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india should not miss out on taking advantage of wheat exports

गेहूं निर्यात का फायदा उठाने से कहीं चूक न जाए भारत

दुनिया के गेहूं निर्यात में लगभग एक तिहाई हिस्सेदारी रूस और यूक्रेन की है. दोनों के बीच युद्ध के चलते भारत को मिल सकता है फायदा. (सांकेतिक फोटो,  साभार- सोशल मीडिया)

दुनिया के गेहूं निर्यात में लगभग एक तिहाई हिस्सेदारी रूस और यूक्रेन की है. दोनों के बीच युद्ध के चलते भारत को मिल सकता है फायदा. (सांकेतिक फोटो, साभार- सोशल मीडिया)

रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते भारत गेहूं निर्यात में बाजी मारने की स्थिति में है. दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक देश होने के बावजूद निर्यात में हिस्सेदारी कम है. इस वर्ष रिकॉर्ड गेहूं उत्पादन का अनुमान लगाया गया है.

नई दिल्लीः रूस-यूक्रेन युद्ध (Russia-Ukraine War) के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत के लिए गेहूं निर्यात (Wheat Export) का बेहतर मौका है. युद्ध की वजह से इंटरनेशनल मार्केट में गेहूं ही नहीं, ज्यादातर खाद्य पदार्थों की कीमतें अपने सर्वोच्च स्तर पर पहुंच गई हैं. इससे भारत के लिए निर्यात का नया मौका पैदा हो गया है. गेहूं निर्यात में भारत को इस वजह से भी फायदा हो सकता है क्योंकि मौजूदा वैश्विक कीमतों के मुकाबले भारतीय गेहूं की कीमत कम है. लेकिन पश्चिमी देश विश्व व्यापार संगठन (WTO) की आड़ में भारत को होने वाले इस फायदे पर ग्रहण लगा सकते हैं. अगर ऐसा हुआ तो भारत इस मौके का फायदा उठाने से चूक सकता है और गेहूं निर्यातकों और उत्पादकों को मायूसी हाथ लग सकती है.

डब्ल्यूटीओ की आड़
पश्चिमी देश लंबे अरसे से यह मानते रहे हैं कि भारत में फसलों पर जो न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) दिया जाता है वह डब्ल्यूटीओ के सिद्धांतों के खिलाफ है, खास तौर पर निर्यात के मामले में. पश्चिमी देश भारतीय किसानों को दी जाने वाली कृषि सब्सिडी पर भी सवाल उठाते रहे हैं. रूस और यूक्रेन गेहूं के बड़े उत्पादक और निर्यातक देश हैं. गेहूं के कुल वैश्विक निर्यात में इन दोनों देशों की हिस्सेदारी 30 प्रतिशत तक है. यूक्रेन में गेहूं की नई फसल की बुवाई का समय आने वाला है, लेकिन युद्ध के चलते लगता नहीं है कि पर्याप्त रकबे में बुवाई हो पाएगी. साथ ही यूक्रेन ने गेहूं निर्यात रोक दिया है ताकि युद्ध से बेहाल अपनी जनता को पर्याप्त अनाज मुहैया करा सके.

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रिकॉर्ड उत्पादन का अनुमान
कृषि मंत्रालय ने चालू रबी सीजन (2021-22) में 11.13 करोड़ टन गेहूं उत्पादन का अनुमान जाहिर किया है. यह अब तक का रिकॉर्ड होगा. पिछले फसल वर्ष में 10.92 टन गेहूं का उत्पादन हुआ था. गेहूं उत्पादन के मामले में भारत दूसरे नंबर पर है. यहां दुनिया के कुल गेहूं उत्पादन का 13.5 फीसदी उत्पादन होता है. लेकिन इसका एक बड़ा हिस्सा घरेलू खपत में ही चला जाता है. गेहूं के कुल निर्यात में भारत का हिस्सा फिलहाल एक फीसदी से भी कम है.

हालांकि, पिछले तीन साल से इसमें बढ़ोतरी हो रही है. यहां से 2018-19 में 1.8 लाख टन, 2019-20 में 2.2 लाख टन और 2020-21 में 20.9 लाख टन गेहूं का निर्यात हुआ था. चालू वित्त वर्ष 2021-22 में अप्रैल से दिसंबर तक 50.04 लाख टन गेहूं का निर्यात हो चुका है और उम्मीद है कि वित्त वर्ष के अंत तक यह 2012-13 के 65 लाख टन के रिकॉर्ड को पार कर जाएगा.

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ग्लोबल और घरेलू बाजार में बढ़े दाम
इस वर्ष रिकॉर्ड उत्पादन और वैश्विक स्थिति को देखते हुए निर्यात बढ़ाने का भारत के पास अच्छा मौका है. युद्ध के बाद गेहूं की मांग को देखते हुए ग्लोबल और घरेलू दोनों बाजार में दाम काफी बढ़ चुके हैं। घरेलू बाजार में दाम 400 से 500 रुपये प्रति क्विंटल तक बढ़े हैं. गेहूं की औसत घरेलू कीमत इस समय 2,000 रुपये प्रति क्विंटल से ऊपर पहुंच चुकी है. आगामी रबी मार्केटिंग सीजन (2022-23) के लिए गेहूं का एमएसपी 2,050 रुपये प्रति क्विटंल तय किया गया है.

Tags: Export, Wheat

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