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किसानों के लिए खुशखबरी! सिर्फ 20 रुपये में खत्म कर सकते हैं पराली, ये है इस्तेमाल का तरीका!

किसानों ने जवाब नहीं दिया तो इनके शस्त्र लाइसेंस नहीं बनेंगे

वेस्ट डी-कंपोजर (Waste Decomposer) के इस्तेमाल से सड़ जाएगी पराली (Parali), फसलों के लिए करेगी खाद का काम, नहीं होगा प्रदूषण, कीमत है सिर्फ 20 रुपये.

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नई दिल्ली. हरियाणा, पंजाब, दिल्ली और एनसीआर के लिए पराली (Parali) मुसीबत बन गई है. इसके समाधान के महंगे तरीके की वजह से किसान (Farmers) इसे जलाना बेहतर समझ रहे हैं. जबकि कृषि वैज्ञानिकों (Agriculture Scientist) ने इसका बहुत सस्ता तोड़ पहले ही निकाल लिया था. प्रचार-प्रचार के अभाव से किसानों तक यह खोज नहीं पहुंच सकी है. सिर्फ 20 रुपये के खर्च में एक एकड़ खेत की पराली को गलाया जा सकता है. इससे दो फायदे हैं. खेती की उर्वरा शक्ति बढ़ेगी और प्रदूषण भी नहीं फैलेगा. इस समाधान का नाम है वेस्ट डी-कंपोजर. जिसे कृषि मंत्रालय (Ministry of Agriculture)  से जुड़े गाजियाबाद स्थिति नेशनल सेंटर ऑफ ऑर्गेनिक फार्मिंग (National Centre of Organic Farming) ने डेवलप किया है.

प्लांट प्रोटक्शन के प्रोफेसर आईके कुशवाहा ने न्यूज18 हिंदी से बातचीत में बताया कि वेस्ट डी-कंपोजर की एक डिब्बी 20 रुपये की है. इसमें फसलों के मित्र फंगस होते हैं. यह करीब एक माह में पराली को गला देंगे. इससे खेत की उर्वरा शक्ति बढ़ेगी. आर्गेनिक कार्बन बढ़ेगा और दीमक कम हो जाएगी. इस तरह यह पर्यावरण और किसान दोनों के लिए हितैषी है. वेस्ट डि-कंपोजर का कोई साइड इफेक्ट नहीं है.

प्लांट प्रोटक्शन के प्रोफेसर आईके कुशवाहा


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बनाने का तरीका
>> इसे इस्तेमाल करने के लिए घोल तैयार करना पड़ेगा. प्रो. कुशवाहा ने बताया कि 200 लीटर पानी एक प्लास्टिक के ड्रम में डाल लें. इसी में डि-कंपोजर की एक डिब्बी घोल लें. इसे ऐसे स्थान पर ढंक कर रखना है जहां धूप नहीं हो. तीन दिन तक पानी को दिन में एक-दो बार हिला दें. उसके बाद इसे 11 दिन तक छोड़ दें. यह डी-कंपोजर का घोल तैयार हो गया.

इस्तेमाल का तरीका
>> खेत की सिंचाई करते वक्त इस घोल को थोड़ा-थोड़ा हौद या नाली में डालते रहें. यह पूरे खेत में मिल जाएगा. यह फंगस पराली को तेजी से जलाना शुरू कर देता है. यह करीब 40 दिन में पराली को सड़ाकर खाद में बदल देगा. इसी घोल से आप बार-बार और डि-कंपोजर तैयार कर सकते हैं.

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20 रुपये बनाम डेढ़ लाख
>> पराली को खत्म करने के लिए बाजार में डेढ़ लाख रुपये तक की मशीनें बिक रही हैं. इस पर केंद्र सरकार 50 फीसदी की सब्सिडी दे रही है. इस महंगे समाधान को किसान अपनाना नहीं चाहता. लिहाजा न पराली का जलना खत्म हो रहा है और न दिल्ली में प्रदूषण. पराली की समस्या तीन-चार हफ्ते ही चलती है. ऐसे में कोई किसान महंगी मशीनों का बोझ नहीं डालना चाहता. क्योंकि ये मशीनें साल के ज्यादातर समय बेकार पड़ी रहेंगी. जाहिर है कि 20 रुपये वाले समाधान को मशीनों की मार्केटिंग वाले गैंग ने किसानों तक पहुंचने नहीं दिया.

दवा पर 50 फीसदी छूट
डी-कंपोजर की खरीद पर हरियाणा ने 50 फीसदी की छूट दे दी है. यानी इसकी डिब्बी सिर्फ 10 रुपये में मिल सकेगी. हरियाणा पराली जलाने वाले वाले राज्यों में शामिल है.

मशीन पर 50 फीसदी सब्सिडी फिर भी महंगी
धान की फसल अब मशीनों से कट रही है. मशीन एक फुट ऊपर से धान का पौधा काट देती है. जो शेष भाग बचता है वो किसान के लिए समस्या बन जाता है. इसे कटवाने की बजाए किसान जला देता है. इस समस्या से निपटने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने एक मशीन तैयार की है. इसका नाम पेड्डी स्ट्रा चोपर (Paddy Straw Chopper Machine) है. लेकिन इसका दाम है 1.45 लाख. इसे ट्रैक्टर के साथ जोड़ दिया जाता है और यह पराली के छोटे-छोटे टुकड़े बनाकर खेत में फैला देती है. बारिश होते ही पराली के ये टुकड़े मिट्टी में मिलकर सड़ जाते हैं. इन मशीनों पर 50 फीसद तक की सब्सिडी है.

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