केंद्र ने किसानों को भेजा YouTube मैसेज, तो क्या फसल बीमा करवाने से परहेज कर रहे अन्नदाता?

केंद्र ने किसानों को भेजा YouTube मैसेज, तो क्या फसल बीमा करवाने से परहेज कर रहे अन्नदाता?
केंद्र सरकार ने किसानों से फसल बीमा योजना में शामिल होने की अपील की है

अधूरे आंकड़ों के साथ बीमा करने वाली कंपनियों के लिए बैटिंग करने उतरा कृषि मंत्रालय, बीमा फायदेमंद तो साल दर साल क्यों घट रहा बीमित रकबा? पढ़िए पूरा विश्लेषण

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नई दिल्ली. केंद्रीय कृषि मंत्रालय (Ministry of Agriculture) में रजिस्टर्ड किसानों के मोबाइल पर फसल बीमा करवाने की अपील वाला एक मैसेज भेजा गया है. इसमें एक यू-ट्यूब लिंक (YouTube) है, जिसे खोलने पर कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर (Agriculture Minister Narendra Singh Tomar) का संदेश आता है. इसमें कहा गया है कि योजना को स्वैच्छिक तो कर दिया गया है लेकिन इसमें शामिल होना फायदेमंद है. इसके पीछे तर्क देते हुए कहा गया है कि आपने जितना प्रीमियम दिया है उसका साढ़े चार गुना अधिक मुआवजा मिला है. लेकिन, एक आंकड़ा और भी है, जिसे कृषि मंत्रालय छिपा रहा है, उसका जिक्र वीडियो में नहीं है. हालांकि आंकड़ों की बहस में बड़ा सवाल ये है कि क्या अब किसान फसल बीमा से परहेज करने लगे हैं जो मंत्री को अपील करनी पड़ रही है. ऐसा है तो उसकी वजह क्या है?

कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि बीमा कंपनियां किसानों को मुआवजे के लिए भटकाती रहती हैं. उनकी शर्तें अजीब हैं. अन्नदाता इन कंपनियों की मनमानी से परेशान हैं. अब तक सरकार ने ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बनाई है जिससे कि किसानों को आसानी से बीमा योजना का लाभ मिल सके. इसलिए ज्यादातर किसान उनके दुष्चक्र में फंसने से अब बच रहे हैं.

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किसानों के मोबाइल फोन पर भेजा गया मैसेज




क्या बीमा स्वैच्छिक होने बढ़ी कंपनियों की बेचैनी?
कुछ किसान संगठनों के तर्क को समझते हुए मोदी सरकार (Modi Government) ने 19 फरवरी 2020 को इस योजना में एक बड़ा बदलाव किया. किसान क्रेडिट कार्ड (Kisan Credit Card) लेने पर फसल बीमा करवाने की बाध्यता खत्म कर दी. बीमा कंपनियों के सामने यही सबसे बड़ी दिक्कत है.

पहले हर कृषि कर्ज लेने वाले को मजबूरन प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana) का हिस्सा बनना पड़ता था. इस तरह आसानी से कंपनियों की झोली भर जाती थी. लेकिन, अब बिना किसान के कहे कोई कंपनी अकाउंट से प्रीमियम नहीं काट सकती. इसलिए कंपनियां बेचैन हैं और सरकार इनके पक्ष में खुलकर बैटिंग कर रही है. इस वक्त करीब 58 फीसदी किसान ऋण लेने वाले हैं. हालांकि, कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का तो मानना है कि स्वैच्छिक आधार पर स्वीकार्यता बढ़ी है.

साल दर साल घट रहा बीमित क्षेत्र

इस योजना में बीमा कंपनियों (Insurance companies) की मनमानी की वजह से किसानों का इससे मोहभंग हो रहा है. इसकी तस्दीक साल दर साल घटता बीमित क्षेत्र कर रहा है.

-साल 2016-17 में देश का कुल बीमित क्षेत्र 577.234 लाख हेक्‍टेयर था जो साल 2017-18 में घटकर सिर्फ 515.438 लाख हेक्‍टेयर रह गया.

-यह सिलसिला 2018-19 में भी जारी रहा. अब यह घटकर महज 507.987 लाख हेक्‍टेयर ही रह गया.

-कुल मिलाकर पिछले तीन साल में ही 69 लाख हेक्टेयर से अधिक बीमित क्षेत्र घट गया है. ये आंकड़ा केंद्रीय कृषि मंत्रालय का ही है.

https://twitter.com/pmfby/status/1284062439588282368?s=20

कृषि मंत्रालय का तर्क

कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर का कहना है कि यह योजना 2016 में शुरू हुई थी. इसके बाद से किसानों ने तीन साल में प्रीमियम के रूप में 13,000 करोड़ जमा किए.

-जब आपदा से फसल बबार्द हुई तो किसानों को 64,000 करोड़ का मुआवजा मिला. यह राशि प्रीमियम से करीब 4.5 गुना है. लॉकडाउन के दौरान ही करीब 8090 करोड़ का भुगतान हुआ. इसलिए किसानों को इसे करवाना चाहिए.

फसल बीमा प्रीमियम का पूरा सच

राष्ट्रीय किसान महासंघ (Rashtriya Kisan Mahasangh) के संस्थापक सदस्य बिनोद आनंद कहते हैं कि इस योजना को लेकर किसानों के अपने तर्क हैं. 13 हजार करोड़ रुपये के प्रीमियम पर 64 हजार करोड़ रुपये के मुआवजे की बात सिर्फ आंकड़ों का अर्ध्यसत्य है.

-सच तो ये है कि बीमा कंपनियों को तीन साल में 75,740.88 करोड़ रुपये का प्रीमियम मिला. यह भी केंद्रीय कृषि मंत्रालय का ही आंकड़ा है.

-यह एक सच है कि किसानों ने अपनी जेब से बीमा कंपनियों को सिर्फ 13,000 करोड़ रुपये का प्रीमियम दिया है. लेकिन दूसरा सच यह है कि कंपनियों को सिर्फ इतना ही प्रीमियम नहीं मिला है.

-किसानों द्वारा अपने पास से दिए गए प्रीमियम के अलावा 62,740.88 करोड़ रुपये राज्यों और केंद्र ने भी मिलकर कंपनियों को दिया है.

-सवाल ये है कि इस आंकड़े को किस वजह से छिपाया जा रहा है. क्या यह पब्लिक मनी नहीं है. क्या यह टैक्सपेयर का पैसा नहीं है. अगर है तो कृषि बीमा कंपनियां इस पूरे मामले में फायदे में हैं.

किसानों की बजाय कंपनियों के पक्ष में हैं शर्तें: शर्मा

कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा का कहना है कि बीमा फायदेमंद है और हर किसान इसे करवाना चाहता है. लेकिन सरकार ने अधिकांश शर्तें बीमा कंपनियों के पक्ष में बना रखी हैं, जिससे इसका फायदा किसानों को नहीं मिल पाता.

जब फसल नुकसान का आकलन होता है तो पूरे गांव को यूनिट मानकर कंपनियां एवरेज निकालती हैं. जबकि यह आकलन व्यक्तिगत होना चाहिए. इसके लिए हर किसान के खेत को एक यूनिट माना जाए. इससे किसान को उचित मुआवजा मिलेगा. जिस दिन सरकार ने ऐसा कर दिया उस दिन किसी को बीमा करवाने के लिए अपील नहीं करनी पड़ेगी.

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प्राकृतिक आपदा में फसल खराब होने के बाद फसल बीमा का है सहारा


बीमा कंपनियों का जिलों में ऑफिस तक नहीं

शर्मा का कहना है कि बीमा कंपनियां इतने मजे में हैं कि वो किसानों की कभी परवाह नहीं करतीं. किसी बीमा कंपनी का जिले में ऑफिस नहीं है न तो उनके बीमा एजेंट हैं. कोई किसान की सुनने वाला नहीं है. फोन पर कोई उनकी सुनता नहीं. इसलिए कंपनी मजे में और किसान परेशान है. जितना पैसा सरकार इन्हें प्रीमियम के रूप में देती है उतना आपदा आने पर किसानों को खुद ही दे दे तो बेहतर होगा.

प्रीमियम अलग-अलग क्यों?

बीमा राष्ट्रीय योजना है लेकिन प्रीमियम अलग-अगल है. जब वन नेशन-वन राशन कार्ड हो गया. वन नेशन-वन टैक्स हुआ है. वन नेशन-वन मार्केट की बात की जा रही है तो फसल बीमा का प्रीमियम एक ही देश में अलग-अलग क्यों है?

बीमा योजना में बड़ा बदलाव

-किसान की इच्छा के बिना नहीं कटेगा प्रीमियम

-बीमा कंपनियों के लिए अनुबंध की अवधि को एक वर्ष से बढ़ाकर तीन वर्ष तक किया गया है.

-एकल जोखिम के लिए भी बीमा की अनुमति दी गई है. अब किसान अपनी फसलों के लिए अधिक महंगे, बहु-जोखिम कारक (जिनमें से कई कारकों के किसी क्षेत्र विशेष में होने की संभावना न के बराबर होती है) के कवर के लिए भुगतान करने की बजाय उन जोखिम कारकों का चयन कर सकते हैं, जिसके लिए वे अपनी फसल का बीमा करवाना चाहते हैं.

कितना देना होता है प्रीमियम

पीएम फसल बीमा योजना के तहत खरीफ फसलों पर 2 फीसदी, रबी फसलों पर 1.5 फीसदी और बागवानी नकदी फसलों पर अधिकतम 5 फीसदी प्रीमियम लगता है. बाकी का 98 फीसदी प्रीमियम केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर देती हैं.

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फसल खराब होने पर मुआवजा लेना इतना आसान नहीं है


हरियाणा सरकार भी गिना रही फायदा

हरियाणा सरकार भी फसल बीमा करवाने के लिए अपील कर रही है. उसने इसके फायदे बताए हैं. कहा है कि इस स्कीम के तहत तीन प्रकार के जोखिमों को कवर किया जाता है.

1-खड़ी फसल में बीमारी, सूखा, बाढ़, जलभराव एवं तूफान के कारण होने वाले नुकसान को पैदावार के आधार पर कवर किया जाता है.

2-फसल कटने के 14 दिन तक यदि ओलावृष्टि, जलभराव, चक्रवाती बरसात या गैर-मौसमी बरसात से नुकसान होता है तो व्यक्तिगत स्तर पर सर्वे उपरांत नुकसान की भरपाई की जाती है.

3-स्थानीय आपदाओं के तहत किसान की फसल कटाई से 15 दिन पहले ओलावृष्टि, जलभराव, बादल फटने व आसमानी बिजली के कारण हुए नुकसान के लिए 72 घंटे में सूचना देकर फसल का सर्वे नोटिफाइड कमेटी द्वारा किया जाता है. इसमें खंड कृषि अधिकारी, कृषि विकास अधिकारी, कंपनी के नुमाइंदे शामिल होते हैं. सर्वे किसान की मौजूदगी में होता है. इसमें मुख्य रूप से हानि का प्रतिशत व नुकसान का कारण लिखा जाता है.
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