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देश में सबसे अधिक आय पंजाब के किसानों की, समझें बिहार यूपी फिसड्डी किस वजह से?

पंजाब और हरियाणा के किसानों की आया देश में सबसे अधिक.

पंजाब और हरियाणा के किसानों की आया देश में सबसे अधिक.

बिहार (Bihar) में किसानों की औसत आय (Farmers Income) देश में सबसे कम सिर्फ 3558 रुपये प्रति माह है. जबकि पंजाब (Punjab) ...अधिक पढ़ें

नई दिल्ली. किसान आंदोलन के बीच कुछ लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि आखिर नए कृषि कानून का सबसे अधिक विरोध पंजाब और हरियाणा के ही किसान क्यों कर रहे हैं. क्यों यूपी, बिहार और एमपी के लोगों की भागीदारी कम दिखाई दे रही है. क्या किसान सिर्फ पंजाब, हरियाणा में रहते हैं? किसान नेताओं का कहना है कि जहां के किसान पहले से लूटे पिटे हैं, जिनके पास किसी चीज को खोने का डर ही नहीं है. वो विरोध क्यों करने जाएंगे. पंजाब और हरियाणा के किसानों की आय देश में पहले और दूसरे नंबर पर है. इन दोनों में शानदार सरकारी खरीद व्यवस्था है, मंडियों का नेटवर्क है, इसलिए यहीं पर नए कृषि कानून के साइड इफेक्ट का सबसे ज्यादा खतरा है. इसलिए इन दोनों प्रदेशों के सबसे ज्यादा किसान सड़क पर हैं. उनकी आशंकाओं को जब तक दूर नहीं किया जाएगा तब तक असंतोष कायम रहेगा. 

कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा के मुताबिक अगर किसानों को बाजार के हवाले करने से  किसानों का हित होता तो बिहार नंबर वन होता. वहां 2006 से एपीएमसी यानी सरकारी मंडियां  ही नहीं है. वहां किसानों की आय देश में सबसे कम सिर्फ 3558 रुपये प्रति माह है. वहां किसानों की स्थिति बदतर है. दूसरी ओर पंजाब (Punjab) में एपीएमसी सबसे मजबूत स्थिति में है, 1840 मंडियां हैं, वहां पर किसान संपन्न है. तो दोनों मॉडल का अध्ययन करने के बाद देखना चाहिए क्या सही और गलत है.

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बिहार, पंजाब में किसानों की आय में इतना अंतर क्यों?- शर्मा के मुताबिक बिहार में किसानों की औसत आय (Farmers Income) देश में सबसे कम सिर्फ 3558 रुपये प्रति माह है. जबकि पंजाब में 18,059 रुपये. जबकि दोनों कृषि प्रदेश हैं. फिर भी दोनों के किसानों की आय में इतना अंतर है. हम किसानों को सीधे बाजार के हवाले कर उन्हें बिहार के किसानों की तरह शोषण के लिए छोड़ रहे हैं. अगर बिहार में पिछले 14 साल में एपीएमसी का नेटवर्क बना होता तो शायद किसानों की स्थिति बेहतर होती. किसान मजदूर नहीं बनता. 

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बिहार में खेती 2006 से ही निजी क्षेत्र में- बिहार किसान मंच के अध्यक्ष धीरेंद्र सिंह टुडू का कहना है कि बिहार में किसान पिछले डेढ़ दशक से निजी क्षेत्र के हवाले है. इसकी वजह से उसका शोषण जारी है. यहां न मक्के की सरकारी खरीद हो रही है और न मक्के की. निजी क्षेत्र एमएसपी से बहुत कम दाम देता है. जिन्हे लगता है कि निजी क्षेत्र किसानों की उपज का बहुत अच्छा पैसा देगा.

उन्हें मॉडल के तौर पर बिहार  का अध्ययन करना चाहिए. क्योंकि सरकार जो व्यवस्था पूरे देश में लागू करना चाहती है. उसे नीतीश कुमार 2006 से बिहार में लागू किए हुए हैं और इस व्यवस्था ने बिहार के ज्यादातर किसानों को मजदूर बना दिया है. ऐसे कृषि सुधारों का क्या मतलब जो ट्रेडर्स को फायदा पहुंचा रहा हो. राष्ट्रीय किसान महासंघ के संस्थापक सदस्य बिनोद आनंद का कहना है कि यदि सरकार किसानों का हित चाहती है. तो हर कृषि उत्पाद पर एक एश्योर्ड प्राइस तय करे, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) और खरीद की गारंटी दे.

Tags: Bihar News, Farmers, Five income, Haryana news, Punjab

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