देश के इन राज्यों में बेअसर हो जाएंगे मोदी सरकार के कृषि कानून? जानिए क्या है सच

केद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ बिल लाने वाला पहला राज्य है पंजाब.
केद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ बिल लाने वाला पहला राज्य है पंजाब.

संसद में पास कृषि सुधार कानूनों को क्या विधानसभाओं में खारिज किया जा सकता है? क्या कहते हैं कानून के जानकार और कृषि विशेषज्ञ.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 23, 2020, 7:35 AM IST
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नई दिल्ली. कृषि सुधार (Agri reforms) के नाम पर लाए गए मोदी सरकार (Modi Government) के तीन कानूनों के खिलाफ किसानों का गुस्सा अभी थमने का नाम नहीं ले रहा. इस बीच कांग्रेस शासित पंजाब की सरकार ने इन कानूनों के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव पास कर तीन नए बिल पेश किए. जिसमें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) न देने पर 3 साल की सजा और जुर्माने का प्रावधान भी है. ऐसे ही बिल कांग्रेस शासित राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सरकार भी लाने वाली हैं. वहां भी केंद्रीय कृषि कानून के खिलाफ प्रस्ताव आएगा. मकसद ये है कि मोदी सरकार के कृषि कानूनों को कम से कम कांग्रेस के शासन वाले राज्यों में बेअसर कर दिया जाए. ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि क्या कोई विधानसभा संसद द्वारा पास कानूनों को खारिज कर सकती है और क्या उसके खारिज कर देने से केंद्र का कानून वाकई निष्प्रभावी हो जाएगा?

इसका सच जानने की उत्सुकता खेती-किसानी से जुड़े हर किसी के मन में है. इसे लेकर राजनीति भी शुरू हो गई है. आप आदमी पार्टी के प्रमुख और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने पंजाब विधानसभा में पारित कृषि कानूनों को फर्जी बताते हुए इसकी वैधता पर सवाल उठाया है. हालांकि, पंजाब (Punjab) के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने तर्क दिया है कि कृषि (Agriculture) राज्य का विषय है, लेकिन केंद्र ने इसे नजरअंदाज कर दिया. केंद्र सरकार ने संविधान का उल्लंघन किया हैं. पंजाब ने देश को खाद्यान्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाया है. अब उन्हीं किसानों को बर्बाद किया जा रहा है. क्या यह इंसाफ है?

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पंजाब और हरियाणा में कृषि कानूनों के खिलाफ सबसे ज्यादा प्रदर्शन हुए हैं. (File Photo-AFP/News18.com)




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इसी तरह के तर्क राजस्थान और छत्तीसगढ़ की सरकारों की ओर से भी आने वाले हैं. ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि कांग्रेस नेतृत्व ने अपनी पार्टी के शासन वाले राज्यों से अपील की है कि वे संविधान के अनुच्छेद 254 (2) के तहत स्थानीय स्तर पर कानून बनाएं, जिससे केंद्र के कृषि कानून को बेअसर किया जा सके.

कांग्रेस (Congress) नेता जयराम रमेश ने ट्विट किया है कि, "अरुण जेटली ने राज्यों से संविधान के अनुच्छेद 254 (2) का इस्तेमाल करके भूमि अधिग्रहण कानून, 2013 के प्रावधानों को निष्प्रभावी बनाने के लिए कहा था. राज्यसभा में विपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने इसका पूर्ण समर्थन भी किया था. अब राज्य उसी सलाह का पालन करके कृषि अधिनियमों (जो अब कानून बन गए हैं) से हुए नुकसान की भरपाई कर सकते हैं."



आईए समझते हैं कि आखिर संविधान का अनुच्छेद 254 (2) क्या है और यह राज्य सरकारों को किन शर्तों पर यह अधिकार देता है. क्या इस अनुच्छेद के जरिए राज्य सरकारें कृषि कानून को निष्प्रभावी करवा पाने की स्थिति में हैं?

हमारे संविधान में स्पष्ट किया गया है कि केंद्र और राज्यों को किन-किन विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है. इसकी तीन सूचियां हैं. संघ सूची में वे विषय हैं जिन पर सिर्फ केंद्र सरकार को ही अधिकार है, राज्य सूची में वे विषय आते हैं जिन पर राज्य सरकारें कानून बना सकती हैं और समवर्ती सूची में वे विषय आते हैं जिन पर राज्य और केंद्र दोनों सरकारें कानून बना सकती हैं.

राज्य की सहूलियत वाला प्रावधान

अगर समवर्ती सूची के किसी विषय पर संसद कोई कानून बनाए और उसी विषय पर पार्लियामेंट के कानून के बाद राज्य सरकार भी अपना अलग से एक बिल तैयार करे, और उस पर राष्ट्रपति की मंजूरी लेने में भी कामयाब हो जाए, तो उस राज्य में उस पर्टिकुलर विषय का वही कानून लागू होगा, जो राज्य सरकार ने बनाया है, न कि संसद वाला कानून.

कानूनी किंतु-परंतु और मौजूदा हालात

इस अनुच्छेद के साथ बड़ी शर्त यही है कि राज्य सरकारों को इन अधिनियमों के लिए राष्ट्रपति की स्वीकृति चाहिए होती है. अगर राष्ट्रपति अपनी स्वीकृति दे देते हैं तो भी केंद्रीय कानून सिर्फ उसी राज्य में प्रभावी नहीं होगा. ऐसे में प्रत्येक राज्य को अपना कानून बनाकर राष्ट्रपति की स्वीकृति लेनी होगी. लेकिन मौजूदा हालात में अगर कोई राज्य सरकार कृषि कानूनों के खिलाफ अपना कोई बिल बनाती भी है तो उन्हें राष्ट्रपति से मंजूरी मिलना इतना आसान नहीं होगा.

केंद्र के विरोध का नया मॉडल

दिल्ली यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार कहते हैं कि एग्रीकल्चर स्टेट सब्जेक्ट है. जब केंद्र सरकार ने यह कानून बनाया तो इसके स्टेकहोल्डर्स से कोई चर्चा नहीं की गई. ऐसे में कांग्रेस शासित सरकारें अपने डेमोक्रेटिक अधिकार के तहत विधानसभा से केंद्रीय कानूनों के खिलाफ प्रस्ताव पास करवा रही हैं.

ऐसा इस साल की शुरुआत में भी देखने को मिला था. केरल, पंजाब, राजस्थान, दिल्ली और पुदुचेरी विधानसभा में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और एनआरसी (National Register of Citizens) के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया गया था. यहां तक कि एनडीए के शासन वाले बिहार में भी मोदी सरकार के कानून के खिलाफ प्रस्ताव पास किया गया था. लेकिन क्या राज्य कुछ कर पाए?

प्रो. कुमार कहते हैं कि विधानसभा में केंद्र के कानून के खिलाफ प्रस्ताव पास करना राज्यों का डेमोक्रेटिक अधिकार है. यह एक तरह का नया प्रोटेस्ट मॉडल है. ऐसा करने से केंद्र पर दबाव पड़ेगा.

लेकिन प्रेक्टिकल बात यह है कि राज्यों की इस कसरत से केंद्र के कानून को कोई फर्क नहीं पड़ता. वो निष्प्रभावी नहीं होगा. कायदे से सर्वोच्च सदन के फैसले को कोई खारिज नहीं कर सकता. उसे सिर्फ अदालत में चैलेंज किया जा सकता है. वहीं से इसमें कोई रास्ता निकल सकता है.

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‘असहमति को स्वीकार करता केंद्र तो नहीं आती ये नौबत’

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के वकील पद्मश्री ब्रह्मदत्त कहते हैं कि केंद्र के कानून के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव पास होना अच्छा संकेत नहीं है. संघीय व्यवस्था में केंद्र और राज्यों का ऐसा टकराव ठीक नहीं है. यह कायदे से नहीं होना चाहिए. लेकिन राज्य ऐसा करने पर इसलिए मजबूर हो रहे हैं क्योंकि कृषि कानूनों पर मोदी सरकार ने न तो किसानों की असहमति पर विचार किया और न ही विपक्षी पार्टियों की राय पर. जब असहमति को खारिज कर दिया जाता है तब ऐसी नौबत आती है. कृषि कानूनों का मसला कोर्ट में भी आया है. मुझे लगता है कि इसके खिलाफ डाली गईं याचिकाओं का फैसला अंत में संविधान पीठ ही करेगी.

‘ऐसे तो सब-नेशनलिज्म का दौर आ जाएगा’

राष्ट्रीय किसान महासंघ के संस्थापक सदस्य बिनोद आंनद कहते हैं कि संसद से पास किसी कानून के खिलाफ विधानसभा में प्रस्ताव पास करने की प्रवृत्ति ठीक नहीं है. ऐसे तो सब-नेशनलिज्म का दौर आ जाएगा, जो देश के लिए ठीक नहीं है. न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum support price) किसानों का कानूनी अधिकार होना चाहिए. एमएसपी पर फसल न खरीदने वाले को जेल होनी चाहिए. इसे लेकर सभी किसान संगठन एक हैं. लेकिन इसके लिए केंद्र पर ही दबाव बनाया जाना चाहिए. क्योंकि एमएसपी तय करना केंद्र का अधिकार है.

यदि राज्य सरकारें एमएसपी पर कोई कानून बना रही हैं तो इस पर खरीद (Procurement) भी उन्हें ही करनी चाहिए. खरीद के लिए वो केंद्र सरकार पर ही निर्भर हैं. बाबूजी के पैसे पर बेटा राज करेगा और गाली भी देगा ऐसा तो नहीं चलेगा. पंजाब सरकार यदि किसानों की इतनी ही हितैषी है तो 8 फीसदी का मंडी टैक्स खत्म कर दे. फिर तो मंडियों के खत्म होने का खतरा नहीं होगा.

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क्यों हो रहा है विरोध?

मोदी सरकार के नए कृषि कानून, कृषि उपज की खरीद और बिक्री को नियंत्रित करने वाले हैं. किसानों को डर सता रहा है कि ये कानून मौजूदा खरीद व्यवस्था और मंडी का निजीकरण कर देंगे. फसल की कीमतों को घटा देंगे और भविष्य में सरकार एमएसपी से हाथ खींचकर किसानों को पूरी तरह से व्यापारियों और पूंजीपतियों के हवाले कर देगी.

इस तरह किसानों को रिझा रहे कांग्रेस, शिअद

पंजाब और हरियाणा में ही इन कानूनों का सबसे ज्यादा विरोध हो रहा है. क्योंकि इन्हीं दोनों राज्यों में एमएसपी पर सबसे ज्यादा खरीद होती है. इन दोनों में किसान सबसे बड़ा सियासी मुद्दा हैं. किसान यहां पार्टियों के जनाधार और उनकी सत्ता को भी हिला देते हैं. ऐसे में कांग्रेस ने कृषि कानूनों के खिलाफ प्रस्ताव पास करके किसानों का दिल जीतने की कोशिश की है और शिरोमणि अकाली दल ने कैबिनेट से हरसिमरत कौर का इस्तीफा दिलवाकर.

हरियाणा: डिप्टी सीएम की पार्टी में असंतोष

हरियाणा में बीजेपी की सरकार है इसलिए वो इसका विरोध कर नहीं सकती. लेकिन उसकी सहयोगी पार्टी जेजेपी में इसे लेकर कलह जारी है. दुष्यंत चौटाला की पार्टी में बरवाला क्षेत्र के विधायक जोगीराम सिहाग ने राज्य मंत्री के दर्जा वाले हरियाणा आवास बोर्ड के चेयरमैन का मिला हुआ पद ठुकरा दिया है. सिहाग ने इसकी वजह तीन कृषि कानूनों को बताया है.

पंजाब विधानसभा में कौन से बिल पास हुए?

केंद्र के कृषि कानूनों के खिलाफ कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार ने तीन विधेयक पास किए हैं. उनमें, किसान उत्पादन व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) विशेष प्रावधान एवं पंजाब संशोधन विधेयक 2020, आवश्यक वस्तु (विशेष प्रावधान और पंजाब संशोधन) विधेयक 2020  और किसान (सशक्तीकरण और संरक्षण) समझौता मूल्य आश्वासन एवं कृषि सेवा (विशेष प्रावधान और पंजाब संशोधन) विधेयक 2020 शामिल हैं.
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