अपनी कमाई खुद की मर्जी से खर्च करने की आजादी के मामले में नंबर-1 पर हैं मुस्लिम महिलाएं

मुस्लिम महिलाएं (प्रतीकात्मक तस्वीर/Reuters)
मुस्लिम महिलाएं (प्रतीकात्मक तस्वीर/Reuters)

महर्षि दयानंद विश्‍वविद्यालय (Maharshi Dayanand University) के एक सर्वे में खुलासा हुआ है कि मुस्लिम परिवार की 26.3 फीसदी मुस्लिम महिलाएं अपनी कमाई अपनी मर्जी से खर्च करती हैं.

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  • Last Updated: October 21, 2020, 5:44 PM IST
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नई दिल्ली. महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (Maharshi Dayanand University) रोहतक का एक चौंकाने वाला सर्वे सामने आया है. सर्वे मुस्लिम महिलाओं को लेकर है. वैसे तो सोशल मीडिया पर मुस्लिम महिलाओं को लेकर तरह-तरह की पुरानी प्रथाओं का ज़िक्र किया जाता है. महिलाओं का मजाक बनाया जाता है. लेकिन यह सर्वे बताता है कि घरों में मुस्लिम महिलाओं को आर्थिक आज़ादी है. हर छोटे-बड़े आर्थिक रूप से जुड़े काम में उनका मशविरा लिया जाता है. परिवार के आर्थिक फैसलों में 70.3 फीसदी मुस्लिम महिलाओं का दखल होता है.

26.3 फीसद मुस्लिम महिलाएं अपनी मर्जी से खर्च करती हैं अपनी कमाई
महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. रामफूल ओहल्याण का सर्वे बताता है कि देश में रहने वाली अल्पसंख्यक आबादी मुस्लिम परिवार की 26.3 फीसदी मुस्लिम महिलाएं अपनी कमाई अपनी मर्जी से खर्च करती हैं. इसमें परिवार का किसी भी तरह का कोई दखल नहीं होता है. वहीं अगर हिंदू परिवार की महिलाओं की बात करें तो ऐसा करने वाली महिलाओं की संख्या सिर्फ 20.1 फीसदी ही है.  अल्पसंख्यक वर्ग में ही ईसाई परिवार की 22.4 फीसदी, सिक्ख परिवार में 19 फीसदी और बौद्ध परिवार की 24.5 फीसदी महिलाओं को ही यह आज़ादी मिली हुई है.

55.8 फीसदी शौहर और बीवी मिलकर खर्च करते हैं
अगर देश के मुस्लिम परिवारों में 26.3 फीसदी मुस्लिम महिलाओं को अपनी कमाई खुद की मर्जी से खर्च करने की आज़ादी है तो देश में 55.8 फीसद ऐसे भी शौहर और बीवियां हैं जो दोनों एक राय होकर बाज़ार में पैसा खर्च करते हैं. हालांकि दूसरे वर्गों को देखते हुए यह नंबर थोड़ा सा पीछे है. लेकिन मुस्लिम परिवारों का ज़िक्र करते हुए इसे कम नहीं माना जा सकता है. ऐसे हिंदू परिवार जहां पति-पत्नी दोनों मिलकर खर्च करते हैं उनकी संख्या 61.6 फीसदी, ईसाई 63.8, सिक्ख 68.4 और बौद्ध परिवार में ऐसे जोड़ों की संख्या 64.1 फीसदी है.



इस बदलाव पर क्या बोले समाजशास्त्री
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एस. जैनुउद्दीन मुस्लिम महिलाओं में आ रहे इस बड़े बदलाव के बारे में बताते हैं, ''यह बदलाव कोई दो-चार दिन या महीनों में नहीं आया है. कई बरस पहले से इसकी शुरुआत हो चुकी है. फर्क इतना है कि ऐसे बदलाव पर फोकस नहीं किया जा रहा है. जैसे ही मुस्लिम लड़कियों के बीच तालीम को लेकर जागरुकता आई तो इस तरह के कई बदलाव अब देखने को मिल रहे हैं.''
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