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अंग्रेजों के खिलाफ गुजरात के किसानों के विद्रोह की उपज है Amul, सरदार पटेल ने दुग्‍ध उत्‍पादकों को दिखाई संघर्ष की राह

अंग्रेजों के खिलाफ गुजरात के किसानों के विद्रोह की उपज है Amul, सरदार पटेल ने दुग्‍ध उत्‍पादकों को दिखाई संघर्ष की राह

अमूल की शुरूआत गुजरात के कैरा जिले में कए दुग्‍ध उत्‍पादक सोसायटी के रूप में हुई थी.

अमूल की शुरूआत गुजरात के कैरा जिले में कए दुग्‍ध उत्‍पादक सोसायटी के रूप में हुई थी.

अमूल (Amul) की शुरूआत गुजरात के कैरा जिले में कए दुग्‍ध उत्‍पादक सोसायटी के रूप में हुई थी और तब इसका नाम कैरा जिला कॉपरेटिव दूध उत्पादक संगठन था. बाद में डॉ. वर्गीज कुरियन (Dr. Verghese Kurien) ने इसका नाम बदलकर अमूल रखा था. आज की तारीख में गुजरात कॉपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड (Gujarat Cooperative Milk Marketing Federation Limited) देश का सबसे बड़ा फूड प्रोडक्ट मार्केटिंग संगठन है.

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हाइलाइट्स

यह संगठन हर दिन 2.63 करोड़ लीट दूध खरीदता है. अब अमूल दूध के अलावा मिल्क पाउडर, दही, चीज़, पनीर और तमाम मिल्क प्रोडक्ट बना रहा है.
14 दिसंबर 1946 को इसे आधिकारिक रूप से पंजीकृत हो गई. इसका नाम कैरा जिला कॉपरेटिव दूध उत्पादक संगठन रखा गया.
डॉ. वर्गीज कुरियन ने ही कैरा जिला कॉपरेटिव का नाम बदलकर अमूल रख दिया.

नई दिल्‍ली. देश की सबसे बड़ी दुग्‍ध उत्‍पाद बनाने वाली कंपनी अमूल हाल ही में दूध के दामों में बढ़ोतरी के कारण चर्चा में है. अमूल दूध, दही, पनीर से लेकर आइसक्रीम और कई अन्य मिल्क प्रोडक्ट बनाने वाली अमूल कंपनी की आजादी से पहले हुई थी. इसकी स्‍थापना के लिए भी गुजरात के किसानों और पशुपालकों को अंग्रेजों से लौहा लेना पड़ा था. लौहपुरुष सरदार पटेल की सलाह पर किसानों ने दूध की हड़ताल कर अंग्रेजों को उन्‍हें कोऑपरेटिव सोसाइटी का लाइसेंस देने के लिए मजबूर कर दिया था.

अमूल की शुरूआत गुजरात के कैरा जिले में दुग्‍ध उत्‍पादक सोसायटी के रूप में हुई थी और तब इसका नाम कैरा जिला कॉपरेटिव दूध उत्पादक संगठन था. बाद में डॉ. वर्गीज कुरियन ने इसका नाम बदलकर अमूल रखा था. आज की तारीख में गुजरात कॉपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड देश का सबसे बड़ा फूड प्रोडक्ट मार्केटिंग संगठन है. साल 2021-22 में इसका कारोबार 6.2 बिलियन डॉलर का था. यह संगठन हर दिन 2.63 करोड़ लीट दूध खरीदता है. अब अमूल दूध के अलावा मिल्क पाउडर, दही, चीज़, पनीर और तमाम मिल्क प्रोडक्ट बना रहा है.

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दलालों से परेशान थे दुग्‍ध उत्‍पादक 
अमूल की नींंव आजादी से कुछ साल पहले पड़ी थी. हुआ यूं था कि  गुजरात के कैरा जिले के पशुपालक दूध के दलालों से परेशान थे. ये बिचौलिए कम दामों पर दूध खरीदते और अपना मोटा मुनाफा लेकर दूध बेच देते. दुग्‍ध उत्‍पादकों को दूध का बहुत कम दाम मिल रहा था. इससे उनके लिए अपना घर चलाना भी मुश्किल हो गया था. किसानों पहले ही परेशान थे और तब की बॉम्बे की सरकार ने बॉम्बे मिल्क स्कीम की कर दी. इस योजना के तहत गुजरात के आणंद से बॉम्बे तक दूध ले जाना था. बाम्बे तक दूध ले जाते वक्‍त दूध खराब न हो इसके लिए बॉम्बे की सरकार ने पॉलसन लिमिटेड से एक समझौता किया. इस समझौते में कहा गया कि पॉलसन लिमिटेड ही दूध की सप्लाई करेगा.

लेकिन, इस समझौते का एक पहलू यह था कि इसमें  किसानों की पूरी तरह अनदेखी की गई थी. इस समझौते में दूध खरीदने की कीमत के बारे में कुछ तय नहीं हुआ. लिहाजा पशुपालकों से औने-पौने दाम पर दूध खरीदा जाता था और उसे बॉम्बे भेजा जाता था. इस समस्‍या के समाधान के लिए किसान त्रिभुवन पटेल के नेतृत्‍व में सरदार पटेल से मिले. सरदार पटेल उन दिनों कॉपरेटिव यानी सहकारी समितियों को बढ़ावा दे रहे थे. सरदार पटेल ने किसानों को सुझाव दिया कि वे मिलकर एक सहकारी समिति बनाएं और खुद का पॉश्चराइजेशन प्लांट लगा लें. जिससे वे सीधे बॉम्बे स्कीम में दूध सप्लाई कर सकेंगे.

हड़ताल करने की दी सलाह
सरदार पटेल ने किसानों को सलाह दी कि पहले तो कॉपरेटिव बनाने के लिए सरकार से अनुमति मांगे. अगर अनुमति न मिले तो ठेकेदारों को दूध देना बंद कर दीजिए. सरदार पटेल ने किसानों को कहा कि सहकारी समिति बनाने की अनुमति लेने के लिए उन्‍हें संघर्ष करना होगा. इससे किसानों को नुकसान भी उठाना पड़ेगा.

15 दिन की हड़ताल से झुके अंग्रेज
सरदार पटेल ने मोरारजी देसाई को कॉपरेटिव सोसाइटी बनाने को किसानों की मदद के लिए कैरा भेजा. 4 जनवरी 1946 को एक बैठक बुलाई गई. इसी बैठक में फैसला हुआ कि  कैरा जिले के हर गांव में एक-एक समिति बनाई जाएगी. ये समितियां एक यूनियन को ही दूध की सप्लाई करेंगी और सरकार को दूध खरीदने के लिए इसी यूनियन से कॉन्ट्रैक्ट करना होगा. हालांकि, सरकार ने कॉपरेटिव बनाने की मंजूरी नहीं दी. फिर क्‍या था, किसानों ने हड़ताल शुरू कर दी. यह हड़ताल 15 दिनों तक चली. इन 15 दिनों में कैरा के किसानों और पशुपालकों ने अपने यहां का दूध बाहर नहीं भेजा. इसका नतीजा यह हुआ कि बॉम्बे तक दूध की सप्लाई ठप हो गई और बॉम्बे मिल्क स्कीम खतरे में आ गई.

आखिर में अंग्रेजों को झुकना पड़ा. किसानों को कोऑपरेटिव सोसायटी बनाने की अनुमति मिल गई. मांग स्वीकार होने के बाद कैरा जिला कॉपरेटिव दूध उत्पादक संगठन की नींव पड़ी और 14 दिसंबर 1946 को इसे आधिकारिक रूप से पंजीकृत हो गई. 1948 में इसी संगठन ने बॉम्बे स्कीम के लिए दूध की सप्लाई शुरू कर दी. तब दो गांवों के कुछ किसान हर दिन लगभग 250 लीटर दूध इकट्ठा कर रहे थे. जल्द ही इस संगठन से 400 से ज्यादा किसान जुड़ गए.

डॉ. वर्गीज कुरियन ने बदल दी तस्‍वीर
मिशिगन यूनिवर्सिटी  से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में मास्‍टर डिग्री हासिल करने के बाद डॉ. वर्गीज कुरियन दूध  किसानों की मदद के लिए कैरा आए. इसके बाद तो डॉ. कुरियन ने अपनी पूरी जिंदगी इसी के समर्पित कर दी. डॉ. वर्गीज कुरियन ने ही कैरा जिला कॉपरेटिव का नाम बदलकर अमूल रख दिया. धीरे-धीरे अमूल के पास ज्‍यादा दूध इक्‍ट्ठा होने लगा तो डॉ. कुरियन ने दूध को खराब होने से बचाने के तरीके खोजने शुरू कर दिए. 1955 में डॉ. कुरियन के एक दोस्त एच एम दलाया ने भैंस के दूध से मिल्क पाउडर और कंडेक्ट मिल्क बनाने की शुरुआत की. पहले यह पाउडर सिर्फ़ गाय के दूध से ही बनता था. आगे चलकर डॉ जीएच विलस्टर ने अमूल में भैंस की दूध से चीज (Cheese) बनाने की शुरुआत की, जिसने अमूल के मार्केट को और विस्तार दिया. 1973 में गुजरात कोऑपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन (GCMMF) की स्थापना हुई. ये आगे चलकर दूध कॉपरेटिव का सर्वोच्च संगठन बना और इसे ही अमूल के नाम से ही जाना जाता है.

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आणंद में लगा पहला मिल्‍क पाउडर प्‍लांट
आणंद में ही अमूल ने अपना पहला मिल्क पाउडर प्लांट लगाया. देखते ही देखते गुजरात दुग्ध उत्‍पादन का गढ़ बनने लगा. साल 1956 में ही अमूल हर दिन 1 लाख लीटर दूध की प्रोसेसिंग करने लगा. अमूल 80 डेयरी प्लांट को ऑपरेट करता है. देश के 28 राज्य और 222 जिलों में अमूल का नेटर्वक फैला है. अमूल के पास आज 10,000 डीलरों और 10 लाख खुदरा विक्रेताओं का एक डीलर नेटवर्क है.

Tags: Amul, Business news

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