 में 7.1% रहेगी विकास दर-फिच ने मौजूदा वित्त वर्ष (2018-19) के लिए भी देश की ग्रोथ का अनुमान घटाकर 7.2 कर दिया है. पिछली बार 7.8% की उम्मीद जताई है. रेटिंग एजेंसी ने ग्लोबल इकोनॉमिक आउटलुक में कहा है कि वित्त वर्ष 2020-21 में भारत की जीडीपी 7.1% की दर से बढ़ेगी. पिछला अनुमान 7.3% का था.

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जीडीपी आप पर कैसे असर डालती है- भारत में कृषि, उद्योग और सर्विसेज़ यानी सेवा तीन प्रमुख घटक हैं जिनमें उत्पादन बढ़ने या घटने के औसत के आधार पर जीडीपी दर होती है. ऐसे में अगर देश में तीनों में से किसी भी सेक्टर में ग्रोथ घटती है तो इसका मतलब साफ है कि उससे जुड़े उद्योग संकट में है. लिहाजा नौकरी करने वाले से लेकर सभी पर इसका असर होता है. वहीं, जीडीपी में तेज ग्रोथ आती है तो मतलब साफ है कि नौकरियां बढ़ रही है. लिहाजा लोगों की आमदनी भी तेजी से बढ़ेगी.

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एक्सपर्ट्स बताते हैं कि नकारात्मक जीडीपी यह निर्धारित करता है कि देश आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है. उस समय देश में उत्पादन घट जाता है और बाद बेरोजगारी बढ़ती है. जिसकी वजह से हर व्यक्ति की आमदनी पर इसका असर होता है.

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इस आधार पर तय होती है GDP- भारत में कृषि, उद्योग और सर्विसेज़ यानी सेवा तीन प्रमुख घटक हैं जिनमें उत्पादन बढ़ने या घटने के औसत के आधार पर जीडीपी दर होती है. ये आंकड़ा देश की आर्थिक तरक्की का संकेत देता है. आसान शब्दों में, अगर जीडीपी का आंकड़ा बढ़ा है तो आर्थिक विकास दर बढ़ी है और अगर ये पिछले तिमाही के मुक़ाबले कम है तो देश की माली हालत में गिरावट का रुख़ है.

दो तरह से पेश होती है GDP- जीडीपी को दो तरह से पेश किया जाता है. क्योंकि उत्पादन की लागत महंगाई के साथ घटती-बढ़ती रहती है, यह पैमाना है कॉस्टेंट प्राइस. इसके तहत जीडीपी की दर और उत्पादन का मूल्य एक आधार वर्ष में उत्पादन की कीमत पर तय होता है. मसलन अगर आधार वर्ष 2010 है तो उसके आधार पर ही उत्पादन का मूल्य में बढ़त या गिरावट देखी जाती है. जीडीपी को जिस दूसरे तरीके से पेश किया जाता है वो है करेंट प्राइस. इसके तहत उत्पादन मूल्य में महंगाई दर भी शामिल होती है.(ये भी पढ़ें: अलर्ट! इस महीने के अंत तक बंद हो सकते हैं 1.13 लाख ATM, हजारों नौकरियों पर लटकी तलवार)



सरकारी संस्था सीएसओ करती है ये आंकड़े जारी- केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी सीएसओ देशभर से उत्पादन और सेवाओं के आंकड़े जुटाता है इस प्रक्रिया में कई सूचकांक शामिल होते हैं, जिनमें मुख्य रूप से औद्योगिक उत्पादन सूचकांक यानी आईआईपी और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई हैं.

(1) उत्पादन और सेवाओं के मूल्यांकन के लिए एक आधार वर्ष यानी बेस ईयर तय करता है. इस बेस ईयर में क़ीमतों को आधार बनाकर उत्पादन और सेवाओं की क़ीमत देखी जाती है और उसी हिसाब से तुलनात्मक वृद्धि या गिरावट आंकी जाती है. कॉस्टेंट प्राइस के आधार पर जीडीपी की गणना इसलिए की जाती है ताकि इस आंकड़े को महंगाई के उतार-चढ़ाव से अलग रखकर मापा जा सके.भारत की कॉस्टेंट प्राइस गणना का आधार वर्ष अभी 2011-12 है.ये भी पढ़ें: आप भी ऐसे शुरू करें अपना फूड बिज़नेस, सिर्फ 59 मिनट में मिलेगा लाइसेंस

(2) मान लीजिए अगर 2011 में देश में सिर्फ़ 100 रुपये की तीन वस्तुएं बनीं तो कुल जीडीपी हुई 300 रुपये. और 2017 तक आते-आते इस वस्तु का उत्पादन दो रह गया लेकिन क़ीमत हो गई 150 रुपये तो नॉमिनल जीडीपी 300 रुपये हो गया. यहीं बेस ईयर का फॉर्मूला काम आता है. 2011 की कॉस्टेंट कीमत (100 रुपये) के हिसाब से वास्तविक जीडीपी हुई 200 रुपये. अब साफ़-साफ़ देखा जा सकता है कि जीडीपी में गिरावट आई है.



(3) सीएसओ विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों से समन्वय स्थापित कर आंकड़े एकत्र करता है. मसलन, थोक मूल्य सूचकांक यानी डब्ल्यूपीआई और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई की गणना के लिए मैन्युफैक्चरिंग, कृषि उत्पाद के आंकड़े उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय जुटाता है.

(4) इसी तरह आईआईपी के आंकड़े वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत आने वाला विभाग जुटाता है. सीएसओ इन सभी आंकड़ों को इकट्ठा करता है फिर गणना कर जीडीपी के आंकड़े जारी करता है.मुख्य तौर पर आठ औद्योगिक क्षेत्रों के आंकड़े जुटाए जाते हैं. ये हैं- कृषि, खनन, मैन्युफैक्चरिंग, बिजली, कंस्ट्रक्शन, व्यापार, रक्षा और अन्य सेवाएं.

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First published: March 22, 2019, 11:42 AM IST
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