क्या होती है GDP, इसके गिरने और बढ़ने से आपका क्या बिगड़ेगा?

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Updated: August 31, 2019, 12:54 PM IST
क्या होती है GDP, इसके गिरने और बढ़ने से आपका क्या बिगड़ेगा?
GDP यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (Gross Domestic Products) आखिरी होती क्या है और किसी देश के लिए कितनी जरूरी होती है.

पिछले कुछ दिनों से अखबारों से लेकर आम आदमी तक जिस एक शब्द की खूब चर्चा हो रही है वो जीडीपी है. GDP यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट आखिरी होती क्या है और किसी देश के लिए कितनी जरूरी होती है और इसके गिरने से आपका क्या बिगड़ेगा आइए जानें...

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  • Last Updated: August 31, 2019, 12:54 PM IST
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पिछले कुछ दिनों से अखबारों से लेकर आम आदमी तक जिस एक शब्द की खूब चर्चा हो रही है वो जीडीपी है. GDP यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (Gross Domestic Products) आखिरी होती क्या है और किसी देश के लिए कितनी जरूरी होती है. यह शायद ही कभी आपने सोचा होगा. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि जीडीपी किसी भी देश की आर्थिक (Indian Economy) सेहत को मापने का सबसे जरूरी पैमाना है. आपको बता दें कि चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (India GDP Growth Rate) (अप्रैल-जून) में देश की आर्थिक विकास दर घटकर महज 5 फीसदी रह गई है, जो साढ़े छह साल का निचला स्तर है. पिछले वित्त वर्ष की अंतिम तिमाही में आर्थिक विकास दर 5.8 फीसदी रही थी.

(1) जीडीपी किसी खास अवधि के दौरान वस्तु और सेवाओं के उत्पादन की कुल कीमत है. भारत में जीडीपी की गणना हर तीसरे महीने यानी तिमाही आधार पर होती है. ध्यान देने वाली बात ये है कि ये उत्पादन या सेवाएं देश के भीतर ही होनी चाहिए.

भारत की GDP के आंकड़ों पर एक नज़र (फाइल फोटो)


क्या होगा GDP गिरने से... जीडीपी के कमजोर आंकड़ों के प्रभाव को विस्तार से बताते हुए एक्सपर्ट्स कहते हैं कि 2018-19 के प्रति व्यक्ति मासिक आय 10,534 रुपये के आधार पर, वार्षिक जीडीपी 5 पर्सेंट रहने का मतलब होगा कि प्रति व्यक्ति आय वित्त वर्ष 2020 में 526 रुपये बढ़ेगी.

अगर आसान भाषा में समझें तो कुछ इस तरह से कह सकते हैं कि जीडीपी 4 फीसदी की दर से बढ़ती है तो आमदनी में वृद्धि 421 रुपये होगी. इसका मतलब है कि विकास दर में 1 फीसदी की कमी से प्रति व्यक्ति औसत मासिक आमदनी 105 रुपये कम हो जाएगी.

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दूसरे शब्दों में कहें तो यदि वार्षिक जीडीपी दर 5 से गिरकर 4 फीसदी होती है तो प्रति माह आमदनी 105 रुपये कम होगी. यानी एक व्यक्ति को सालाना 1260 रुपये कम मिलेंगे.

अर्थव्यवस्था में और अधिक असमानता होगी. अमीरों के मुकाबले गरीबों पर इसका अधिक असर हो सकता है. उन्होंने कहा, गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या बढ़ सकती है. जीडीपी में गिरावट से रोजगार दर में भी कमी आएगी.

इस आधार पर तय होती है भारत की GDP- देश में एग्रीकल्चर, इंडस्ट्री और सर्विसेज़ यानी सेवा तीन प्रमुख घटक हैं जिनमें उत्पादन बढ़ने या घटने के औसत आधार पर जीडीपी दर तय होती है. ये आंकड़ा देश की आर्थिक तरक्की का संकेत देता है. अगर आसान भाषा में कहें तो मतलब साफ है कि अगर जीडीपी का आंकड़ा बढ़ा है तो आर्थिक विकास दर बढ़ी है और अगर ये पिछले तिमाही के मुक़ाबले कम है तो देश की माली हालत में गिरावट का रुख़ है.

भारत में कौन जारी करता है GDP के आंकड़ें-सरकारी संस्था CSO ये आंकड़े जारी करती है. 
केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी सीएसओ देशभर से उत्पादन और सेवाओं के आंकड़े जुटाता है इस प्रक्रिया में कई सूचकांक शामिल होते हैं, जिनमें मुख्य रूप से औद्योगिक उत्पादन सूचकांक यानी आईआईपी और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई हैं.

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GDP को समझने के लिए इन चीजों का जानना बेहद जरूरी है... 


>> अगर साल 2011 में देश में सिर्फ़ 100 रुपये की तीन वस्तुएं बनीं तो कुल जीडीपी हुई 300 रुपये. और 2017 तक आते-आते इस वस्तु का उत्पादन दो रह गया लेकिन क़ीमत हो गई 150 रुपये तो नॉमिनल जीडीपी 300 रुपये हो गया.

>> यहीं बेस ईयर का फॉर्मूला काम आता है. 2011 की कॉस्टेंट कीमत (100 रुपये) के हिसाब से वास्तविक जीडीपी हुई 200 रुपये. अब साफ़-साफ़ देखा जा सकता है कि जीडीपी में गिरावट आई है.

>> सीएसओ विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों से समन्वय स्थापित कर आंकड़े एकत्र करता है. मसलन, थोक मूल्य सूचकांक यानी डब्ल्यूपीआई और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई की गणना के लिए मैन्युफैक्चरिंग, कृषि उत्पाद के आंकड़े उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय जुटाता है.

>> इसी तरह आईआईपी के आंकड़े वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत आने वाला विभाग जुटाता है. सीएसओ इन सभी आंकड़ों को इकट्ठा करता है फिर गणना कर जीडीपी के आंकड़े जारी करता है.

>> मुख्य तौर पर आठ औद्योगिक क्षेत्रों के आंकड़े जुटाए जाते हैं. ये हैं- कृषि, खनन, मैन्युफैक्चरिंग, बिजली, कंस्ट्रक्शन, व्यापार, रक्षा और अन्य सेवाएं.

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First published: August 31, 2019, 12:09 PM IST
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