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आखिर निजी क्षेत्र के लिए MSP जरूरी करने से सरकार को क्या नुकसान है?

आखिर निजी क्षेत्र के लिए MSP जरूरी करने से सरकार को क्या नुकसान है?

देश के किसान की औसत आय 77,124 रुपये है.. (सांकेतिक तस्वीर)

देश के किसान की औसत आय 77,124 रुपये है.. (सांकेतिक तस्वीर)

इस वर्ष 24 नवंबर तक देश भर में 304 लाख मीट्रिक टन से अधिक धान की खरीद है. जिसमें से अकेले पंजाब ने 202.38 एलएमटी का योगदान दिया है, जो कुल खरीद का 66.57 फीसदी है. बिहार में तो सरकार ने अब तक धान की सरकारी खरीद ही नहीं की है.

नई दिल्ली. एक बार फिर हरियाणा और पंजाब के अन्नदाता बड़े किसान आंदोलन के गवाह बन रहे हैं. किसानों को दिल्ली जाने से रोका जा रहा है. यूपी हरियाणा दोनों में बीजेपी की सरकार है और दोनों की कोशिश है कि किसी भी तरह से किसान दिल्ली में अपना शक्ति प्रदर्शन न कर पाएं, क्योंकि मामला मोदी सरकार के नए किसान कानूनों के विरोध में जुड़ा हुआ है. उसमें भी न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) को किसानों का कानूनी अधिकार बनाने की मांग प्रमुख है. बड़ा सवाल यह उठ रहा है आखिर किसानों को लेकर के सबसे तीखी प्रतिक्रिया हरियाणा और पंजाब की ओर से क्यों होती है? इसका जवाब यह है वहां के किसानों को सरकारी मंडी व्यवस्था खत्म होने का डर सता रहा है. इसके पीछे किसानों के अपने तर्क हैं.

सबसे अच्छी सरकारी मंडी व्यवस्था पंजाब और हरियाणा में ही है. इसीलिए यहां पर सबसे ज्यादा सरकारी खरीद होती है और यहां का किसान अन्य राज्यों के मुकाबले समृद्ध है. राष्ट्रीय किसान महासंघ के संस्थापक सदस्य विनोद आनंद का कहना है कि मंडियां बचेंगी तभी तो किसान उसमें एमएसपी पर अपनी उपज बेच पाएगा. मंडियों को खत्म करने की बात सरकार ने कहीं पर भी नहीं की है, लेकिन इसका इंतजाम पूरा कर दिया है.

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नए कृषि कानूनों का विरोध कर रहा बुजुर्ग किसान (फोटो: AP)


कृषि अर्थशास्त्री देविंदर शर्मा के मुताबिक नए कृषि कानून की वजह से देश में-‘वन कंट्री टू मार्केट' की व्यवस्था हो गई है. मंडियों के अंदर टैक्स का भुगतान होगा और मंडियों के बाहर कोई टैक्स नहीं लगेगा.’ शर्मा ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि मंडी से बाहर जिस एग्रीकल्चर ट्रेड की सरकार ने व्यवस्था कायम की है उसमें कारोबारी को कोई टैक्स नहीं देना होगा. जबकि मंडी के अंदर औसतन 6-7 फीसदी तक का मंडी टैक्स लगता है.

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ऐसे में यह तर्क दिया जा रहा है कि व्यापारी अपना 6-7 फीसदी का नुकसान न करके बाहर खरीद करेगा. जहां उसे कोई टैक्स नहीं देना है. तो इस फैसले से मंडी व्यवस्था हतोत्साहित होगी. मंडी समिति कमजोर होंगी तो किसान धीरे-धीर बिल्कुल बाजार के हवाले चला जाएगा. जहां उसकी उपज का सरकार द्वारा तय रेट से अधिक भी मिल सकता है और कम भी. कम दाम मिलने की संभावना ज्यादा है क्योंकि निजी क्षेत्र पहले अपना मुनाफा देखेगा.

पूर्व सांसद एवं वयोवृद्ध किसान नेता भूपिंदर सिंह मान का कहना है कि मंडी वाले व्यापारी ही धीरे-धीरे बाहर व्यापार करेंगे. मुझे लगता है कि मंडी सिस्टम भविष्य में कोलैप्स कर जाएगा. क्योंकि बाहर टैक्स नहीं है. फिर यही व्यापारी बाहर अपना एकाधिकार स्थापित कर सकते हैं. पूरे रिफार्म को देखकर यही लगता है कि हाथी के खाने के दांत कुछ और हैं और दिखाने के कुछ और.

बिहार में धान की सरकारी खरीद नहीं
इस वर्ष 24 नवंबर तक देश भर में 304 लाख मीट्रिक टन (LMT) से अधिक धान की खरीद की जा चुकी है. जिसमें से अकेले पंजाब ने 202.38 एलएमटी का योगदान दिया है, जो कुल खरीद का 66.57 फीसदी है. धान खरीद में दूसरे नंबर पर हरियाणा है, जहां 55.60 एलएमटी की सरकारी खरीद की गई है. जबकि उन दोनों प्रदेशों से काफी बड़े यूपी में 16.10 एलएमटी ही खरीद की गई है. जिसकी वजह से किसान औेने पौने दाम पर धान बेचने के लिए मजबूर हैं. बिहार में तो सरकार ने अब तक धान की सरकारी खरीद ही नहीं की है.

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आंदोलनकारी किसानों का कहना है कि अगर उनकी आशंका के मुताबिक सरकारी मंडियां चौपट हुईं तो पंजाब और हरियाणा के किसान भी यूपी व बिहार की तरह बर्बाद हो जाएंगे. इसलिए इन दो प्रदेशों के किसान नए कृषि कानूनों के खिलाफ सबसे ज्यादा मुखर हैं.

किसान शक्ति संघ के अध्यक्ष पुष्पेंद्र सिंह ने कहा कि देश में प्रति वर्ष लगभग 30 करोड़ टन खाद्यान्न का उत्पादन होता है. इसमें लगभग 15 करोड़ टन किसान परिवार स्वयं अपने उपभोग में इस्तेमाल करता है. बाकी 15 करोड़ टन में से 9 करोड़ टन से कुछ अधिक सरकार एपीएमसी मंडियों के जरिए खरीद करती है. कुल अनाज की खरीद में सरकारी खरीद का हिस्सा सबसे ज्यादा होता है, यही कारण है कि किसान चाहते हैं कि न्यूनतम समर्थन मूल्य और एपीएमसी मंडियों वाली व्यवस्था बरकरार रहे. सरकार को इसके लिए किसान बिल में लिखित व्यवस्था कर देनी चाहिए.

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लगभग 6 करोड़ टन अनाज किसानों को खुले बाजार में बेचना पड़ता है. वर्तमान में किसानों की मांग है कि अगर वह खुले बाजार में भी फसलों की खरीद व्यवस्था लागू करना चाहती है तो उसे यहां भी न्यूनतम समर्थन मूल्य लागू करना चाहिए. अनुमान है कि इस बाकी फसल की खरीद में प्राइवेट खरीदारों को अधिकतम 30 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त निवेश करना पड़ेगा, जो बहुत बड़ी राशि नहीं होगी. इससे सरकार के खजाने पर कोई असर नहीं पड़ रहा.

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