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क्या होती है GDP और आम जनता के लिए ये क्यों है अहम?- जानिए एक्सपर्ट की राय

दूसरी तिमाही की GDP के आए आंकड़ें
दूसरी तिमाही की GDP के आए आंकड़ें

दूसरी तिमाही में देश की जीडीपी (GDP) -7.5 फीसदी रही है. जीडीपी के आए आंकड़ों को लेकर एक्सपर्ट की राय अलग-अलग है. आइए जानते हैं क्या कहते हैं एक्सपर्ट...

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 27, 2020, 8:31 PM IST
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नई दिल्ली. केंद्र सरकार ने शुक्रवार शाम को मौजूदा वित्त वर्ष 2020-21 (FY 2020-21) की दूसरी तिमाही यानी जुलाई-सितंबर तिमाही के आंकड़े जारी कर दिए हैं. दूसरी तिमाही में देश की जीडीपी (GDP) -7.5 फीसदी रही है. हालांकि ये आंकडे अप्रैल-मई-जून तिमाही के मुकाबले काफी बेहतर हैं. लेकिन लगातार दो तिमाही में निगेटिव ग्रोथ को तकनीकी तौर पर मंदी माना जाता है. दूसरी तिमाही की GDP के आए आंकड़ों को लेकर एक्सपर्ट की राय अलग-अलग राय है. आइए जानते हैं क्या कहते हैं एक्सपर्ट...

जानिए जीडीपी को लेकर क्या है एक्सपर्ट की राय

मार्केट एक्सपर्ट, प्रकाश दीवान का कहना है कि जो मंथली डेटा मिलता है चाहे वो GST कलेक्शन हो, फ्रैट हो या कच्चे तेल के दाम हो उससे ये अंदाजा लगाया जा सकता था कि जो GDP के जो आंकड़े आए हैं वो अनुमान से अच्छे आए हैं. उन्होने कहा कि हर सेक्टर में लॉकडाउन के बाद उम्मीद से बेहतर रिकवरी हुई है.



वहीं एक्सिस बैंक के चीफ इकोनॉमिस्ट, सौगत भट्टाचार्य ने बढ़ते क्रूड प्राइजेस, महंगाई को लेकर कहा कि जो डेवलपिंग इकोनॉमी है, ग्रोइंग इकोनॉमी है उसमें थोड़ा बहुत इम्प्लेमेशन होता है. अगर क्रूड प्राइसेस की बात करें तो उसक में थोड़ी दिक्कतें होती हैं.
इसके अलावा कांग्रेस प्रवक्ता, अभय दुबे ने GDP को नीचे लाने में सरकार को रिपॉन्सिबल ठहराया. उन्होंने कहा कि सरकार ने कोरोना को कंटेंट करने की अपेक्षा सिर्फ इकोनॉमी को कंटेंट किया है. कांग्रेस प्रवक्ता का कहना है किजिस अनियोजित तरीके से देश में नोटबंदी की गई थी उसी तरीके देश में तालाबंदी की गई जो किसी भी तरीके से सही नहीं है.

दो तिमाही में आई जीडीपी में कमी- भले ही जीडीपी में गिरावट पिछली तिमाही से कम हो लेकिन लगातार दो तिमाही जीडीपी में कमी आने से देश मौजूदा वित्त वर्ष की पहली छमाही में टेक्निकल रिसेशन के दौर में चला गया है. यानी सरकार ने आधिकारिक तौर पर मंदी को स्वीकार कर लिया है. हालांकि, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) गवर्नर समेत दुनिया भर की रेटिंग एजेंसी का मानना है कि भारत की विकासदर आने वाले समय में बेहतर हो जाएगी. अगर पहली तिमाही की बात की जाए तो सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 23.9 फीसद की ऐतिहासिक गिरावट हुई थी.


क्या है जीडीपी?
ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट यानी सकल घरेलू उत्पाद (Gross domestic product) किसी एक साल में देश में पैदा होने वाले सभी सामानों और सेवाओं की कुल वैल्यू को कहते हैं. रिसर्च और रेटिंग्स फ़र्म केयर रेटिंग्स के अर्थशास्त्री सुशांत हेगड़े का कहना है कि जीडीपी ठीक वैसी ही है, जैसे 'किसी छात्र की मार्कशीट' होती है. जिस तरह मार्कशीट से पता चलता है कि छात्र ने सालभर में कैसा प्रदर्शन किया है और किन विषयों में वह मज़बूत या कमज़ोर रहा है. उसी तरह जीडीपी आर्थिक गतिविधियों के स्तर को दिखाता है और इससे यह पता चलता है कि किन सेक्टरों की वजह से इसमें तेज़ी या गिरावट आई है.

भारत में सेंट्रल स्टैटिस्टिक्स ऑफ़िस (सीएसओ) साल में चार दफ़ा जीडीपी का आकलन करता है. यानी हर तिमाही में जीडीपी का आकलन किया जाता है. हर साल यह सालाना जीडीपी ग्रोथ के आँकड़े जारी करता है. माना जाता है कि भारत जैसे कम और मध्यम आमदनी वाले देश के लिए साल दर साल अधिक जीडीपी ग्रोथ हासिल करना ज़रूरी है ताकि देश की बढ़ती आबादी की ज़रूरतों को पूरा किया जा सके.

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आम जनता के लिए यह क्यों है अहम?
आम जनता के लिए यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सरकार और लोगों के लिए फ़ैसले करने का एक अहम फ़ैक्टर साबित होता है. अगर जीडीपी बढ़ रही है, तो इसका मतलब यह है कि देश आर्थिक गतिविधियों के संदर्भ में अच्छा काम कर रहा है और सरकारी नीतियाँ ज़मीनी स्तर पर प्रभावी साबित हो रही हैं और देश सही दिशा में जा रहा है. अगर जीडीपी सुस्त हो रही है या निगेटिव दायरे में जा रही है, तो इसका मतलब यह है कि सरकार को अपनी नीतियों पर काम करने की ज़रूरत है ताकि अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में मदद की जा सके.
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