40 साल में पहली बार देश की GDP निगेटिव होने से आपका क्या बिगड़ेगा?

40 साल में पहली बार देश की GDP निगेटिव होने से आपका क्या बिगड़ेगा?
क्या होगा देश में अगर आर्थिक मंदी आती है तो?

कोरोना के इस संकट में आम आदमी की मुश्किलें तो लगातार बढ़ ही रही हैं. वहीं अब खबर आ रही है कि देश की जीडीपी ग्रोथ निगेटिव हो सकती है. इसका मतलब साफ है कि देश की अर्थव्यवस्था में मंदी आने वाली है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 31, 2020, 1:54 PM IST
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नई दिल्ली. पिछली दो मॉनिटरी पॉलिसी में रिजर्व बैंक (RBI-Reserve Bank of India) बता चुका है कि जीडीपी ग्रोथ नेगेटिव (India GDP Negative) टेरिटरी में रहने वाली है अर्थात भारत का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बढ़ने के बजाय घटने वाला है. ये कमी या गिरावट कितनी होगी, इस सवाल का जवाब रिजर्व बैंक गवर्नर ने नहीं दिया. उनका तर्क था कि आप अगर बता दें कि कोरोना का संकट कब खत्म होगा तो मैं बता दूंगा कि गिरावट कितनी होगी.

GDP यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (Gross Domestic Products) आखिरी होती क्या है और किसी देश के लिए कितनी जरूरी होती है. यह शायद ही कभी आपने सोचा होगा. एक्सपर्ट्स बताते हैं कि जीडीपी किसी भी देश की आर्थिक (Indian Economy) सेहत को मापने का सबसे जरूरी पैमाना है.

जीडीपी किसी खास अवधि के दौरान वस्तु और सेवाओं के उत्पादन की कुल कीमत है. भारत में जीडीपी की गणना हर तीसरे महीने यानी तिमाही आधार पर होती है. ध्यान देने वाली बात ये है कि ये उत्पादन या सेवाएं देश के भीतर ही होनी चाहिए.



क्या होगा GDP गिरने से... जीडीपी के कमजोर आंकड़ों के प्रभाव को विस्तार से बताते हुए एक्सपर्ट्स कहते हैं कि 2018-19 के प्रति व्यक्ति मासिक आय 10,534 रुपये के आधार पर, वार्षिक जीडीपी 5 पर्सेंट रहने का मतलब होगा कि प्रति व्यक्ति आय वित्त वर्ष 2020 में 526 रुपये बढ़ेगी.
अगर आसान भाषा में समझें तो कुछ इस तरह से कह सकते हैं कि जीडीपी 4 फीसदी की दर से बढ़ती है तो आमदनी में वृद्धि 421 रुपये होगी. इसका मतलब है कि विकास दर में 1 फीसदी की कमी से प्रति व्यक्ति औसत मासिक आमदनी 105 रुपये कम हो जाएगी.



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दूसरे शब्दों में कहें तो यदि वार्षिक जीडीपी दर 5 से गिरकर 4 फीसदी होती है तो प्रति माह आमदनी 105 रुपये कम होगी. यानी एक व्यक्ति को सालाना 1260 रुपये कम मिलेंगे.

अर्थव्यवस्था में और अधिक असमानता होगी. अमीरों के मुकाबले गरीबों पर इसका अधिक असर हो सकता है. उन्होंने कहा, 'गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या बढ़ सकती है. जीडीपी में गिरावट से रोजगार दर में भी कमी आएगी.'

एक्सपर्ट्स बताते हैं कि आम आदमी की जिंदगी पर जीडीपी गिरने का कोई असर सीधे नहीं पड़ता. भविष्य के लिए भी यह अच्छा संकेत नहीं है क्योंकि अगर अर्थव्यवस्था मंदी में जा रही हो तो बेरोज़गारी का खतरा बढ़ जाता है.

जिस तरह आम आदमी कमाई कम होने की खबर सुनकर खर्च कम और बचत ज्यादा करने लगता है बिल्कुल ऐसा ही व्यवहार कंपनियां भी करने लगती हैं और किसी हद तक सरकारें भी. नई नौकरियां मिलनी भी कम हो जाती हैं और लोगों को निकाले जाने का सिलसिला भी तेज होता है. सीएमआइई के मुताबिक सिर्फ जुलाई में पचास लाख नौकरीपेशा लोग बेरोजगार हो गए हैं.

ऐसे में लोग घबराकर लोग ख़र्च कम करते हैं तो हर तरह के कारोबार पर असर पड़ता है. उद्योगों के उत्पाद की मांग कम होने लगती है और लोग बचत बढ़ाते हैं तो बैंकों में ब्याज़ भी कम मिलता है. दूसरी तरफ बैंकों से कर्ज़ की मांग भी गिरती है. उल्टे लोग अपने अपने कर्ज चुकाने पर ज़ोर देने लगते हैं.

सामान्य स्थिति में यह अच्छी बात है कि ज्यादातर लोग कर्ज़ मुक्त रहें. लेकिन अगर ऐसा घबराहट में हो रहा है तो यह इस बात का संकेत है कि देश में किसी को भी अपना भविष्य अच्छा नहीं दिख रहा है इसलिए लोग कर्ज़ लेने से कतरा रहे हैं क्योंकि उन्हें यकीन नहीं है कि वो भविष्य में अच्छा पैसा कमा कर यह कर्ज़ आसानी से चुका पाएंगे.

एकदम ऐसा ही हाल उन लोगों का भी है जो कंपनियां चला रहे हैं, पिछले कुछ समय में तमाम बड़ी कंपनियों ने बाज़ार से पैसा उठाकर या अपना हिस्सा बेचकर कर्ज़ चुकाए हैं.

देश की सबसे बड़ी प्राइवेट कंपनी रिलायंस इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जिसने इसी दौरान डेढ़ लाख करोड़ रुपए से ऊपर का कर्ज़ चुका कर खुद को कर्ज़मुक्त कर लिया है

इस आधार पर तय होती है भारत की GDP- देश में एग्रीकल्चर, इंडस्ट्री और सर्विसेज़ यानी सेवा तीन प्रमुख घटक हैं जिनमें उत्पादन बढ़ने या घटने के औसत आधार पर जीडीपी दर तय होती है. ये आंकड़ा देश की आर्थिक तरक्की का संकेत देता है. अगर आसान भाषा में कहें तो मतलब साफ है कि अगर जीडीपी का आंकड़ा बढ़ा है तो आर्थिक विकास दर बढ़ी है और अगर ये पिछले तिमाही के मुक़ाबले कम है तो देश की माली हालत में गिरावट का रुख़ है.

भारत में कौन जारी करता है GDP के आंकड़ें- सरकारी संस्था CSO ये आंकड़े जारी करती है. 
केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय यानी सीएसओ देशभर से उत्पादन और सेवाओं के आंकड़े जुटाता है इस प्रक्रिया में कई सूचकांक शामिल होते हैं, जिनमें मुख्य रूप से औद्योगिक उत्पादन सूचकांक यानी आईआईपी और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई हैं.


GDP को समझने के लिए इन चीजों का जानना बेहद जरूरी है... 


अगर साल 2011 में देश में सिर्फ़ 100 रुपये की तीन वस्तुएं बनीं तो कुल जीडीपी हुई 300 रुपये. और 2017 तक आते-आते इस वस्तु का उत्पादन दो रह गया लेकिन क़ीमत हो गई 150 रुपये तो नॉमिनल जीडीपी 300 रुपये हो गया.

यहीं बेस ईयर का फॉर्मूला काम आता है. 2011 की कॉस्टेंट कीमत (100 रुपये) के हिसाब से वास्तविक जीडीपी हुई 200 रुपये. अब साफ़-साफ़ देखा जा सकता है कि जीडीपी में गिरावट आई है.

सीएसओ विभिन्न केंद्रीय और राज्य एजेंसियों से समन्वय स्थापित कर आंकड़े एकत्र करता है. मसलन, थोक मूल्य सूचकांक यानी डब्ल्यूपीआई और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई की गणना के लिए मैन्युफैक्चरिंग, कृषि उत्पाद के आंकड़े उपभोक्ता मामलों का मंत्रालय जुटाता है.

इसी तरह आईआईपी के आंकड़े वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय के तहत आने वाला विभाग जुटाता है. सीएसओ इन सभी आंकड़ों को इकट्ठा करता है फिर गणना कर जीडीपी के आंकड़े जारी करता है.

मुख्य तौर पर आठ औद्योगिक क्षेत्रों के आंकड़े जुटाए जाते हैं. ये हैं- कृषि, खनन, मैन्युफैक्चरिंग, बिजली, कंस्ट्रक्शन, व्यापार, रक्षा और अन्य सेवाएं.
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