Harshad Mehta Scam: 1992 से भारतीय शेयर बाजार में बदल गईं ये 8 चीजें

प्रतीकात्मक तस्वीर
प्रतीकात्मक तस्वीर

करीब 28 साल पहले 1992 में हर्षद मेहता घोटाला सामने आने के बाद घरेलू शेयर बाजार में कई बड़े बदलाव हुए हैं. ये वही घोटाला था, जिसके बाद बाजार नियामक सेबी का दायरा बढ़ाया गया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 19, 2020, 6:50 PM IST
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मुंबई. हर्षद मेहता को दलाल स्ट्रीट का अमिताभ बच्चन कहा जाता था. देखते ही देखते ही उन्होंने शेयर बाज़ार और ब्रोकरों (brokers) के व्यापार बदल दिया था. भारत ने 1992 में पहली बार अपने शेयर बाजार के लिए सरल चालबाज़ी का अनुभव किया. शेयर बाजार में व्यवस्थित धोखाधड़ी के लिए बैंक रसीदें और स्टांप पेपर शामिल थे. 'प्रतिभूति घोटाला' (Securities Scam) में लगभग 4,000 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के बाद दलाल स्ट्रीट के नियम हमेशा के लिए बदल गए. प्रतिभूति कानून (संशोधन) अधिनियम 1995 पारित किया गया, जिसने भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी, Securities and Exchange Board of India-SEBI) के अधिकार क्षेत्र को बढाया और इसे डिपॉजिटरी (depositories), एफआईआई (FIIs), वेंचर कैपिटल फंड (venture capital funds ) और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों को विनियमित करने की अनुमति दी.

इस घोटाले के 28 साल बाद, ऑनलाइन ब्रोकरेज फर्म जिरोधा (Zerodha) के संस्थापक, नितिन कामथ, उन आठ चीजों को सूचीबद्ध करते हैं जो इन दिनों भारतीय शेयर बाजारों में अलग-अलग तरीके से किए जाते हैं.

1. निपटान चक्र (Settlement Cycle)
निपटान चक्र 14 दिनों का वह समय जिसके भीतर दलालों को पूरा पैसा देना होता है और स्टॉक की डिलीवरी लेनी होती है या अगर बेचा जाता है तो स्टॉक डिलीवर करना होता है. लेकिन अब यह दो दिनों का है और सेबी इसे 1 दिन का चक्र करने के संकेत दे रहा है.
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2. न्यूनतम बचत (Minimum Balance)
1992 में एक ग्राहक को स्टॉक खरीदना सुनिश्चित करने के लिए न्यूनतम बैलेंस के रखरखाव पर कोई नियम नहीं था. लेकिन अब ग्राहक खाते में न्यूनतम पैसे के बिना स्टॉक नहीं खरीद सकता है या बिना डेमैट खाते (Demat account) के स्टॉक को बेच सकता है. नया नियम आक्रामक दलालों से प्रणालीगत जोखिम को कम करने में मदद करता है जो पहले व्यवसाय के लिए जोखिम से समझौता कर रहे थे.

3. इलेक्ट्रॉनिक लेनदेन (Electronic Transactions)
1992 में ट्रेडों का निपटान कागज के माध्यम से किया जाता था और प्रतिपक्ष (counter-party) जोखिम स्पष्ट था. अब, ट्रेडों के सभी निपटान क्लियरिंग कॉर्पोरेशन (सीसी) के माध्यम से होते हैं, और सभी लेनदेन इलेक्ट्रॉनिक होते हैं.

4. ब्रोकर की स्वीकृति (Broker's Approval)
आज चूंकि मार्जिन आवश्यकताओं और सीसी के कारण ग्राहक को जोखिम कम है और 1992 की तरह खाता खोलने के लिए आपको किसी ब्रोकर से अनुमोदन की आवश्यकता नहीं है. अब आप किसी भी ब्रोकर के साथ 15 मिनट के अंदर ऑनलाइन ट्रेडिंग अकाउंट खोल सकते हैं.

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5. ब्रोकरेज फर्मों की भूमिका (Brokerage Firm’s Role)
1992 में, ब्रोकरेज फर्मों ने सलाहकार के रूप में काम किया, लेकिन अब वे निष्पादन पर ध्यान केंद्रित करते हैं न कि सलाहकार के रूप में.

6. व्यापार प्रक्रिया (Trading Process)
1992 में सभी ट्रेडों को डीलरों के माध्यम से किया जाता था तथा इसलिए उन्होंने एक बड़ा निष्पादन जोखिम उठाया. इन दिनों, अधिकांश ट्रेडों को ग्राहकों द्वारा अपने दम पर निष्पादित किया जाता है.

7. ब्रोकरेज शुल्क (Brokerage Fee)
ज्यादातर ग्राहक 1992 में अनजान थे और इक्विटी डिलीवरी ट्रेडों के लिए ब्रोकरेज को कम से कम 1 प्रतिशत का भुगतान करते थे, जबकि अब कोई शुल्क नहीं देना पड़ता है.

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8. मूल्य अंतर (Price Difference)
1992 में, डीलरों ने वास्तविक व्यापार मूल्य की तुलना में ग्राहक को अलग-अलग मूल्य बताकर उनके जेब में कटौती की. हालांकि, इन दिनों यह प्रक्रिया 100 प्रतिशत पारदर्शी है.
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