सरकार चाहती है कि लेनदारों के लिए RBI कर्ज पुनर्गठन का मौका दे: सूत्र

सरकार चाहती है कि लेनदारों के लिए RBI कर्ज पुनर्गठन का मौका दे: सूत्र
भारतीय रिज़र्व बैंक से लोन कर्ज पुनर्गठन की मांग

लेनदारों को राहत देने के लिए लोन मोरेटोरियम के अलावा वन-टाइम लोन रिस्ट्रक्चरिंग (Loan Restructuring) की भी मांग की जा रही है. इस बीच अब जानकारी मिल रही है केंद्र सरकार भी चाहती है कि आरबीआई एक बार ​लोन रिस्ट्रक्चरिंग की छूट दे.

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नई दिल्ली. केंद्र सरकार चाहती है कि भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) बैंकों द्वारा दिए गए लोन को एक बार रिस्ट्रक्चर (One-Time Loan Restructuring) करने का मौका दे. मौजूदा कोविड-19 संकट को देखते केंद्र सरकार चाहती है कि लेनदारों को कुछ राहत मिल सके. CNBC-TV18 ने सूत्रों के हवाले से अपनी एक रिपोर्ट में यह बात कही है. सूत्रों ने बताया कि लोन रिस्ट्रक्चरिंग का फैसला व इस बारे में अन्य जानकारी देना आरबीआई का काम है. बीते कुछ समय में कई बैंकर्स ने इस बात की मांग की है कि मोरेटोरियम (Loan Moratorium) की अवधि बढ़ाने की जगह वन-टाइम लोन​ रिस्ट्रक्चरिंग की जाए.

31 अगस्त तक लोन मोरेटोरियम
शुरुआत में आरबीआई ने 31 मई तक के लिए टर्म लोन पर मोरेटोरियम छूट देने का ऐलान किया था. बाद में इसकी अवधि 31 अगस्त तक के लिए बढ़ा दिया गया. इस दौरान लेनदारों को छूट है कि वो अपने लोन की ईएमआई नहीं चुकाते हैं तो उन्हें कोई पेनाल्टी नहीं देनी होगी.

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आरबीआई द्वारा मोरेटोरियम की राहत देने से लेनदारों के पास एक मौका बना कि वो EMI का भुगतान न करके हर महीने कुछ नकदी बचा सकें. लेकिन, कई जानकारों ने कहा कि आरबीआई द्वारा यह राहत सीमित प्रकृति का है.



लोन रिपेमेंट की शर्तें हो सकेंगी आसान
अब बैंकों को डर है कि 31 अगस्त के बाद जब मोरेटोरियम छूट की अवधि खत्म हो जाएगी, उसके बाद कई ऐसे लेनदारों होंगे जो तुरंत ही अपनी ईएमआई का भुगतान नहीं कर सकेंगे. इससे डिफॉल्ट बढ़ सकता है. इसकी जगह बैंकों की राय है कि वन-टाइम लोन रिस्ट्रक्चरिंग की सुविधा दी जाए. लोन रिस्ट्रक्चरिंग से उन लेनदारों के लिए ​रिपेमेंट की शर्तें आसान हो जाएंगी, जो वास्तव में कोविड-19 की वजह से वित्तीय रूप से प्रभावित हुए हैं. वो अपने कैश फ्लो के साथ रिपेमेंट को मैच कर सकेंगे.

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क्यों लोन रिस्ट्रक्चरिंग की मांग कर रहे बैंक?
वर्तमान में आरबीआई ही बैंकों को अकाउंट रिस्ट्रक्चरिंग की अनुमति देता है. लेकिन, बैंकों के​ लिए शर्त होती है कि वो पहले इस अकाउंट को डाउनग्रेड करें और प्रोवि​जनिंग के ​लिए कम से कम 15 फीसदी रकम अलग रखें. यही कारण है कि बैंक अब इस बात की मांग कर रहे हैं कि वन-टाइम रिस्ट्रक्चरिंग विंडो की सुविधा मिल सके ताकि बिना एसेट क्लासिफिकेशन डाउनग्रेड किए और अतिरिक्ति प्रोविजनिंग के लेनदारों को राहत मिल सके.
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