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RBI के फैसले से खुश नहीं है इंडस्ट्रियल सेक्टर, बताई ये वजह

भाषा
Updated: February 6, 2020, 8:52 PM IST
RBI के फैसले से खुश नहीं है इंडस्ट्रियल सेक्टर, बताई ये वजह
RBI गवर्नर शक्तिकांत दास

भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा गुरुवार को मौद्रिक नीतिगत ब्याज दरों में कोई बदलाव नहीं करने के बाद देश के उद्योग मंडल मायूस है. उनका कहना है कि आरबीआई के पास ब्याज दरों में कटौती करने का बेहतर मौका था ताकि मांग में इजाफा किया जा सके.

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नई दिल्ली. रिजर्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति (Monetary Policy) में रेपो दर को पूर्ववत रखे जाने को लेकर उद्योग जगत (Industrial Sector) ने मायूसी जताई है. उद्योग जगत का मानना है कि अर्थव्यवस्था (Economy) में गतिविधियों को बढ़ाने के लिये रेपो दर को घटाकर 4.5 प्रतिशत के स्तर पर लाया जाना चाहिये. हालांकि, वाहन क्षेत्र, आवास और छोटे उद्योगों के लिये नकदी बढ़ाने के उपायों को उद्योग जगत ने प्रोत्साहन देने वाला कदम बताया है.

रेपो रेट घटाने का बेहतर समय था
उद्योग मंडल FICCI की अध्यक्ष संगीता रेड्डी ने कहा है कि रेपो दर में इस समय 0.15 से 0.25 प्रतिशत तक की कटौती की जरूरत थी और समय भी उपयुक्त था. रेड्डी ने कहा है कि रिजर्व बैंक का यह कदम मुद्रास्फीति (Inflation) उसके संतोषजनक दायरे से ऊपर निकल जाने की वजह से हो सकता है लेकिन उद्योगों का मानना है कि इस समय मुद्रास्फीति की वजह आपूर्ति की कमी हो सकती है. उन्होंने कहा अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर कमजोर बनी हुई है. ऐसे में रेपो दर में चौथाई प्रतिशत तक की कटौती करना ‘सही समय पर उठाया गया कदम होता.’

Assocham के अध्यक्ष निरंजन हीरानंदानी ने हालांकि मौद्रिक समीक्षा पर सकारात्मक दृष्टिकोण दिखाते हुये कहा कि नीति में बैंकिंग तंत्र एक लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त तरलता डालने के साथ ही वाहन, आवास और छोटे एवं मझोले उद्योग क्षेत्र को बढ़ावा दिया गया है.

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MSME सेक्टर को मिलेगा मददहीरानंदानी एसोचैम का अध्यक्ष होने के साथ ही आवास क्षेत्र की शीर्ष संस्था नारेडको के भी अध्यक्ष हैं. उन्होंने कहा कि मध्यम श्रेणी के उद्योगों को बैंकों से बाहरी दर से जुड़ी ब्याज दर पर कर्ज उपलब्ध कराये जाने और एमएसएमई के पुराने कर्ज के पुनर्गठन के मामले में उदार रवैया अपनाये जाने के कदम से पूरी अर्थव्यवस्था में धारणा सकारात्मक होगी और उसे बल मिलेगा. रिजर्व बैंक ने सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) के कर्जों के एकबारगी पुनर्गठन की समयसीमा को मार्च से बढ़ाकर 31 दिसंबर 2020 तक कर दिया है. यह कदम न केवल संकटग्रस्त क्षेत्र को राहत पहुंचायेगा बल्कि बैंकों के लिये भी उनके बहीखातों को ठीक करने में मदद देगा.

हीरानंदानी ने हालांकि, रिजर्व बैंक द्वारा मौद्रिक समीक्षा में लगातार दो बार रेपो दर को यथावत छोड़ दिये जाने पर निराशा जताते हुये कहा कि इससे लगता है कि रिजर्व बैंक की निगाहें अब मुद्रास्फीति लक्ष्य पर ही हैं और आर्थिक वृद्धि को उन्होंने पिछली सीट पर रख दिया है. वित्तीय प्रोत्साहन के लिहाज से फीका बजट रहने के बाद अब मौद्रिक समीक्षा में भी कोई बदलाव नहीं होना अर्थव्यवस्था के लिये बड़ा झटका है.

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मांग बढ़ाने के लिए जरूरी है रेपो रेट में कटौती करना
पीएचडी वाणिज्य एवं उद्योग मंडल के अध्यक्ष डी के अग्रवाल ने कहा कि मांग बढ़ाने के लिये रिजर्व बैंक को आगे चलकर रेपो दर में बड़ी कटौती करनी चाहिये.इसे घटाकर 4.5 प्रतिशत के स्तर पर लाया जाना चाहिये. रिजर्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष की छठी द्विमासिक मौद्रिक नीति की समीक्षा में मुख्य दर रेपो को 5.15 प्रतिशत पर पूर्ववत रखा है. इसके साथ ही रिवर्स रेपो दर भी 4.90 प्रतिशत, सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) दर और बैंक दर 5.40 प्रतिशत पर पूर्ववत रहीं हैं.

पिछले 5 बैठकों में ब्याज दर घटा चुका है RBI
अग्रवाल ने कहा है कि मौजूदा परिस्थितियों में बैंकिंग क्षेत्र की ओर से यह प्रयास होना चाहिये कि रिजर्व बैंक ने इससे पहले रेपो दर में जितनी कटौती की है उसका पूरा लाभ आगे ग्राहकों तक पहुंचाया जाना चाहिये. रिजर्व बैंक ने पिछले पांच समीक्षाओं के दौरान रेपो दर में कुल मिलाकर 1.35 प्रतिशत तक की कटौती की है लेकिन बैंकों की ब्याज दर में इसके अनुरूप कमी नहीं आई है.

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First published: February 6, 2020, 8:50 PM IST
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