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Success Story: स्वयं सहायता समूह से मुखराई की महिलाएं लिख रही हैं कामयाबी की इबारत

Success Story: स्वयं सहायता समूह से मुखराई की महिलाएं लिख रही हैं कामयाबी की इबारत

मुखरादेवी स्वयं सहायता समूह (Mukhra Devi Self Help Group) बनाकर महिलाएं भगवान कृष्ण की पोशक तैयार करती हैं.

मुखरादेवी स्वयं सहायता समूह (Mukhra Devi Self Help Group) बनाकर महिलाएं भगवान कृष्ण की पोशक तैयार करती हैं.

कभी एक-एक पाई के लिए मोहताज रहने वाली मुखराई गांव ये महिलाएं अब अपने परिवार का खर्च खुद ही चलाती हैं. बच्चों की पढ़ाई के लिए फीस भरती हैं तो अपनी पसंद के कपड़े पहनती हैं.

मथुरा जिले के मुखराई गांव की सत्यवती, राजवती, वीरवती, ममता, रजनी और द्रोपदी समेत ऐसी कई महिलाएं हैं जो ना केवल कामयाबी के सोपान चढ़ रही है बल्कि नए आत्मविश्वास से लबरेज अपनी अलग पहचान की इबारत भी लिख रही हैं.

कुछ समय पहले तक ये ही महिलाएं खेतों में मजदूरी करती थीं. कभी फसल काटती थीं तो कभी दीवार बनाने के लिए सीमेंट मसाले का घोल तैयार करने में पति की मदद करती थीं. लेकिन अब ऐसा नहीं है.

स्वयं सहायता समूहों की बदौलत अब इनका जीवन पहले जैसा नहीं रहा. कभी एक-एक पाई के लिए मोहताज रहने वाली ये महिलाएं अब अपने परिवार का खर्च खुद ही चलाती हैं. बच्चों की पढ़ाई के लिए फीस भरती हैं तो अपनी पसंद के कपड़े पहनती हैं.

मुखरादेवी स्वयं सहायता समूह (Mukhra Devi Self Help Group) बनाकर ये महिलाएं घर-घर में पूजे जाने वाले लड्डु गोपाल और भगवान कृष्ण की पोशक तैयार करती हैं.

राजवती घर का काम-काज निपटाने के बाद सिलाई मशीन पर बैठ जाती हैं. राजवती ने बताया कि वह पिछले एक साल से ठाकुरजी की पोशाक बनाने का काम कर रही हैं. वह रोजना करीब 50 दर्जन पोशाक तैयार करती हैं.

Mukharai Village

राजवती बताती हैं कि अब वह 300-400 रुपये रोजाना घर बैठे कमा लेती हैं. वह बताती हैं सेल्फ हेल्प ग्रुप से जुड़ने से पहले वह हर काम के लिए अपने घरवालों का निर्भर रहती थीं, अब इसके लिए वे किसी की मोहताज नहीं हैं.

वीरवती पढ़ी-लिखी नहीं हैं. लेकिन अब वह रोजना 400 रुपये तक कमा लेती हैं. अब वह अपनी छोटी-मोटी इच्छाओं के लिए किसी पर निर्भर नहीं हैं.

Mukharai Village Mathura

वीरवती बताती हैं कि पहले किसी भी काम के लिए पैसे उधार लेने पड़ते थे. घर के लिए कमाओ, फिर उधार लिए पैसे चुकाने के लिए कमाओं और ब्याज के लिए कमाओ, पूरा दिन सिर्फ और सिर्फ मेहनत-मजदूरी में ही बीत जाता था. लेकिन अब ऐसा नहीं हैं. अब वीरवती अपने लिए कमाती है.

इसी ग्रुप में शामिल द्रोपदी बताती हैं कि एक साल पहले पैसे कमाने के लिए किसी की मजदूरी करनी पड़ती थी अब घर बैठे ही पैसे कमाते हैं.

द्रोपदी की सबसे बड़ी खुशी इस बात की है कि अब उसकी खुद की पहचान है और वह अब खुश रहती हैं.

Mukhra Devi Mandir

कुछ ऐसा ही अनुभव सत्यवती का है. सत्यवती बताती हैं कि पहले पति की मजदूरी के भरोसे ही परिवार चलता था. मजदूरी भी किसी दिन मिली तो किसी दिन बिना पैसे के ही गुजर करनी पड़ती थी. सत्यवती घर चलाने के लिए पति की मजदूरी के भरोसे नहीं है.

राजवती अपने अनुभव साझा करते हुए बताती हैं कि स्वयं सहायता समूह से जुड़कर उन्होंने सिलाई मशीनें खरीदकर पोशाक बनाने का काम शुरू किया. पहले दो सिलाई मशीन थीं अब चार मशीनें हो चुकी हैं. अब यह ग्रुप रोजाना 5,000 पोशाक तैयार करती हैं. अब हर महीने तकरीबन एक लाख रुपये की पोशाक तैयार करती हैं.

पोशाकों की बिक्री की टेंशन नहीं है क्योंकि मथुरा जिले में रोजाना लाखों की तादाद में श्रद्धालु आते हैं. गोवर्धन, मथुरा यहां तक कि दिल्ली में भी इन महिलाओं द्वारा तैयार पोशक की सप्लाई होती है.

इस स्वयं सहायता समूह की संचालिका रेखा देवी और इसी गांव में एलईडी बल्ब तैयार करने वाली युवा उद्यमी महिला सीमा देवी की कामयाबी की कहानी अगली बार.

मुखराई गांव (Mukharai village)
मथुरा जिले (Mathura) का मुखराई गांव का अपना अलग ही धार्मिक महत्व है. यह गांव मथुरा से 21 किलोमीटर और वृंदावन (Vrindavan) से 18 किलोमीटर दूर स्थित है. राधाकुण्ड (Radha kunda) और गोवर्धन (Goverdhan) के बीच बसा यह गांव राधाजी की ननिहाल के रूप में प्रसिद्ध है. राधाजी की नानी मुखरादेवी (Radharani’s maternal grandmother Mukhara Devi) के नाम से इस गांव का नाम मुखराई पड़ा.

यहां एक लोक कथा प्रचलित है कि जब बरसाने में कीर्ति देवी के घर में राधाजी का जन्म हुआ तो यह खबर सुनकर कीर्ति देवी की मां मुखरादेवी बहुत खुश हुईं. खुशी के मारे उन्होंने रथ के पहिये पर दीप जलाए और जलते दीपकों वाले पहिये को अपने सिर पर रखकर नृत्य करने लगीं.

Charkula dance

तभी से मुखराई गांव में चरकुला नृत्य (charkula dance) की नींव पड़ी. मुखराई गांव का चरकुला नृत्य भारत ही नहीं पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है. इस नृत्य में महिलाएं लकड़ी के करीब 40 किलो वजनी चक्र (पहिया) पर दीपक जलाकर उसे सिर पर रखकर नृत्य करती हैं. मुखराई गांव में हर साल होली (धुलहंडी) के एक दिन बाद चरकुला नृत्य (Charkula nritya) का आयोजन किया जाता है. गांव की महिलाएं 108 दीपकों से सजा 5 मंजिला चरकुला सिर पर रखकर नृत्य करती हैं. इसे देखने के लिए देश-विदेश के लोग यहां जुटते हैं.

मुखराई गांव के मंदिर में बाजनी शिला (bhajani shila) भी है. इस शिला की विशेषता यह है कि इसे किसी छोटे पत्थर से टकराने पर इसमें से अलग-अलग ध्वनि निकलती हैं.

Tags: Mathura news, Uttar pradesh news, Women Empowerment

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