News18 Special : भगोड़े माल्या और मोदी को भारत लाने में क्यों हो रही है देर, एक्सपर्ट से जानिए वजह

भगोड़े विजय माल्या और नीरव मोदी पर ब्रिटेन में चल रहा है प्रत्यर्पण का केस

भगोड़े विजय माल्या और नीरव मोदी पर ब्रिटेन में चल रहा है प्रत्यर्पण का केस

कभी प्रत्यर्पण संधि तो कभी मानवाधिकारों की आड़ विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे भगोड़े लेते रहते हैं. इसी वजह से बीते 30 साल में ब्रिटेन से सिर्फ दो आरोपियों को ही वापस लाया जा सका है.

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नई दिल्ली. चाहे शराब कारोबारी विजय माल्या (Vijay Mallya) हो या फिर हीरा व्यापारी नीरव मोदी (Nirav Modi). घाेटाले करके देश छोड़कर भागने वाले ऐसे भगोड़ों को वापस लाना बेहद मुश्किल काम है. न्यूज 18 ने इसकी पड़ताल की तो बीते 30 साल में ब्रिटेन (UK) से सिर्फ दो आरोपियों को ही वापस लाया जा सका है.

सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट सिद्धार्थ आर गुप्ता (Siddharth R Gupta) ने इन केसों का अध्ययन किया है. उन्होंने न्यूज 18 को बताया कभी प्रत्यर्पण संधि (Indo-UK extradition treaty) तो कभी मानवाधिकारों (Human Rights) की आड़ ऐसे आरोपी लेते रहते हैं. ब्रिटेन और यूरोपीय देशों के जटिल कानून भी इसमें बाधक हैं. हालांकि यदि आरोपी आतंकी या हत्या जैसे संगीन आरोपों से जुड़ा हो तो प्रत्यर्पण जल्द हो जाता है. लेकिन आर्थिक अपराधों वाले आरोपियों के लिए विदेशों के कानून प्रत्यर्पण में रोड़ा अटकाते हैं.

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ब्रिटेन से भारत में प्रत्यर्पण का इतिहास



वर्ष 2017 में लोकसभा में एक अतारांकित प्रश्न सं. 2842 के जवाब में केंद्र सरकार ने जानकारी दी थी कि भारत ने 1992 से 2016 के बीच यूके से कम से कम 23 प्रत्यर्पण अनुरोध किए है. इसमें से सिर्फ एक का ही प्रत्यर्पण हो सका है. यह व्यक्ति भी गुजरात दंगों का एक अभियुक्त समीरभाई विनुभाई पटेल था. उसके खिलाफ रेड कॉर्नर नोटिस जारी किए जाने के बाद प्रत्यर्पण हुआ था. फरवरी 2020 में मैग्नेट बुकी और हैंसी-गेट घोटाले के प्रमुख अभियुक्त संजीव चावला को भी प्रत्यर्पित किया गया.

Siddharth Gupta
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट सिद्धार्थ आर गुप्ता ने प्रत्यर्पण से संबंधित केसों का अध्ययन किया है.


विजय माल्या के मामले में इसलिए हो रही है देरी
किंगफिशर एयरलाइंस के मालिक रहे विजय माल्या का मामला काफी चर्चित रहा है. लेकिन उसे भी प्रत्यर्पित नहीं किया जा सका है. अभी यूके सरकार के पास माल्या का असाइलम यानी शरण लेने का अनुरोध अभी लंबित है. इसलिए वह जमानत पर बाहर है. जब तक ब्रिटेन सरकार शरण के मामले में फैसला नहीं लेती है, तब तक वह भारत नहीं लाया जा सकता है. हालांकि ब्रिटेन के सुप्रीम कोर्ट ने प्रत्यर्पण के पक्ष में फैसला सुनाया है और यूके के हाई कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए माल्या के भारत में प्रत्यर्पण का निर्देश दिया है.

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नीरव मोदी के प्रत्यर्पण की राह भी आसान नहीं
पंजाब नेशनल बैंक (PNB) घोटाले के आरोपी नीरव मोदी के प्रत्यर्पण पर यूके की वेस्टमिंस्टर मजिस्ट्रेट कोर्ट ने मंजूरी दे दी है. लेकिन कानूनी दांव-पेच इतने सारे हैं कि प्रत्यर्पण की राह आसान नहीं है. अभी विदेश मंत्री के पास मामला है. फिर हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में अपील का रास्ता रहेगा. इसके बाद भी असाइलम और यूरोपियन कोर्ट ऑफ ह्यूमन राइट्स (ईसीएचआर) का रास्ता रहेगा.

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ऐसी है प्रत्यर्पण संधि
सिद्धार्थ बताते हैं कि प्रत्यर्पण की व्यवस्था दोनों देशों अर्थात ब्रिटेन और भारत के बीच प्रत्यर्पण संधि द्वारा संचालित है. यदि भारत सरकार की ओर से किसी भी भगोड़े के संबंध में किए गए अनुरोध 1992 की संधि के प्रावधानों के तहत हैं तब ही प्रत्यर्पण प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाता है. इसके अनुच्छेद 1 के अनुसार प्रत्येक अनुबंधित देश को संधि के प्रावधानों के अधीन अभियुक्त का दूसरे देश में प्रत्यर्पण करना पड़ता है. लेकिन यह जरूरी है कि यदि व्यक्ति को अनुच्छेद 2 में उल्लिखित किसी प्रत्यर्पण अपराध का अभियुक्त या दोषी ठहराया गया हो. अनुच्छेद 2 आर / डब्ल्यू 7 में संधि के तहत उन अपराधों को प्रत्यर्पण अपराधों के रूप में परिभाषित किया गया है जो भारत और ब्रिटेन दोनों के कानूनों के तहत कम से कम एक साल की कारावास की सजा के लिए दंडनीय हैं. इनमें पूरी तरह वित्तीय अपराध, या हत्या जैसे गंभीर अपराध, विस्फोट, आतंकवाद आदि शामिल हैं. अनुच्छेद 5 (1) में कहा गया है कि कोई देश प्रत्यर्पण से इनकार कर सकता है यदि अपराध ‘राजनीतिक प्रकृति’ का हो. इसे अनुच्छेद 5 (2) में समझाया गया है.
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