SC में आधार के फैसले पर क्यों बार-बार हुई मनी बिल की बात, आइए जानें इसके बारे में...

सुप्रीम कोर्ट ने आईटी रिटर्न भरने के लिए और पैन कार्ड के लिए आधार देना जरूरी किया है. हालांकि आधार बिल को मनी बिल के तौर पर पारित किये जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जजों की राय बंटी हुई थी.

News18Hindi
Updated: September 26, 2018, 2:28 PM IST
SC में आधार के फैसले पर क्यों बार-बार हुई मनी बिल की बात, आइए जानें इसके बारे में...
सुप्रीम कोर्ट ने आईटी रिटर्न भरने के लिए और पैन कार्ड के लिए आधार देना जरूरी किया है. हालांकि आधार बिल को मनी बिल के तौर पर पारित किये जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जजों की राय बंटी हुई थी.
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Updated: September 26, 2018, 2:28 PM IST
सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में आधार को संवैधानिक तौर पर वैध बताया है. यही नहीं कोर्ट ने आईटी रिटर्न भरने के लिए और पैन कार्ड के लिए आधार देना जरूरी किया है. हालांकि आधार बिल को मनी बिल के तौर पर पारित किये जाने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के जजों की राय बंटी हुई थी. आइए जानें पूरा मामला...

जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि साधारण बिल को मनी बिल घोषित करना राज्यसभा को उसके अधिकारों से वंचित रखना है. वहीं जस्टिस सीकरी ने कहा कि आधार को मनी बिल के तौर पर पास कराया जा सकता है. (ये भी पढ़ें-बैंक अकाउंट समेत इन पांच चीजों के लिए अब जरूरी नहीं होगा आधार)

प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संवैधानिक बेंच में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए के सिकरी, जस्टिस ए एम खानविल्कर, जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल हैं. (ये भी पढ़ें-Aadhaar को PAN कार्ड के साथ लिंक करना जरूरी: सुप्रीम कोर्ट ने कहा)

क्या होता है मनी बिल- मनी बिल वह बिल होता है, जिसमें केवल धन से जुड़े हुए प्रस्ताव शामिल किया गया हो. इस बिल के अंतर्गत सिर्फ राजस्व और खर्च से जुड़े हुए मामले ही आते हैं. मनी बिल पर राज्यसभा में सिर्फ चर्चा हो सकती है, लेकिन उस बिल पर राज्‍यसभा में वोटिंग नहीं हो सकती है. इसके अलावा मनी बिल पर राज्यसभा सिर्फ अपनी राय दे सकती है, लेकिन उसमें कोई संशोधन नहीं कर सकती और ना ही कोई प्रस्‍ताव ला सकती है. लोकसभा मनी बिल पर दी गई सलाहों को मानने और न मानने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र है. आम तौर पर मनी बिल को लोकसभा में ही पेश किया जाता है और उस पर अंतिम फैसला लोकसभा ही लेती है. (ये भी पढ़ें-PAN कार्ड को Aadhaar के साथ ऐसे करें फटाफट लिंक, ये है पूरा प्रोसेस)

संविधान के अनुच्छेद 110 (1) के तहत मनी बिल वो विधेयक होता है जिसमें केवल धन से जुड़े हुए प्रस्ताव हों. इसके तहत राजस्व और खर्च से जुड़े हुए मामले आते हैं. ऐसे विधेयकों पर राज्य सभा में चर्चा तो हो सकती है लेकिन उस पर कोई वोटिंग नहीं हो सकती.

अगर यह सवाल उठता है कि कोई बिल मनी बिल है या नहीं है तो इसका फैसला स्पीकर करते हैं. स्पीकर का निर्णय अंतिम होता है. इसकी चर्चा अनुच्छेद 110 (3) में की गई है. मनी बिल पर राज्यसभा सिर्फ सलाह दे सकती है. लोकसभा उनकी सलाहों को मानने और नहीं मानने के लिए स्वतंत्र है. इस पर अंतिम फैसला लोकसभा ही लेगी.

बंटी जजों की राय- आधार पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ ने कहा कि किसी साधारण बिल को मनी बिल घोषित करना राज्य सभा के अधिकारों का हनन है. लिहाजा आधार एक्ट को मनी बिल नहीं कहा जा सकता. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आधार एक्ट संविधान के अनुच्छेद 110 (1) के अनुरूप नहीं है इसलिए यह एक्ट गैर-संवैधानिक है.
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आधार एक्ट को मनी बिल की तरह पास करने पर जस्टिस सीकरी ने कहा कि आधार को मनी बिल के तौर पर पास कराया जा सकता है. जिन्हें कोर्ट ने रद्द कर दिया है.

जस्टिस सीकरी ने कहा कि आधार एक्ट में मामूली बदलाव करने की जरूरत है. उन्होंने कहा कि सरकार या कोई कंपनी आधार नंबर को छह महीने से ज्यादा स्टोर नहीं रख सकती है. यानी अगर आप बैंक खाता खुलवाने या सिम कार्ड लेने के लिए आधार नंबर देते हैं तो उस आधार को 6 महीने से ज्यादा स्टोर नहीं किया जा सकता है. पहले यह डेटा पांच साल तक रखने की बात हुई थी.

क्या थी मनी बिल को लेकर सरकार की दलील-विपक्ष द्वारा आधार बिल को मनी बिल के तौर पर लाने को लेकर सरकार द्वारा इस विधेयक को मनी बिल के रूप में पास कराने पर वित्त मंत्री अरुण जेटली का तर्क था कि इसका उद्देश्य सरकारी पैसे को जरूरतमंद लोगों को सब्सिडी के रूप में देना है.

 

 

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First published: September 26, 2018, 2:14 PM IST
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