तीन गुना अधिक मिलती है इस धान की कीमत, जानिए काला नमक के बारे में सबकुछ

तीन गुना अधिक मिलती है इस धान की कीमत, जानिए काला नमक के बारे में सबकुछ
12,000 रुपये प्रति क्विंटल है काला नमक चावल का दाम

23 साल की रिसर्च के बाद निखरा काला नमक धान, 22 क्विंटल प्रति एकड़ तक हो सकती है पैदावार, आराम से डबल हो जाएगी किसानों की इनकम

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नई दिल्ली. जब देश में ‘ए’ ग्रेड धान (Paddy) का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 1835 रुपये प्रति क्विंटल चल रहा था, तब यूपी की राजधानी लखनऊ से करीब 270 किलोमीटर दूर नेपाल की अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास स्थित सिद्धार्थनगर जिले के किसान 55 सौ रुपये क्विंटल तक के रेट पर धान बेच रहे थे. उस धान का नाम है काला नमक. जिसके बारे में कहा जाता है कि सिद्धार्थनगर के बजहा गांव में यह गौतम बुद्ध (Gautam Buddha) के जमाने से पैदा हो रहा है. दावा है कि इसका जिक्र चीनी यात्री फाह्यान के यात्रा वृतांत में मिलता है. इस धान से निकला चावल सुगंध, स्वाद और सेहत से भरपूर है. इसकी खुशबू अब जापान, म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड और भूटान सहित बौद्ध धर्म के मानने वाले कई देशों तक पहुंच गई है.

यह धान तराई बेल्ट के महराजगंज में भी होता है, लेकिन सिद्धार्थनगर जिला मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर दूर वर्डपुर ब्लॉक काला नमक (Kala namak rice) का गढ़ है. प्राचीन वैराइटी का यह चावल दाम और स्वाद दोनों मामले में बासमती को भी मात देता है.

सिद्धार्थनगर के कृषि उप निदेशक लाल बहादुर यादव ने न्यूज18 हिंदी से बातचीत में बताया कि यह चावल इस समय 12,000 रुपये प्रति क्विंटल के रेट पर बिक रहा है. यह बारिश के नेचुरल पानी से ही होता है. काला नमक की नई किस्मों के आने से पिछले साल के मुकाबले इस बार एरिया बढ़कर डबल यानी करीब 10 हजार हेक्टेयर हो गया है.



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1997 से काला नमक पर रिसर्च कर रहे प्रो. रामचेत चौधरी

काला नमक को इन्होंने दिलाई पहचान

काला नमक चावल को विश्व स्तर पर पहचान दिलाने के लिए जाने-माने कृषि वैज्ञानिक प्रो. रामचेत चौधरी 1997 से काम कर रहे हैं. यूनाइटेड नेशन के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) में चीफ टेक्निकल एडवाइजर के पद से रिटायर प्रो. चौधरी की कोशिशों की वजह से काला नमक की न सिर्फ चार नई वैराइटी आई हैं बल्कि पूर्वांचल के 11 जिलों को जीआई (Geographical Indication) टैग भी मिला है.

इनमें सिद्धार्थनगर, महराजगंज, गोरखपुर, संत कबीरनगर, बाराबंकी, गोंडा, बहराइच, बलरामपुर, कुशीनगर, बस्ती और देवरिया शामिल हैं. ये जिले काला नमक चावल का उत्पादन और बिक्री दोनों कर सकते हैं. अन्य जिलों के लोग खाने के लिए उगा सकते हैं लेकिन काला नमक के नाम पर बिजनेस नहीं कर सकते.

जियोग्राफिकल इंडीकेशन का इस्तेमाल ऐसे उत्पादों के लिए किया जाता है, जिनका एक विशिष्ट भौगोलिक मूल क्षेत्र होता है. इन उत्पादों की विशिष्ट विशेषता एवं प्रतिष्ठा भी इसी मूल क्षेत्र के कारण ही होती है.

चौधरी की कोशिश ने इस पारंपरिक धान की उन्नत किस्में तैयार कर उत्पादन दोगुना से ज्यादा कर दिया है. इस वक्त यूपी के गोरखपुर (Gorakhpur) में रह रहे चौधरी से न्यूज18 हिंदी ने फोन पर बातचीत की. चौधरी ने गौतम बुद्ध के समय से अब तक की इस धान की यात्रा पर रौशनी डाली.

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सिद्धार्थनगर का बजहा रिजर्व वायर, इसमें एकत्र होता है बारिश का पानी


250 किस्म में से एक को चुना गया

चौधरी ने बताया कि जब उन्होंने इस प्राचीन धान को व्यावसायिक बनाने के लिए रिसर्च शुरू किया तब सिद्धार्थनगर में कोई 250 किस्म के नमूने एकत्र किए गए. इनके पौधों की ऊंचाई अलग-अलग थी. कुछ ऐसी भी किस्में थीं जिनमें महक नहीं थी. 2007 में हमने इसमें से सबसे प्योर एक धान को पकड़ा. उसे शुद्ध किया गया. केंद्र सरकार ने 2010 में केएन-3 के नाम से बीज बनाने के लिए नोटिफाई किया.

यह पैदा तो हो गया, लेकिन इसमें कुछ दिक्कतें थीं. जैसे डंठल पारंपरिक (1.5 से 2 मीटर तक) ही रह गया था. इसलिए वो लंबा होता था, गिर जाता था. हाथ से कटाई करनी पड़ती थी. इसमें प्रति एकड़ 10 क्विंटल धान ही पैदा होता था.

इसलिए इस पर फिर से रिसर्च शुरू की गई. साल 2016 में हमने इसका कद 90 सेंटीमीटर करने में सफलता हासिल की. इसका नाम रखा गया बौना काला नमक-101. साथ ही इसमें उपज बढ़कर प्रति एकड़ 18 से 20 क्विंटल हो गई. हालांकि, इसमें भी गड़बड़ी पकड़ में आई. इसकी महक कम थी. भूसी का रंग काला की जगह भूरा हो रहा था और इसमें दाने के ऊपर टूड पैदा होने लगा.

फिर एक और वैराइटी पर काम शुरू हुआ. यह 2017 में तैयार हुई. इसमें धान के दाने के ऊपर तूड़ नहीं था. महक भी आ गई थी और भूसी का रंग गाढ़ा हो गया था. इसका नाम बौना काला नमक 102 रखा गया.

इसे और शुद्ध करने के लिए एक और कोशिश की गई. 2019 में काला नमक किरण नामक वैराइटी तैयार हुई. इसकी भूसी का रंग गाढ़ा था. पैदावार 22 क्विंटल प्रति एकड़ हो गई. यह सामान्य धान से 10 दिन पहले ही 140 दिन में तैयार होने लगा. सुगंध, स्वाद, पोषक तत्व और लागत के मामले में यह प्रजाति सबसे खरी है. प्रो. चौधरी के मुताबिक इस धान को व्यावसायिक बनाने में हमें यूपी काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च और टाटा ट्रस्ट मुंबई का सहयोग मिला.

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सिद्धार्थनगर जिले की सेमरी नहर, इससे होकर जाता है धान के खेतों में पानी


कैसे होती थी सिंचाई

काला नमक धान सिद्धार्थनगर (Siddharth Nagar) जिले की पहचान रही है. ब्रिटिश काल में बर्डपुर, नौगढ़ व शोहरतगढ़ ब्लॉक इसकी खेती का गढ़ था. बताते हैं कि अंग्रेज जमींदार विलियम बर्ड ने बर्डपुर को बसाया था. इस धान के चावल की आपूर्ति ब्रिटेन में होती थी. इस जिले के वरिष्ठ पत्रकार नजीर मलिक बताते हैं कि अंग्रेजों को यह काफी पसंद था. यह नेचुरल पानी में पैदा होता है. ऐसे में काला नमक की खेती को बढ़ावा देने के लिए ही अंग्रेजों ने बजहा, सिसवा, मझौली सहित 12 सागरों (रिजर्व वायर) का निर्माण कराया था.

इन सागरों में बारिश का पानी एकत्र कर नहरों के जरिए खेतों तक पानी पहुंचाया जाता था. काला नमक को पैदा करने के लिए तीन पानी तो सामान्य तौर पर बारिश से मिल जाता था लेकिन चौथे के लिए रिजर्ववायर बनवाए गए थे. दुर्भाग्य से इनसे जुड़ीं सिर्फ तीन नहरें ही इस वक्त चालू हालात में हैं.
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