व्यापार के मोर्चे पर चीन को भारत ने दिया जवाब, मार्केट इकोनॉमी का दर्जा देने से इनकार

व्यापार के मोर्चे पर चीन को भारत ने दिया जवाब, मार्केट इकोनॉमी का दर्जा देने से इनकार
चीन को मार्केट—इकोनॉमी का दर्जा नहीं देगा भारत

भारत ने चीन को मार्केट इकोनॉमी का दर्जा देने से मना कर दिया है. विश्व व्यापार संगठन के सदस्य अन्य देशों पर डंपिंग-रोधी शुल्क लगा सकते हैं. यह शुल्क तब लगता है, जब निर्यात देश अपने घरेलू बाजार की तुलना में बेहद सस्ते कीमत पर वस्तुओं का निर्यात करता है.

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नई दिल्ली. बीते सोमवार को भारत ने चीन को मार्केट इकोनॉमी स्टेटस (Market Economy Status) देने से साफ मना कर दिया. इसके बाद भारत के लिए चीन अब भी नॉन-मार्केट इकोनॉमी (Non-Market Economy) बना रहेगा. इससे चीन से सस्ते में आयात होने वाली वस्तुओं पर डंपिंग-रोधी शुल्क (Anti-Dumping Measures) लगाने में भारत को आसानी होगी. विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organizations) के सदस्यों को प्रमुख वस्तुओं की आयात पर डंपिंग-रोधी शुल्क लगाने की अनुमति होती है. यह शुल्क तब लगता है, जब निर्यात देश अपने घरेलू बाजार की तुलना में बेहद सस्ते कीमत पर वस्तुओं का निर्यात करता है. आयातक देश अपने घरेलू बाजार के संभावी खतरे से निपटने के लिए यह शुल्क लगाता है.

लगातार कई सालों तक कोशिशों के बाद चीन दिसंबर 2001 में विश्व व्यापार संगठन (WTO) से जुड़ा था. इस समय में चीन के सामने शर्त रखी गई थी कि अन्य सदस्य देश उसे नॉन-मार्केट इकोनॉमी मानेंगे और उनके पास चीन से आयात होने वाली वस्तुओं पर डंपिं-रोधी शुल्क लगाने का विकल्प मिलेगा.

क्या है नॉन-मार्केट इकोनॉमी?
नॉन-मार्केट इकोनॉमी का मतलब होता है कि किसी देश का अपने व्यापार पर पूर्ण या काफी हद तक एकाधिकार होता है और वहां घरलू वस्तुओं की कीमतें सरकार द्वारा नियंत्रित की जाती है. 15 साल तक यानी दिसंबर 2016 तक यूरोपिय यूनियन और अमेरिका भी चीन को मार्केट-इकोनॉमी का स्टेटस देने से मना करते रहे. उनका कहना था कि निर्यात होने वाली वस्तुओं के दाम चीनी सरकार नियंत्रित करती है.
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चीनी कंपनियों का क्या कहना है?
चीनी कंपनियों ने डायरेक्टर जनरल ऑफ एंटी-डंपिंग एंड अलाइड ड्यूटीज को एक सबमिशन में कहा कि भारत को विश्व व्यापार संगठन के सदस्य के तौर पर चीनी पीआर को मार्केट इकोनॉमी का स्टेटस देना चाहिए. चीन के लिए सरोगेट देश पद्धति 11 दिसंबर 2016 को ही समाप्त हो गया था. इसके बाद अब चीन से उसी तरह से व्यवहार करना चाहिए जैसे अन्य WTO सदस्य करते हैं. भारत को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए कि सदस्य देश के घरेलू बाजार में क्या नियम हैं.

क्या है भारत का जवाब
इन कंपनियों ने चीन से आयात होने वाले ऑर्गेनिक केमिकल कम्पाउंड, एनिलिन और एंटी-बायोटिक सिप्रोफ्लॉक्सासिन हाइड्रो क्लोराइड के आयात को लेकर एंटी-डंपिंग जांच के जवाब में यह बात कहा था. हालांकि, भारत ने कहा कि चीनी उत्पादक मार्केट इकोनॉमी स्टेटस के लिए जरूरी जानकारी देने में असर्मथ रहे हैं, ऐसे में चीन से नॉन-मार्केट इकोनॉमी का दर्जा नहीं हटाया जाएगा.

DGTR ने कहा, 'अथॉरिटी के सामने भारत व अन्य WTO सदस्यों द्वारा एंटी-डंपिंग जांच में आया है कि बीते तीन सालों में चीन को नॉन-मार्केट इकोनॉमी के तौर पर माना गया. इसी को देखते हुए, अथॉरिटी भी चीन को उत्पादक या निर्यातक के तौर पर नॉन-मार्केट इकोनॉमी दर्जा दे रही है.'

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चीन के सामने क्या रास्ता है?
WTO में भारत के पूर्व अभियुक्त के हवाले से लाइवमिंट ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि चीन को साकारात्मक कदम उठाने होंगे. उसे अपने बाजार में​ विकृतियों को खत्म करना होगा और अन्य देशों को इस बारे में उचित जानकारी देनी होगी ताकि उसे यह मार्केट इकोनॉमी का स्टेटस मिल सके.

उन्होंने आगे कहा कि अगर आपकी 80 फीसदी कंपनियां प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सरकार द्वारा नियंत्रित की जाती हैं तो आप ये कैसे दावा कर सकेंगे​ कि आपके ट्रेड पार्टनर्स मार्केट-इकोनॉमी का दर्जा दें.

भारत के लिए चीन बड़ा ट्रेड पार्टनर
गौरतलब है कि भारत में पिछले साल 18 एंटी-डंपिंग प्रोसिडिंग्स  (Anti-Dumping Proceedings) को शुरू किया था, जिसमें से अधिकतर चीन की थीं. WTO की वेबसाइट पर इस बारे में जानकारी है. हालांकि, ध्यान देने वाली बात यह भी है कि अभी भी भारत के लिए चीन सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर है और इंटरमीडिएट उत्पादों का एक बड़ा सोर्स है. 2019 में चीन में भारत का कुल निर्यात 3.8 फीसदी बढ़कर 17.1 अरब डॉलर का हो गया. जबकि, आयात 7.5 फीसदी यानी 68.3 अरब डालर घटा.

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