कॉरपोरेट घरानों को बैंक लाइसेंस देना कितना सही-कितना गलत, जानें क्‍या आएंगी परेशानियां

RBI की एक समिति ने कॉरपोरेट घरानों को बैंक लाइसेंस देने का प्रस्‍ताव रखा है.

RBI की एक समिति ने कॉरपोरेट घरानों को बैंक लाइसेंस देने का प्रस्‍ताव रखा है.

देश के केंद्रीय बैंक की एक समिति ने निजी कंपनियों (Private Companies) को बैंक लाइसेंस (Bank Licenses) देने और नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कपंनीज (NBFCs) को बैंक में तब्‍दील करने का प्रस्‍ताव रखा है. इस पर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन (Raghuram Rajan) समेत कई विशेषज्ञ आपत्ति जता रहे हैं. आइए जानते हैं कि अगर कॉरपोरेट घरानों को बैंक लाइसेंस दिया तो क्‍या दिक्‍कतें आएंगी...

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 24, 2020, 9:20 PM IST
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नई दिल्‍ली. रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) की एक समिति ने बड़े कॉरपोरेट घरानों (Corporates Houses) और इंडस्ट्रीज (Industries) को बैंक (Bank) खोलने की अनुमति देने का प्रस्ताव पेश किया है. साथ ही नॉन-बैंकिंग फाइनेंस कंपनीज (NBFC) को भी बैंक में बदलने का सुझाव दिया है. आरबीआई के इंटरनल वर्किंग ग्रुप (IWG) ने ये प्रस्ताव रखे हैं, जिन पर 15 जनवरी 2021 तक किसी एक्शन की उम्मीद की जा रही है. रिजर्व बैंक इसके बाद ही इस मामले में कोई फैसला लेगा. वहीं, कई विशेषज्ञ इस प्रस्‍ताव पर आपत्ति जता रहे हैं. अब सवाल यह है कि निजी कंपनियों को बैंक का लाइसेंस (Bank Licenses) देना कितना सही और कितना गलत है.

वित्तीय संकट से जूझ रहे हैं कई बैंक

यस बैंक (YES Bank), पीएमसी बैंक (PMC Bank) और लक्ष्मी विलास (Lakshmi Vilas Bank) की माली हालत पूरी तरह बैठ गई है. इसके कारण केंद्रीय बैंक (Central Bank) को इन्हें अपने अधीन लेना पड़ा है. हालांकि, अभी भी कुछ बैंक ऐसे हैं, जो वित्तीय संकट से जूझ रहे हैं. इसका कारण ग्राहकों को दिए बड़े लोन का चुकता न होना है. आसान शब्‍दों में समझें तो नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स (NPAs) से बैंकों को नुकसान हो रहा है. इस समस्या का सामना देश का सबसे बड़ा सरकारी कर्जदाता स्‍टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) और सबसे बड़ा निजी बैंक एचडीएफसी (HDFC) भी कर रहा है. वहीं, दूसरी तरफ इस समस्या पर सुधार प्रस्ताव भी काम नहीं आ रहे हैं.

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समिति के प्रस्ताव से नाखुश विशेषज्ञ

आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन (Raghuram Rajan) और पूर्व डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य (Viral Acharya) प्रस्ताव का विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि प्रस्ताव रखने से पहले सिर्फ एक विशेषज्ञ ने सहमति जताई थी. उनके अलावा सभी ने प्रस्ताव पर असहमति जताई है. फिर भी प्रस्ताव को हरी झंडी दे दी गई. इन दोनों अर्थशास्त्रियों के अनुसार, बैंकिंग सेक्टर में कॉरपोरेट्स के आने से 'कनेक्टेड लेंडिंग' (Connected Lending) की समस्या शुरू हो जाएगी. इसका मतलब है कि बैंक का मालिक अपनी ही कंपनियों को आसान शर्तों पर लोन (Loans) देकर फायदा उठाएगा. इस सिस्टम से सिर्फ कुछ कॉरपोरेट्स घरानों में वित्तीय और राजनीतिक सत्ता के केंद्रीकरण की समस्या बढ़ती चली जाएगी. नतीजा ये निकलेगा कि देश आर्थिक संकट (Economic Crisis) से जूझने लगेगा.

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कंपनियों में लाइसेंस की लगी होड़

प्रस्ताव के पेश होने से कई कंपनियों में बैंक लाइसेंस लेने की इच्छा जाग उठी है. बता दें कि देश में बैंकों का राष्ट्रीयकरण 1980 में किया गया था. वहीं, साल 1993 में निजी कंपनियों को बैंक खोलने की अनुमति मिली थी. तब से कई कॉरपोरेट्स बैंक खोलने का सपना देख रहे हैं. पिछले कुछ साल में एनबीएफसी की संख्या बढ़ी है. इनमें एमएंडएम फाइनेंस, बजाज फिनसर्व, एलएंडटी फाइनेंशियल होल्डिंग्स और टाटा कैप्टिल शामिल हैं. इस प्रस्ताव के चलते कई जानकारों ने साल 2007-2008 के ग्लोबल इकोनॉमिक क्राइसिस की भी याद दिलाई है, जिसके बाद कई देशों में कॉरपोरेट कंपनियों के बैंक चलाने पर संदेह हो रहा है. इनमें इंडोनेशिया को कॉरपोरटे्स बैंकिंग के कारण देश में जीडीपी के एक तिहाई हिस्से के बराबर नुकसान उठाना पड़ा था.

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