12 हजार रुपये लगाकर इन लोगों ने मारुति से कमाएं 10 लाख, जानें Maruti की कहानी...

आपको यह जानकार हैरानी होगी कि अगर किसी निवेशक ने सन 2003 में मारुति के शेयर में 12 हजार रुपये का निवेश किया होता तो उसका निवेश करीब 6 लाख रुपये हो जाता. आपको बता दें कि मारुति को शेयर बाजार में लिस्ट हुए 16 साल पूरे हो चुके हैं.

News18Hindi
Updated: July 9, 2019, 7:03 PM IST
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मारुति 52 फीसदी मार्केट शेयर के साथ देश की सबसे बड़ी कार निर्माता कंपनी है. वहीं, देश में बिकने वाली हर दूसरी गाड़ी मारुति की ही है. लेकिन आपको यह जानकार हैरानी होगी कि अगर किसी निवेशक ने सन 2003 में मारुति के शेयर में 12 हजार रुपये का निवेश किया होता तो उसका निवेश करीब 6 लाख रुपये हो जाता. आपको बता दें कि मारुति को शेयर बाजार में लिस्ट हुए 16 साल पूरे हो चुके हैं. साल 2003 दिन में आज ही के दिन मारुति की लिस्टिंग स्टॉक एक्सचेंज बीएसई और एनएसई पर हुई थी. उस समय सरकार ने अपना 25 फीसदी हिस्सा बेचा था. आईपीओ का भाव 125 रुपये था और एक्सचेंज पर 157 रुपये प्रति शेयर के भाव पर लिस्टिंग हुआ.

आपको बता दें कि मारुति सुजुकी प्राइवेट लिमिटेड है. सरकार कंपनी में अपनी हिस्सेदारी लगातार कम करती गई. साल 2007 में सरकार अपनी सभी हिस्सेदारी फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशंस को बेचकर इस कंपनी से पूरी तरह निकल गई. शुरुआत में मारुति सुजुकी में सरकार की हिस्सेदारी 74 फीसदी और सुजुकी की हिस्सेदारी 26 फीसदी थी.

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कैसे हुआ निवेशकों को लाखों का मुनाफा- 9 जुलाई 2003 को शेयर बाजार में मारुति के शेयर की एंट्री हुई. आईपीओ 125 रुपये के भाव पर आया. वहीं, इसकी लिस्टिंग 157 रुपये पर हुई और शेयर ने दो साल पहले दिसंबर 2017 में 10 हजार रुपये का अपना ऑल टाइम हाई छुआ. हालांकि, देश की अन्य कंपनियों की तरह ऑटो बिक्री में आई गिरावट के बाद शेयर फिसलकर सोमवार को 6033 रुपये के स्तर पर आ गया. आपको बता दें कि कंपनी ने 9 साल से हर साल डिविडेंड दिया है. साल 2003 के 12500 रुपये 6 लाख रुपये हो गए हैं. इसमें डिविडेंड शामिल नहीं है.



आइए जानें कैसे शुरू हुई मारुति...
मारुति की शुरुआत 16 नवंबर 1970 को हुई. इसका पहले नाम मारुति टेक्निकल सर्विसेज प्राइवेट लिमिटेड (एमटीएसपीएल) था. इस कंपनी की शुरुआत देसी कार बनाने के लिए डिजाइन, मैन्युफैक्चरिंग और असेंबलिंग से संबंधित टेक्निकल सर्विस उपलब्ध कराना था.
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जून, 1971 में कंपनी एक्ट के अंतर्गत एक कंपनी ‘मारुति लिमिटेड’ का गठन किया गया और संजय गांधी इसके पहले मैनेजिंग डायरेक्टर बन गए. सोनिया गांधी और एमटीएसपीएल के बीच 1973 में हुए एक फॉर्मल एग्रीमेंट के तहत उन्हें संजय गांधी के साथ मारुति लिमिटेड का एमडी बना दिया गया.

सोनिया गांधी को मारुति देती थी सैलरी- एग्रीमेंट के तहत सोनिया गांधी और संजय गांधी की सैलरी पांच साल तक के लिए 2 हजार रुपए प्रति महीने तय हुई थी. वहीं, कमीशन और अन्य लाभ अलग से दिया जा था.

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सन 1975 में एमटीएसपीएल और मारुति लिमिटेड की सहायक कंपनी मारुति हैवी प्रा. लि. के साथ एक और एग्रीमेंट हुआ, जिसके तहत एमटीएसपीएल को रोड रोलर बनाने के लिए टेक्नोलॉजी से जुड़ी सर्विसेज देनी थीं.



सिर्फ 200 रुपये की पूंजी से हुई शुरू- सोनिया गांधी और संजय गांधी एमटीएसपीएल के पहले परमानेंट डायरेक्टर थे, जिनके पास 10 रुपए प्रति शेयर कीमत के महज 20 शेयर थे. दूसरे शब्दों में लॉन्च के समय कंपनी की पेड अप कैपिटल 200 रुपए थी. इस प्रकार सोनिया और संजय शुरुआत में कंपनी के बराबर के पार्टनर थे.

15 दिसंबर, 1971 को एमटीएसपीएल ने सोनिया और संजय गांधी को बड़ी संख्या में शेयर अलॉट किए. 2 जून, 1972 को एमटीएसपीएल का मारुति लिमिटेड के साथ एग्रीमेंट हुआ, जिसके तहत टेक्नोलॉजी जानकारी देने के बदले एमटीएसपीएल को लगभग 5 लाख रुपये का भुगतान किया गया. इसके तहत, सोनिया और संजय को कारों की नेट सेल्स की 2 फीसदी सालाना टेक्निकल फीस भी मिलनी थी.

पहला नमूना नहीं हुआ था पास- कंपनी की कार का नमूना नहीं हो सका पास. इस कार के बारे में माना जा रहा था कि यह पूरी तरह से देश में बनी कार होगी. हालांकि मारुति का प्रोटोटाइप (नमूना) 30 हजार किलोमीटर तक चलाने के लिए होने वाला वीआरडीई टेस्ट कभी पास ही नहीं करा पाया.

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इस कार में जर्मनी के टेक्नीशियन द्वारा जर्मन इंजन फिट किया गया था. इस टेक्नीशियन को कंसल्टेंट के तौर पर नियुक्त किया गया था. इस प्रोटोटाइप में वाइब्रेशन से लेकर ब्रेक फेल होने और स्टीयरिंग से जुड़ी समस्याएं सामने आई थीं.



सरकार ने बदला नियम-22 जुलाई 1974 को मारुति को 50 हजार कारों के प्रोडक्शन के लिए इंडस्ट्रियल लाइसेंस भी मिल गया. उस दौरान लगातार कंपनी को दिए जा रहे संरक्षण की जमकर आलोचना भी हुई. आरोपों पर तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी को भी सफाई देनी पड़ी.

1977 में इलेक्शन इंदिरा हार गईं जिससे हालात बिगड़ गए. स्थापना के बाद से कंपनी एक भी कार नहीं बना सकी थी. हालांकि, 1977 में देश में जनता पार्टी की सरकार बन गई और मारुति लिमिटेड बंद होने की कगार पर आ गई. इस बीच नई सरकार ने मारुति की जांच के लिए जस्टिस एपी गुप्ता की अगुआई में एक आयोग का गठन कर दिया. इस आयोग ने केंद्र सरकार को बेहद गंभीर रिपोर्ट सौंपी.

मारुति को मिला सुजुकी का साथ- मारुति का हुआ राष्ट्रीयकरण, संजय गांधी की मौत के एक साल बाद इंदिरा गांधी ने मारुति को उबारने के प्रयास शुरू किए. सरकार ने नई कंपनी के लिए एक सक्रिय पार्टनर की तलाश शुरू की.

सन 1981 में मारुति उद्योग लिमिटेड नाम देकर कंपनी का राष्ट्रीयकरण कर दिया गया. इसके साथ ही सोनिया गांधी का कंपनी से नाता टूट गया. इस बीच जापानी कंपनी सुजुकी ने भारत में कार के प्रोडक्शन के लिए सरकार से संपर्क किया.



मारुति और सुजुकी के बीच एग्रीमेंट आखिरकार 1982 में मारुति उद्योग लिमिटेड और जापान की सुजुकी के बीच लाइसेंस और ज्वाइंट वेंचर एग्रीमेंट (जेवीए) पर दस्तखत हुए.

इस प्रकार मारुति सुजुकी अस्तित्व में आई, जो शुरुआत में कारों की इंपोर्टर थी. उस समय कंपनी में सरकार की हिस्सेदारी 74 फीसदी थी.

उस दौरान भारत 'क्‍लोज इकोनॉमी' वाला देश था. सुजुकी को पहले दो साल के लिए 40,000 कारों के इंपोर्ट का अधिकार दिया गया था, हालांकि शुरुआत में 33 फीसदी स्वदेशी उपकरणों की खरीद का लक्ष्य था. इससे स्थानीय मैन्युफैक्चरर्स को खासी निराशा हुई.

1983 में बनी मारुति 800- तमाम प्रयासों के बाद आखिरकार 1983 में मारुति की पहली कार मारुति 800 मार्केट में आई, जो 796 सीसी की हैचबैक कार थी और भारत की पहली किफायती कार थी. दिसंबर 1983 में इसका लोकल प्रोडक्शन चालू हुआ था.

उसके बाद मारुति वैन और जिप्सी मार्केट में आईं. 1986 में ओरिजिनल मारुति 800 ने 796 सीसी की कार की जगह ले ली. कंपनी ने 1986 में एक लाख कार बनाने की उपलब्धि हासिल कर ली. कंपनी ने 1987 में हंगरी को 500 कार भेजकर एक्सपोर्ट भी चालू कर दिया.

 

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First published: July 9, 2019, 7:00 PM IST
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