चीन की चालबाजियों से इस तरह बचाई गईं थीं भारतीय धान की देसी किस्में

चीन की चालबाजियों से इस तरह बचाई गईं थीं भारतीय धान की देसी किस्में
2006 में FAO से रिटायर होने के बाद भी धान की रिसर्च में जुटे हुए हैं प्रो. रामचेत चौधरी

फिलीपीन्स स्थित इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट से चीन ले जाना चाहता था भारतीय धान की देसी किस्में लेकिन बदले में नहीं देता था अपनी वैराइटी का एक्सचेंज, रोका न जाता तो बासमती बनाम टेक्सामती जैसी लड़ाई लड़नी पड़ती. प्रो. चौधरी

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नई दिल्ली. चीन (China) अपना हित साधने के लिए लंबे समय से चालबाजियां चल रहा है. वो सिर्फ बॉर्डर (Border) पर और आर्थिक युद्ध (Economic war) ही नहीं लड़ रहा बल्कि दूसरे देशों की फसलों की प्राचीन और देसी किस्मों (indigenous varieties) पर भी उसकी पैनी नजर है. बात करीब तीन दशक पहले की है जब वो भारत की तमाम प्राचीन धान प्रजातियों को अपने यहां ले जाने की जुगत में लगा हुआ था. लेकिन यहां के एक मशहूर राइस साइंटिस्ट की बदौलत ऐसा होने से बच गया.

यह बात है फिलीपीन्स स्थित इंटरनेशनल राइस रिसर्च इंस्टीट्यूट (IRRI-International Rice Research Institute) की. यहां पर राइस का एक जीन बैंक है. इसमें 1 लाख से अधिक धान की प्रजातियां हैं. जिनमें से अकेले 60 हजार तो भारत की हैं. राइस साइंटिस्ट प्रो. रामचेत चौधरी इरी में 1989 से 1999 तक जर्म प्लाज्म एक्सचेंज के ग्लोबल कोर्डिनेटर थे.

चौधरी ने न्यूज18 हिंदी को बताया कि तब भारतीय धान की प्रजातियों को चीन अपने यहां तो ले जाता था. लेकिन बदले में अपना एक्सचेंज नहीं भेजता था. यानी भारतीय की उन्नत धान प्रजातियों के अच्छे गुणों को लेकर वो अपने यहां खेती करना चाहता था, लेकिन अपनी प्रजातियों को नहीं भेजता था. चौधरी बताते हैं कि तब यह भी कहा गया था कि चीन को उसकी धान की प्रजाति को इस जीन बैंक तक लाने का पैसा इरी देगा, लेकिन वो तैयार नहीं हुआ.



इसके बाद उन्होंने इरी में ग्लोबल कोर्डिनेटर होने की हैसियत से इस प्रवृत्ति पर रोक लगाई. यह कहा गया कि आप जो भी ले जाएंगे उसके बदले एक्सचेंज करेंगे. वरना वो हमारे धान की अच्छाईयों का इस्तेमाल करके नया डेवलप करता. इससे हमारे किसानों को नुकसान होता.
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इरी के राइस जीन बैंक में 1 लाख से अधिक धान की प्रजातियां हैं


तब बासमती बनाम टेक्सामती का हाल होता

जैसे अमेरिका ने भारत के बासमती चावल की नकल करके टेक्सामती के नाम से अपनी चावल प्रजाति पैदा कर ली. ऐसा ही हमारे प्राचीन धानों के जरिए चीन भी कर लेता. इंटरनेशनल दबावों के बावजूद चीन के इस रवैये का विरोध किया गया. चाइना ये तो चाहता है कि वो दूसरों की प्रजातियां अपने यहां एकत्र करे लेकिन अपनी प्रजातियां नहीं देना चाहता.

रिटायरमेंट के बाद भी रिसर्च में जुटे हैं  प्रो. चौधरी 

प्रो. चौधरी काला नमक चावल को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने के लिए खास तौर पर जाने जाते हैं. साल 2006 में यूनाइटेड नेशन के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) में चीफ टेक्निकल एडवाइजर के पद से रिटायर होने के बाद भी प्रो. चौधरी आराम से नहीं बैठे हैं. वो अब भी धान पर शोध करने में जुटे हुए हैं. ताकि यहां की धान प्रजातियों को विश्व स्तर पर पहचान मिल सके. जबकि तमाम वैज्ञानिक रिटायर होने के बाद चैन की जिंदगी जीते हैं.
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