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खाद्य और उर्वरक सब्सिडी में कोई बदलाव नहीं करेगी सरकार, किसान आंदोलन की वजह से लिया फैसला

2013 के बाद से गेहूं और चावल के सीआईपी में कोई बदलाव नहीं किया गया है.
2013 के बाद से गेहूं और चावल के सीआईपी में कोई बदलाव नहीं किया गया है.

वित्त मंत्रालय अब कृषि आंदोलन को देखते हुए खाद्य एवं उर्वरक सब्सिडी में कोई बदलाव नहीं करेगा. 2013 के बाद से ही सरकार ने इसमें कोई बदलाव नहीं किया है. इकोनॉमिक सर्वे और 15वें वित्त आयोग की रिपोर्ट में इन दोनों सब्सिडी के बढ़ते बोझ पर चिंता जाहिर की जा चुकी है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 23, 2021, 11:49 AM IST
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नई दिल्ली. किसान आंदोलन को देखते हुए ​अब वित्त मंत्रालय (Finance Ministry) ने खाद्य एवं उर्वरक सब्सिडी में प्रस्तावित बदलावों को अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया है. सरकार को डर है कि खाद्य एवं सब्सिडी को लेकर इस बदलाव से किसान और गरीब वर्ग और अधिक विरोध प्रदर्शन करने लगेंगे. साल 2013 के बाद से अब तक सरकार ने पब्लिक डिस्ट्रीब्युशन सिस्टम (PDS) के अंतर्गत आने वाले अनाज पर सब्सिडी को रिवाइज नहीं किया है. इसके अलावा किसानों के खाते में उर्वरक सब्सिडी का पैसा सीधे ट्रांसफर (DBT) भी पायलट प्रोजेक्ट से आगे नहीं बढ़ सका है.

एक मीडिया रिपोर्ट में वित्त मंत्रालय के अधिकारी के हवाले से कहा गया है, 'वित्त वर्ष 2021-22 के लिए हम खाद्य एवं उर्वरक सब्सिडी को जारी रखेंगे. हालांकि, अब यह इस रूप में आगे भी जारी रहने की स्थिति में नहीं है. इन सब्सिडी में किसी भी रिफॉर्म के लिए यह उचित समय नहीं हैं.'

​दिल्ली से सटे बॉर्डर इलाकों पर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के हजारों किसान तीनों कृषि कानून का विरोध कर रहे हैं. उनकी मांग है कि इन तीनों कानूनों को वापस लिया जाए और फसलों के लिए सरकार से न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की गारंटी भी मिले.



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बढ़ रहा खाद्य सब्सिडी का बोझ
वित्त वर्ष 2021-22 के लिए बजट में खाद्य सब्सिडी के लिए 2.4 लाख करोड़ रुपये और उर्वरक सब्सिडी के लिए 80,000 करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है. इकोनॉमिक सर्वे और 15वें वित्त आयोग - दोनों रिपोर्ट में ही खाद्य एवं उर्वरक सब्सिडी के बढ़ते बोझ को ​ले​कर चिंता जाहिर की गई है. वित्त वर्ष 2021 के लिए इकोनॉमिक सर्वे (Economic Survey) में कहा गया था कि खाद्य सब्सिडी अभी भी 'असहनीय रूप से बढ़' रही है. इसमें आगे कहा गया, 'फूड सिक्योरिटी को लेकर बढ़ती प्रतिबद्धता के बीच खाद्य प्रबंधन का आर्थिक लागत कम करना मुश्किल है. सेंट्रल इश्यू प्राइस (CIP) को रिवाइज करने की जरूरत है ताकि बढ़ते खाद्य सब्सिडी बिल को कम किया जा सके.'

कितना है गेहूं और चावल का CIP?
अनाजों के प्रति क्विंटल आर्थिक लागत और प्रति क्विंटल CIP के अंतर से हर एक क्विंटल पर खाद्य सब्सिडी की जानकारी मिलती है. राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून (NFSA) लाभार्थियों के लिए गेहूं और चावल के सीआईपी में 2013 के बाद से कोई बदलाव नहीं हुआ है. गेहूं के लिए यह 200 रुपये प्रति क्विंटल और चावल के लिए प्रति क्विंटल 300 रुपये पर बरकरार है.

गेहूं और चावल के प्रति क्विंटल आर्थिक लागत में इजाफा
दूसरी ओर वित्त वर्ष 2013-14 में फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) के संचालन के लिए हर एक क्विंटल गेहूं पर आर्थिक लागत 1,908.32 रुपये पड़ती है. वित्त वर्ष 2020-21 में यह 2,683.84 रुपये प्रति क्विंटल पर पहुंच गई है. इसी प्रकार चावल के लिए यह 2013-14 में 2,615.51 रुपये प्रति क्विंटल से बढ़कर वित्त वर्ष 2020-21 में 3,723.76 रुपये पर पहुंच गई है.

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वर्तमान में कैसे दी जाती है उर्वरक सब्सिडी?
2016 में उर्वरक विभाग ने उर्वरक के लिए सब्सिडी की रकम डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के जरिए लागू करने के लिए का प्रोग्राम तैयार किया था. 16 जिलों में इस पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर लागू भी किया गया. वर्तमान में, उर्वरक की सब्सिडी खुदरा दुकानों पर प्वॉइंट ऑफ सेल डिवाइस के डेटा के आधार पर मैन्युफैक्चरर को ट्रांसफर किया जाता है. पहले के सिस्टम में सुधार करने के बाद सेल्स डेटा के आधार पर सब्सिडी भुगतान को लागू किया गया था. माना जा रहा है कि वास्तविक लाभार्थियों की पहचान भी डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर में देरी की एक वजह है.
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