दिल्ली के सदर बाजार में आ चुकी है ग्रीन पटाखों की 200 से ज्यादा वैरायटी, यह हैं रेट

सदर बाजार में ग्रीन पटाखे खरीदने वालों की भीड़ दुकानों पर लगी रहती है.
सदर बाजार में ग्रीन पटाखे खरीदने वालों की भीड़ दुकानों पर लगी रहती है.

ग्रीन पटाखों की खोज भारतीय संस्था राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) ने की है. दुनियाभर में इन्हें प्रदूषण से निपटने के एक बेहतर तरीके की तरह देखा जा रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 1, 2020, 6:15 AM IST
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नई दिल्ली. दीवाली के लिए दिल्ली के बाज़ार तैयार नज़र आ रहे हैं. खासतौर से पटाखा बाज़ार. दिल्ली के सदर बाज़ार में ग्रीन पटाखों की भरमार नज़र आ रही है. पिछले साल दीपावली में इन पटाखों की सिर्फ तीन से चार ही वैराइटी थीं. लेकिन इस बार बाज़ार में दुकानदार ग्रीन पटाखों की 200 से ज़्यादा वैरायटी होने का दावा कर रहे हैं. दुकानों पर लोगों की भीड़ भी है. दीवाली के मौके पर पटाखा बाज़ार में यह नज़ारा तक़रीबन दो साल बाद दिखाई दे रहा है. बीते साल पटाखों के इतने लाइसेंस न होने के चलते दुकानें नहीं सजी थीं. ग्रीन पटाखों के डिब्बों के बाहर ग्रीन पटाखों का लोगो लगा है. दुकानदार मुकेश पटाखे वालों का कहना है कि ग्रीन पटाखों के दाम आम पटाखों के मुकाबले तक़रीबन 20 से 30 फीसदी ज़्यादा हैं. बावजूद इसके ग्रीन पटाखे खरीदने वालों की भीड़ दुकानों पर लगी हुई है.

नीरी के अनुसार ऐसे होते हैं ग्रीन पटाखे
आपको बता दें कि ग्रीन पटाखों की खोज भारतीय संस्था राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) ने की है. दुनियाभर में इन्हें प्रदूषण से निपटने के एक बेहतर तरीके की तरह देखा जा रहा है. नीरी ने ऐसे पटाखों की खोज की है जो पारंपरिक पटाखों जैसे ही होते हैं पर इनके जलने से कम प्रदूषण होता है. इससे आपकी दीवाली का मज़ा भी कम नहीं होता क्योंकि ग्रीन पटाखे दिखने, जलाने और आवाज़ में सामान्य पटाखों की तरह ही होते हैं. हालांकि ये जलने पर 50 फीसदी तक कम प्रदूषण करते हैं.

इसलिए तीन तरह के बनाए जाते हैं ग्रीन पटाखे
ग्रीन पटाखे मुख्य तौर पर तीन तरह के होते हैं. एक जलने के साथ पानी पैदा करते हैं जिससे सल्फ़र और नाइट्रोजन जैसी हानिकारक गैसें इन्हीं में घुल जाती हैं. इन्हें सेफ़ वाटर रिलीज़र भी कहा जाता है. दूसरी तरह के स्टार क्रैकर के नाम से जाने जाते हैं और ये सामान्य से कम सल्फ़र और नाइट्रोजन पैदा करते हैं. इनमें एल्युमिनियम का इस्तेमाल कम से कम किया जाता है. तीसरी तरह के अरोमा क्रैकर्स हैं जो कम प्रदूषण के साथ-साथ खुशबू भी पैदा करते हैं.
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