नीरव मोदी प्रत्यर्पण: क्या है अब तक की कहानी और भारतीय बैंकों पर इसका क्या असर होगा?

भगौड़ा हीरा कारोबारी और पीएनबी फ्रॉड में मुख्य आरोपी नीरव मोदी.

भगौड़ा हीरा कारोबारी और पीएनबी फ्रॉड में मुख्य आरोपी नीरव मोदी.

Nirav Modi extradition: पीएनबी फ्रॉड मामले में UK कोर्ट ने नीरव मोदी को भारत प्रत्यर्पित करने का आदेश दिया है. नीरव मोदी के पास अगले उच्च कोर्ट में अपील करने का मौका है. लेकिन यह फ्रॉड के केवल नीरव मोदी तक ही सीमित नहीं है. इसने भारतीय बैंक सिस्टम में रिस्क मैनेजमेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर पर भी सवालिया निशान लगाया है.

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  • Last Updated: February 26, 2021, 9:18 AM IST
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नई दिल्ली. यूनाइटेड किंग्डम (UK) की अदालत ने भगौड़ा हीरा कारोबारी नीरव मोदी को भारत प्रत्यर्पिति करने की अनुमति दे दी है. पिछले दो साल से चल रहे इस केस में UK कोर्ट का यह फैसला भारत के लिए बड़ी सफलता मानी जा रही है. हालांकि, नीरव मोदी अभी भी इस ​आदेश के खिलाफ उच्च कोर्ट में अपील कर सकता है. 25 फरवरी को नीरव मोदी को भारत में प्रत्यर्पित करने के आदेश के दौरान लंदन के वेस्टमिंस्टर कोर्ट ने भारत सरकार के उस दावे को भी माना, जिसमें कहा गया है कि यह भगौड़ा कारोबारी गवाहों को धमकी दे रहा है और सबूत के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश कर रहा है.

क्या है यह मामला?

14 फरवरी 2018 को भारतीय बैंकिंग सेक्टर को तब झटका लगा, जब एक बिल्कुल नये तरीके से बड़े बैंक फ्रॉड का मामला सामने आया. उस दिन सरकारी क्षेत्र के पंजाब नेशनल बैंक (PNB) ने बताया कि मुंबई स्थिति उसके एक ब्रांच पर 11,400 करोड़ रुपये का फ्रॉड हुआ है. पीएनबी ने केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) के साथ शिकायत दर्ज कराया. पीएनबी ने अपनी शिकायत में कहा कि अरबपति हीरा कारोबारी ने कुछ अधिकारियों के साथ मिलकर फ़र्ज़ी बैंक गारंटी की मदद से इस फ्रॉड को अंजाम दिया.

नीरव मोदी ने कैसे इस फ्रॉड को अंजाम दिया?
बैंक ने कहा कि भारतीय बैंकों के विदेशी ब्रांचों से लेटर ऑफ अंडरटेकिंग्स (LoU) की मदद से पैसे निकाले गये. ये पैसे उन भारतीय बैंकों के हवाले से निकाले गये, जिनका संबंध नीरव मोदी और ​गीतांजली ग्रुप से था. LoU एक तरह का बैंक गारंटी होता है जो यह सु​निश्चित करता है कि अगर कंपनी या व्यक्ति डिफॉल्ट करता है तो इसे जारी करने वाला बैंक पैसे का भुगतान करेगा.

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पीएनबी फ्रॉड के अलावा, मोदी पर दो अन्य मामले चल रहे हैं. पहला तो 'सबूतों को गायब करने की कोशिश' और दूसरा 'गवाहों को डराने या उन्हें जान से मारने की धमकी' देना है. माना जा रहा है कि नीरव मोदी ने जनवरी 2018 में ही भारत छोड़ दिया था, जबकि पीएनबी ने इसके एक महीने बाद केस दर्ज कराया है. मार्च 2019 में नीरव मोदी को लंदन से गिरफ्तार किया गया था.



क्या है महुल चोकसी की भूमिका?

पीएनबी स्कैम में नीरव मोदी के अलावा उसका मामा मेहुल चोकसी भी प्रमुख आरोपी है. चोकसी ने भी फरवरी 2018 के आसपास भारत छोड़कर भाग गया था. बाद में मेहुल चोकसी को एक खास प्रोग्राम के तहत एंटीगुआ और बारबूडा की नागरिकता मिल गई. इस प्रोग्राम के तहत व्यवस्था है कि अगर कोई व्यक्ति यहां पर बड़ी रकम निवेश करता है तो उन्हें व्यक्तिगत नागरिकता मिल सकती है. प्रवर्तन निदेशालय के हालिया चार्जशीट से पता चलता है कि चोकसी ने एक संगठित रैकेट के तहत भारत, दुबई और अमेरिका में ग्राहकों और बैंकों को धोखा देने की साजिश की है. हालांकि, चोकसी का दावा है कि उसने मेडिकल कारणों से भारत छोड़ा है. जबकि जांच एजेंसियों का कहना है कि चोकसी ने गिरफ्तारी की डर से भारत छोड़ा है.

पीएनबी फ्रॉड मामले में दूसरा प्रमुख आरोपी मेहुल चोकसी


क्या पीएनबी अपने नुकसान की भरपाई कर चुका है?

अप्रैल 2020 में मनीकंट्रोल के साथ एक एक्सक्लुसिव इंटरव्यू में पंजाब नेशनल बैंक के प्रबंध निदेशक और सीईओ मल्लिकार्जुन राव ने कहा कि नीरव मोदी स्कैम में पीएनबी ने कुछ खास रिकवरी नहीं की है. राव ने कहा, 'अभी तक कुछ भी नहीं, यह जरूर है कि हाल ही में सीबीआई ने 1,000 करोड़ रुपये की संपत्ति ज़ब्त की है. उन्होंने हमें अनुमति दी है कि इन संपत्तियों की बिक्री के लिए हम कोर्ट में आवेदन करें. हमनें यह कर भी दिया है. लेकिन नीलामी से पहले हमें कुछ कानूनी बाध्यता से निपटना होगा.' हालांकि, राव ने यह भी कहा कि बैलेंस शीट पर इसके असर को दुरुस्त कर दिया गया है क्योंकि हमने नुकसान की पूरी भरपाई कर दी है.

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पीएनबी फ्रॉड को लेकर किसपर आरोप लगाया जा सकता है?

कई बार कहा जा चुका है कि टेक्नोलॉजी की वजह से ही पीएनबी जैसे फ्रॉड संभव हो सका है. ऐसा कहने वालों की दलील है कि SWIFT सॉफ्टवेयर और कोर बैंकिंग में इंटीग्रेशन की कमी से यह धोखाधड़ी संभव हो सकी है. इस फ्रॉड के बाद भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने नियमों को कड़ा करते हुए बैंकों से कहा कि वे इस समस्या से जल्दी निपटें. लेकिन, टॉप बैंकर्स का कहना है कि पहले की व्यवस्था और नियमों के अनुपलान में विफलता ने इस फ्रॉड में अहम भूमिका निभाई है. कई वर्षों से इसपर ध्यान नहीं दिया गया है.

इस पूरे मामले में एक बात तो तय मानी जा रही है कि एलओयू के जरिए होने वाले लेनदेन को मॉनिटर करने में पीएनबी शुरू से ही फेल हुआ है. इस फ्रॉड की शुरुआत 2011 से हुई थी. आम लोगों के बीच इस फ्रॉड के बारे में जानकारी आने से पहले तक बैंक इन सभी पेमेंट को पूरा करता रहा था.

पीएनबी के स्तर पर क्या चूक हुई?

पीएनबी मामले में आरोपी बैंक अधिकारियों द्वारा इस्तेमाल किए गए ​SWIFT मैसेजिंग प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया गया था. इसे ब्रांच मैनेजर की ओर से हर रोज चेक किया जाना चाहिए. किसी भी बैंक में यह अनिवार्य है. इसके बाद भी ब्रांच मैनेजर को हर रोज अपने ब्रांच पर होने वाले इनकम और खर्च का मिलान करना होता है. ब्रांच में एक अधिकारी की जिम्मेदारी होती है कि वो किसी भी संदेहात्मक लेनदेन पर नज़र रखे. इस तरह के फ्रॉड के बारे में ऐसे भी जानकारी जुटाई जा सकती है. अपनी ओर इस चूक के बाद भी पीएनबी ने लगातार इस बात पर जोर दिया कि SWIFT सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी की वजह से यह फ्रॉड संभव हो पाया है. पीएनबी ने यह भी कहा कि कोर बैंकिंग सिस्टम यानी सीबीएस सभी ​कनेक्शन टूटने की वजह से ऐसा हुआ.



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रेगुलेटर का रिएक्शन क्या रहा?

पीएनबी फ्रॉड के सामने आने के बाद झटपट कार्रवाई के तहत आरबीआई ने सभी एलओयू को टर्मिनेट कर दिया. इसके पहले आरबीआई को इस फ्रॉड के बारे में कोई भनक नहीं लगी थी. जब इस फ्रॉड के सामने आने के बाद रेगुलेटर पर सवाल उठने लगे तो उसने LoU को लेकर कार्रवाई की. आयातकों और निर्यातकों द्वारा LoU का इस्तेमाल किया है. वो इसे इसलिए इस्तेमाल करते हैं क्यों​कि उनके लिए यह एक सस्ता इंस्ट्रूमेंट होता है. लेकिन आरबीआई ने इस पर विचार किए बिना ही बैन कर दिया.

कुल मिलाकर पीएनबी फ्रॉड एक ऐसा फाइनेंशियल क्राइम नहीं है, जिसे केवल दो ​कारोबारियों ने ही अंजाम दिया. इस मामले ने भारतीय बैंकों के रिस्क मैनेजमेंट इन्फ्राट्रक्चर की खामियों को उजागर किया है. यह भी सामने आया है कि किसी भी प्रभावी व्यक्ति द्वारा मिलीभगत के साथ बैंक अधिकारी ही बैंकों को धोखा दे सकते हैं. हालांकि, भविष्य में ही यह पता चल सकेगा कि क्या नीरव मोदी के प्रत्यर्पण से इस फ्रॉड में हुए नुकसान की कितनी भरपाई होती है.
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