अमेरिका के सरकारी बॉन्ड खरीदने वाले टॉप देशों में शामिल हुआ भारत, यहां देखें पूरी लिस्ट

अमेरिका के सरकारी बॉन्ड खरीदने वाले टॉप देशों में शामिल हुआ भारत, यहां देखें पूरी लिस्ट
अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियां

भारत के पास प्रतिभूतियों (US Government Securities) का अधिकतम स्तर फरवरी में जब रिजर्व बैंक (RBI) के पास अमेरिका की 177.5 अरब डॉलर की सरकारी प्रतिभूतियां जमा हो गई थीं. जनवरी में यह आंकड़ा 164.3 अरब डॉलर था.

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नई दिल्ली. भारत के पास अप्रैल के अंत में 157.4 अरब अमेरिकी डॉलर (करीब 1.18 लाख करोड़ रुपये) के अमेरिकी सरकारी बॉन्ड (US Government Securities) थे, जिसके साथ भारत दुनिया में 12वां सबसे बड़ा अमेरिकी बॉन्ड धारक बन गया. अमेरिकी वित्त विभाग (Finance Department, US) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत के पास ये प्रतिभूतियां मार्च में घटकर 156.5 अरब डालर रह गई थीं, लेकिन अप्रैल में यह 0.9 अरब डॉलर बढ़कर 157.4 अरब डॉलर हो गई.

कोरोना वायरस महामारी के चलते वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बीच भारत द्वारा इस साल अमेरिकी प्रतिभूतियों की खरीद-फरोख्त में कोई खास रुझान देखने को नहीं मिला है.

फरवरी में अधिकतम स्तर पर रहा
भारत के पास प्रतिभूतियों का अधिकतम स्तर फरवरी में जब रिजर्व बैंक के पास अमेरिका की 177.5 अरब डॉलर की सरकारी प्रतिभूतियां जमा हो गयी थीं. जनवरी में यह आंकड़ा 164.3 अरब डॉलर था.
जापान के पास सबसे ज्यादा अमेरिकी सिक्योरिटीज


आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल के अंत में जापान के पास सबसे अधिक 1266 अरब डॉलर की अमेरिकी प्रतिभूतियां थीं, जिसके बाद 1,073 अरब डॉलर के साथ चीन और 368.5 अरब डॉलर के साथ ब्रिटेन का स्थान था. 300.2 अरब डॉलर के साथ चौथे स्थान पर आयरलैंड और इसके बाद 265.5 अरब डॉलर के साथ लग्जमबर्ग, 259.5 अरब डॉलर के साथ ब्राजील, 242.8 अरब डॉलर के साथ हॉन्गकॉन्ग, 241.3 अरब डॉलर के साथ स्विट्जरलैंड का नंबर आता है. इस लिस्ट में भारत से पहले बेल्जियम, केमैन आइलैंड, और ताइवान भी हैं.

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अमेरिकी सरकार प्रतिभूतियों में भारतीय रिज़र्व बैंक ने विदेशी परिसंपत्ति का निवेश विविकपूर्ण तरलता पब्रंधन के तहत किया है. मौजूदा महामारी के बीच वैश्विक अर्थव्यवस्था को लेकर अनिश्चितता लगातार बढ़ रही है. भारत पर भी इसका असर पड़ा है और हाल के महीनों में डॉलर के मुकाबले रुपये में लगातार उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है.

जब 1970 के दशक में गोल्ड स्टैंडर्ड या ब्रेटन वूड्स सिद्धांत ढह गया तो इसके बाद से ही डॉलर्स और अमेरिकी सरकारी परिसंपत्तियों में निवेश का चलन बढ़ा. तभी से अमेरिकी प्रतिभूतियां दुनियाभर के केंद्रीय बैंकों के लिए बेहतर विकल्प बन गया. हालांकि, इस पर मिलने वाला रिटर्न बेहद कम होता है.
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