'आर्थिक मंदी की चपेट में नहीं आएगा भारत, लेकिन ग्लोबल अर्थव्यवस्था को लेकर चिंताएं बढ़ीं'

'आर्थिक मंदी की चपेट में नहीं आएगा भारत, लेकिन ग्लोबल अर्थव्यवस्था को लेकर चिंताएं बढ़ीं'
'आर्थिक मंदी के चपेट में नहीं आएगा भारत, लेकिन ग्लोबल अर्थव्यवस्था को लेकर चिंताएं और बढ़ी'

अमेरिकी रेटिंग एजेंसी जेपी मॉर्गन के इंडिया इक्विटी रिसर्च हेड (JP Morgan Equity Research Head) का कहना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) के मंदी के भंवर में फंसने की आशंका न के बराबर है.

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  • Last Updated: September 18, 2019, 11:22 AM IST
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नई दिल्ली. भारतीय अर्थव्यवस्था (Indian Economy) में मंदी के फिलहाल कोई आसार नज़र नहीं आ रहे हैं. लेकिन ग्लोबल इकोनॉमी (Global Economy) का इससे बच पाना बेहद मुश्किल है. ये बातें अमेरिकी रेटिंग एजेंसी जेपी मॉर्गन के इंडिया इक्विटी रिसर्च हेड (JP Morgan Equity Research Head) ने कही हैं. उनके मुताबिक, सरकार (Government of India) की ओर से इंफ्रा पर खर्च बढ़ने का फायदा बैंक और इस सेक्टर की बड़ी सरकारी कंपनियों को मिलेगा. अमेरिका-चीन व्यापार युद्ध (Trade War) का भी ग्लोबल इकॉनमी और ट्रेड पर असर हो रहा है. ग्लोबल सप्लाई चेन में भारत का योगदान बहुत कम है.

अंग्रेजी के बिजनेस अखबार इकोनॉमिक टाइम्स को दिए इंटरव्यू में जेपी मॉर्गन के इंडिया इक्विटी रिसर्च हेड राजेश मैस्करेनस ने कहा है कि अगले दो साल में ग्लोबल इकोनॉमी में मंदी आने की 40 फीसदी आशंका है. इसीलिए दुनियाभर के सेंट्रल बैंक अब  ब्याज दरों में कटौती कर रहे हैं और सरकारी खर्च में भी बढ़ोतरी हो रही है.

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भारत के मंदी में फंसने के चांस कम- अगर भारत की बात करें तो इस देश की अर्थव्यवस्था में कंजम्पशन बड़ा फैक्टर है, इसे निवेश से सपोर्ट मिल रहा है. भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, न कि ट्रेड. इसलिए हमें नहीं लगता है कि भारत मंदी में फंसेगा. हालांकि, दुनियाभर में मंदी आई तो इसका असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी होगा, क्योंकि ऐसे में भारत का एक्सपोर्ट घट जाएगा और इंपोर्ट बढ़ जाएगा. लिहाजा सरकार के खर्च पर असर पड़ेगा.

ये चीजें अब भारत के फेवर में हैं-भारतीय मैक्रो इकनॉमिक डेटा अभी मिले-जुले हैं. अच्छी बात मैक्रो इकॉनमी में स्थिरता है. महंगाई दर काबू में है. इससे ब्याज दर घटाने में मदद मिल रही है.

>> केंद्र सरकार का ध्यान वित्तीय अनुशासन पर बना हुआ है, जिसकी तारीफ होनी चाहिए. हालांकि पिछली कुछ तिमाहियों में भारत की ग्रोथ में काफी कमी आई है.

>> हमें लगता है कि इस वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में भारतीय इकॉनमी में धीरे-धीरे रिकवरी शुरू होगी. मीडियम टर्म में यह रिकवरी कहीं मजबूत हो सकती है क्योंकि इकॉनमी में कपैसिटी यूटिलाइजेशन बढ़ रहा है.

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>> इससे निजी क्षेत्र की तरफ से निवेश बढ़ सकता है. अगर भारत अच्छा विदेशी निवेश हासिल करने में सफल रहता है और सरकार आक्रामक विनिवेश से खजाने की हालत ठीक कर पाती है तो इन्वेस्टमेंट साइकल में तेजी आ सकती है.

>> पिछले कुछ दिनों में क्रूड ऑयल के दाम में काफी तेजी आई है. इस पर नजर रखनी होगी. अगर यह तेजी बनी रहती है तो भारतीय अर्थव्यवस्था और शेयर बाजार पर निगेटिव असर होगा.

क्या होती है आर्थिक मंदी-भारत सहित दुनिया के कई देशों में आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती के स्पष्ट संकेत दिख रहे हैं. अर्थव्यवस्था के मंदी की तरफ बढ़ने पर आर्थिक गतिविधियों में चौतरफा गिरावट आती है. ऐसे कई दूसरे पैमाने भी हैं, जो अर्थव्यवस्था के मंदी की तरफ बढ़ने का संकेत देते हैं.

>> इससे पहले आर्थिक मंदी ने साल 2007-2009 में पूरी दुनिया में तहलका मचाया था. वो 1930 की मंदी के बाद सबसे बड़ा आर्थिक संकट था. यहां हम ऐसे संकेतों पर चर्चा कर रहे हैं.

>> अर्थशास्त्री बताते हैं कि अगर किसी अर्थव्यवस्था की विकास दर या जीडीपी तिमाही-दर-तिमाही लगातार घट रही है, तो इसे आर्थिक मंदी का बड़ा संकेत माना जाता है. किसी देश की अर्थव्यवस्था या किसी खास क्षेत्र के उत्पादन में बढ़ोतरी की दर को विकास दर कहा जाता है.

>> अगर देश की विकास दर का जिक्र हो रहा हो, तो इसका मतलब देश की अर्थव्यवस्था या सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बढ़ने की रफ्तार से है. जीडीपी एक निर्धारित अवधि में किसी देश में बने सभी उत्पादों और सेवाओं के मूल्य का जोड़ है.

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>> आर्थिक मंदी का एक दूसरा बड़ा संकेत यह है कि लोग खपत यानी कंजम्प्शन कम कर देते हैं. इस दौरान बिस्कुट, तेल, साबुन, कपड़ा, धातु जैसी सामान्य चीजों के साथ-साथ घरों और वाहनों की बिक्री घट जाती है. दरअसल, मंदी के दौरान लोग जरूरत की चीजों पर खर्च को भी काबू में करने का प्रयास करते हैं. कुछ जानकार वाहनों की बिक्री घटने को मंदी का शुरुआती संकेत मानते हैं.

>> उनका तर्क है कि जब लोगों के पास अतिरिक्त पैसा होता है, तभी वे गाड़ी खरीदना पसंद करते हैं. यदि गाड़ियों की बिक्री कम हो रही है, इसका अर्थ है कि लोगों के पैसा कम पैसा बच रहा है.

इन संकेतों पर रखें नज़र
>> 
आर्थिक विकास दर का लगातार गिरना
>> कंजम्प्शन में गिरावट
>> औद्योगिक उत्पादन में गिरावट
>> बेरोजगारी बढ़ जाती है
>> बचत और निवेश में कमी
>> कर्ज की मांग घट जाती है
>> शेयर बाजार में गिरावट
>> घटती लिक्विडिटी
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