एमएसपी से काफी कम कीमत पर मक्का बेचने को मजबूर हैं किसान, क्या इस तरह दोगुनी होगी इनकम?

एमएसपी से काफी कम कीमत पर मक्का बेचने को मजबूर हैं किसान, क्या इस तरह दोगुनी होगी इनकम?
किसानों को नहीं मिल रहा मक्का पर मोदी सरकार द्वारा घोषित एमएसपी

मक्का पैदा करने की लागत प्रति क्विंटल 1213 रुपये आती है, दाम मिल रहा सिर्फ 1020 रुपये. बिहार, मध्य प्रदेश में किसानों को नहीं दिया जा रहा मोदी सरकार द्वारा तय किया गया 1850 रुपये क्विंटल का रेट, जारी है अन्नदाताओं का शोषण

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नई दिल्ली. देश के कई राज्यों में मोदी सरकार द्वारा तय किया गया मक्के का न्यूनतम रेट मिलना तो दूर उन्हें लागत से भी कम दाम मिल रहा है. भंडारण की सुविधा है नहीं इसलिए किसान मजबूरी में औने-पौन दाम पर अपनी फसल बेचने को मजबूर हैं. केंद्र ने 2020-21 के लिए मक्के (Maize) का न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) 1760 रुपये से बढ़ाकर 1850 रुपये घोषित किया है. लेकिन, क्या धरातल पर किसानों को इस घोषणा का कोई लाभ मिल पा रहा है? इसका जवाब आपको नहीं में मिलेगा. किसान हमेशा न्यूनतम रेट की मांग करता है तब उसका ये हाल है.

इस समय किसानों को 1020 से लेकर 1200 रुपये प्रति क्विंटल तक का दाम ही मिल पा रहा है. जबकि कृषि लागत और मूल्य आयोग (Commission for Agricultural Costs and Prices) ने इस साल मक्का पैदा करने की लागत 1,213 रुपये प्रति क्विंटल बताई है.

मैंने किसानों को मिलने वाले मक्के के जिस रेट की बात की है उसकी पुष्टि केंद्र सरकार की ई-मंडी (e-Nam-राष्ट्रीय कृषि बाजार) भी कर रही है. वही ई-मंडी जिसे सरकार कृषि क्षेत्र के बड़े सुधार के तौर पर पेश करती है. बिहार से लेकर मध्य प्रदेश तक के किसान भी एमएसपी न मिलने की तस्दीक कर रहे हैं. मध्य प्रदेश में तो इसे लेकर बाकायदा बड़ा किसान आंदोलन खड़ा हो चुका है.



इस समय हरियाणा से लेकर यूपी, बिहार और मध्य प्रदेश तक मक्का किसान परेशान हैं. उन्हें 1020 से लेकर 1200 रुपये प्रति क्विंटल तक का ही रेट मिल रहा है. सरकार कागजों में 1850 रुपये एमएसपी देने का दावा जरूर कर सकती है. यहां तक कि खुलेआम सरकारी ई-मंडी और पारंपरिक मंडियों में मंडी अधिकारियों के सामने भी यही रेट दिया जा रहा है. जहां पर पूरी खरीद व्यवस्था बाजार के हवाले है वहां तो किसानों का और शोषण हो रहा है.
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एमपी के सिवनी जिले की सरकारी मंडी में रेट (Photo-शिवम बघेल )


जब किसानों को पैसा मिलने लगा तो सरकार ने इंपोर्ट किया

दिसंबर 2019 में मक्का अलग-अलग राज्यों में 1800 से 2500 रुपये प्रति क्विंटल तक के रेट पर बिक रहा था. किसान को अच्छा दाम मिल रहा था. यह बात भला अपने देश के नौकरशाहों को कैसे पच जाती. किसानों को अच्छा दाम मिलते देख उन्होंने दूसरे देशों से मक्का इंपोर्ट कर लिया. इससे रेट एक दम गिरता चला गया. रही सही कसर कोरोना लॉकडाउन ने निकाल दी. यह बात अलग है कि केंद्र सरकार लगातार दावा कर रही है कि किसानों को उनकी उपज का अच्छा रेट दिलाने की कोशिश हो रही है. लेकिन सच ये है कि इसी कोशिश के बीच मक्का इंपोर्ट करके भारत के किसानों की जेब काट ली गई.

ई-नाम पर 21 जून को रेट

-उत्तर प्रदेश की कन्नौज मंडी में मक्के का मॉडल प्राइस 1150 रुपये.

-हरियाणा की शाहाबाद मंडी में मॉडल प्राइस 1161 रुपये.

-महाराष्ट्र की दौंड मंडी में 1361 रुपये के रेट पर मक्का खरीदा गया.

बिहार के हालात सबसे बदतर

बिहार प्रमुख मक्का उत्पादक राज्य है. यहां देश का करीब 9 फीसदी मक्का पैदा होता है. जबकि बिहार का 80 फीसदी मक्का उत्तरी बिहार के खगड़िया, अररिया, बेगूसराय, कटिहार, किशनगंज और सहरसा सहित 18 जिलों में होता है. यहां यह रबी और खरीफ दोनों की फसल है.

भागलपुर में इस्माइलपुर प्रखंड के किसान विजय मंडल ने हमें फोन पर बताया कि उन्होंने 1180 से 1200 रुपये प्रति क्विंटल तक के रेट पर मक्का बेचा है. व्यापारी अनलोडिंग और अपना 2 फीसदी गद्दी खर्च भी किसान के पैसे से ही काट लेता है. यहां तक कि जिस बोरे में किसान मक्का ले जाता है उसका पैसा भी नहीं मिलता.

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बिहार में मक्का किसानों से जारी है लूट, देखिए रेट


बिहार किसान मंच के प्रदेश अध्यक्ष धीरेंद्र सिंह बताते हैं कि सीएम नीतीश कुमार ने 2006 में ही बाजार उत्पादन समिति यानी सरकारी मंडियों को खत्म कर दिया था. यहां पर अनाज मंडियां भी नहीं हैं. पैक्स (प्राइमरी एग्रीकल्चर को-ऑपरेटिव सोसाइटीज) के जरिए गेहूं, धान की खरीद होती है, वो भी नाम मात्र की. लेकिन मक्का बिल्कुल नहीं खरीदा जाता. कुल मिलाकर यहां पर किसानों की उपज खरीद का मामला पूरी तरह से बाजार या व्यापारियों के हवाले है.

व्यापारी एमएसपी पर न खरीदकर मनमानी करते हैं. सरकारी तंत्र ने उन्हें बेलगाम कर दिया है. केंद्रीय खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री रामविलास पासवान बिहार से ही आते हैं लेकिन ताज्जुब यह है कि वहां एफसीआई का एक भी सरकारी खरीद केंद्र नहीं है. ऐसे तो किसानों की आय बढ़ने से रही. किसानों की मेहनत का फायदा व्यापारी उठा रहे हैं.

सवाल ये उठता है कि क्या ऐसे ही हालात की वजह से कृषि प्रदेश होते हुए भी बिहार में किसानों की औसत मासिक आय देश में सबसे कम सिर्फ 3558 रुपये प्रति परिवार है. यहां भावांतर जैसे कोई योजना भी नहीं है, जिससे कि एमएसपी और बाजार भाव के बीच के अंतर को पाटा जा सके.

बिहार का ऐसा है हाल, नहीं तैयार हो पाया फूड पार्क

मक्का किसानों को आगे बढ़ाने के लिए खगड़िया जिले में सरकार की मदद से प्रिस्टाइन मेगा फूड पार्क बनना था. इसमें मक्के से बनने वाली चीजों की 34 यूनिट लगाई जानी थी लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ. यह वही फूड पार्क है जिसका केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री हरसिमरत कौर बादल (Harsimrat Kaur Badal) ने 29 नवंबर 2018 को उद्घाटन करने से इनकार कर दिया था. केंद्रीय मंत्री कौर तय समय पर कार्यक्रम स्थल पर पहुंच गईं थीं. उद्घाटन करने से पहले उन्होंने फूड पार्क का निरीक्षण किया. निरीक्षण के दौरान देखा कि फूड पार्क का बड़ा हिस्सा अधूरा पड़ा था. इस पर वो आयोजकों पर भड़क उठीं थीं. उन्होंने केंद्र के अनुदान पर रोक भी लगा दी थी.

मध्य प्रदेश में चल रहा है आंदोलन

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर मध्य प्रदेश से आते हैं. किसानों को लेकर संजीदा व्यक्ति हैं. लेकिन, उनके अपने प्रदेश के हाल बहुत खराब हैं. किसान जागृति संगठन के नेता इरफान जाफरी बताते हैं कि सिवनी, छिंदवाड़ा और बैतूल आदि जिलों में बड़े पैमाने पर मक्के की खेती होती है. सरकारी मंडी में ही रजिस्टर्ड व्यापारी खुलेआम 1850 की जगह 900 से 1200 रुपये क्विंटल के रेट पर मक्का खरीद रहे हैं.

राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन में एमपी इकाई के अध्यक्ष राहुल राज कहते हैं कि जब सहकारी समिति खुद खरीद करती है तभी किसान को एमएसपी मिलता है. वरना सरकारी मंडी में मंडी सचिव के सामने ही व्यापारी एमएसपी से कम दाम पर बोली लगाते हैं और उनका कुछ बिगड़ता भी नहीं.

मक्के की खरीद एमएसपी रेट पर करने की मांग को लेकर सिवनी जिले में ऑनलाइन आंदोलन चल रहा है. इससे जुड़े किसान शिवम बघेल कहते हैं कि जब केंद्र सरकार ने रेट 1850 रुपये तय कर दिया है तो राज्य सरकार को उसी पर खरीद सुनिश्चित करनी चाहिए लेकिन वो ऐसा नहीं कर रही है. सिर्फ कागजों में घोषणा हो रही है, जमीन पर किसानों को सही दाम नहीं मिल रहा.

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कौन सुनेगा बिहार के मक्का किसानों का दर्द?


क्या कहती है केंद्र सरकार?

घोषणा के बाद भी एमएसपी न मिलना गंभीर मामला है. इसलिए हमने इस बारे में केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री कैलाश चौधरी से बातचीत की. चौधरी ने कहा कि हम लोगों ने रेट तय कर दिया है. उस पर खरीद की जिम्मेदारी एफसीआई (FCI- Food Corporation of India) की है.

इसके बाद हमने केंद्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग के सचिव सुधांशु पांडेय से बात की. पांडेय ने कहा-किसी राज्य में एमएसपी पर क्यों खरीद नहीं हो रही है इसके बारे में उस राज्य के कृषि मंत्री बताएंगे.

 
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