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नए शिखर पर: मेघालय राज्य बनने के 50 साल!

मेघालय बायोडायवर्सिटी बोर्ड के मुताबिक, संरक्षित हरित क्षेत्र या जंगल लगभग 9000 हेक्टेयर भूमि क्षेत्र में फैला है.

मेघालय बायोडायवर्सिटी बोर्ड के मुताबिक, संरक्षित हरित क्षेत्र या जंगल लगभग 9000 हेक्टेयर भूमि क्षेत्र में फैला है.

असल में मेघालय का नाम 3 जनजातियों खासी, गारो और जयंतिया से जुड़ा है. इन तीन जनजातियों के नाम पर 3 पहाड़ियां भी हैं. यहा ...अधिक पढ़ें

    हाइलाइट्स

    सबसे पहले भूगर्भवेत्ता एस.पी. चटर्जी ने 1936 में मेघालय नाम दिया था.
    मेघालय को राज्य का दर्जा 21 जनवरी, 1972 को मिला.
    मेघालय में 79 से ज्यादा संरक्षित वन हैं.

    यहां है कुछ अनजाने तथ्य: मेघालय का नाम यहां के लोगों ने ही चुना था.

    मेघालय (मेघों का घर) बादलों का घर
    कुछ अनजाने तथ्यों के बारे में जानें: मेघालय नाम खुद वहां के लोगों ने चुना था. यह ऐसा नाम नहीं है जो उनकी विरासत और इतिहास से जुड़ा हो. जैसा कि राजस्थान (राजपूतों) और तमिलनाडु (तमिल). न ही यह ऐसा नाम है जो भौगोलिक स्थिति बताता हो. जैसे कि उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश. इस नाम के साथ कोई पौराणिक कहानी भी नहीं जुड़ी है. जैसे कि हरियाणा (हरि और आना) या तेलेगाना (त्रिलिंग). असल में यह तीन जनजातियों खासी, गारो और जयंतिया से जुड़ा है. इन तीन जनजातियों के नाम पर 3 पहाड़ियां भी हैं.

    इस पहाड़ी प्रदेश के लोगों की ख्वाहिश थी कि उनके राज्य का नाम भी उतना ही खूबसूरत हो जितना कि यह इलाका है. प्रदेश की हरियाली को देखकर लोगों को जैसी खुशी और ताज़गी मिलती है वैसा ही इसका नाम हो: हरियाली से भरपूर, दूर तक फैले हरे पहाड़ और उनके ऊपर बादलों से घिरा आसमान. भारत के इस हिस्से को देखकर सबसे पहले भूगर्भवेत्ता एस.पी. चटर्जी ने 1936 में यह नाम दिया था. मेघालय को राज्य का दर्जा 21 जनवरी, 1972 को मिला. राज्य का दर्जा पाने के लिए असम सरकार और भारत सरकार से लगभग 22 साल तक बातचीत और समझौतों का दौर चला था.

    यहां मेघालय के बारे में कुछ कम चर्चित तथ्य हैं: मेघालय राज्य के तौर पर अस्तित्व में आने से पहले असम का हिस्सा था. हालांकि, मेघालय के लोगों को हमेशा लगता था कि असम के मैदानी हिस्सों से उनकी संस्कृति बेहद अलग है. उनकी क्षेत्रीय और सांस्कृतिक पहचान भी अलग है. यहां के स्थानीय निवासी असम से विधानसभा की सीटों या संसाधनों के लिए नहीं लड़ना चाहते थे. स्थानीय लोग न ही किसी तरह का सांस्कृतिक टकराव चाहते थे. ये लोग अपनी पहचान और संस्कृति बचाए रखना चाहते थे.

    राज्य का दर्जा पाने के ऐतिहासिक 50वें वर्ष में एक नजर डालते हैं उनकी संस्कृति पर, जो वाकई में बहुत अलग और विशिष्ट है.

    इको टूरिज्म के दौर में सफाई का मॉडल गांव: मौन्निलोंग गांव
    अगर आपने मौन्निलोंग के बारे में सुना है, तो यह भी जरूर सुना होगा कि 2003 में डिस्कवर मैगजीन ने इसे एशिया का सबसे साफ गांव बताया था. इस छोटे से सुंदर गांव में नोहवेट लिविंग रूट ब्रिज है. यहां से पड़ोसी बांग्लादेश के सुंदर नजारे दिखते हैं. हालांकि पर्यटकों के यहां आने की सबसे बड़ी वजह एशिया के सबसे साफ गांव के बारे में जानने की उत्सुकता है.

    मौन्निलोंग के लोगों के लिए साफ-सफाई उनकी जिंदगी और पहचान का हिस्सा है. हर घर में शौचालय की सुविधा है और हर मोड़ पर बांस से बने डस्टबिन हैं. इस गांव में प्लास्टिग बैग के इस्तेमाल पर पाबंदी है और धूम्रपान करने की मनाही है. गांव की सफाई का जिम्मा भी ग्रामीणों पर है. सबकी ड्यूटी तय है और रोटेशन के आधार पर सफाई का काम करना होता है. गांव में पेड़ों से गिरने वाले पत्तों को भी लोग उठाकर बांस से बने डस्टबिन में डालते हैं.

    इतना ही नहीं, मौन्निलोंग के लोगों ने कम्पोस्ट करके खाद बनाने और पौधे लगाने को भी अपनी जीवनशैली में शामिल किया है. इस गांव में सड़क किनारे पौधों से खर-पतवार हटाना और उन्हें पानी देना, लोगों को गलियों को सफाई करते देखने का नजारा बहुत आम है. खास बात यह है कि लोग यह सब कुछ अपनी खुशी से करते हैं किसी बंदिश के तहत नहीं.

    अगर आप यह गांव घूमना चाहते हैं, तो सारी जानकारी पाएं यहां.

    महिलाओं के पास विरासत: मातृसत्तात्मक समाज
    मेघालय की तीन मुख्य जनजातियों (गारो, खासी और जयंतिया) के बीच मातृसत्तात्मक सामाजिक संरचना है. इस व्यवस्था के तहत, परिवार की सबसे छोटी बेटी को खड्डुह कहा जाता है. छोटी बेटी को पैतृक संपत्ति विरासत में मिलती है. साथ ही, शादी के बाद बेटियां नहीं बल्कि दामाद ससुराल में रहते हैं. इतना ही नहीं बच्चों के नाम के साथ भी मां का सरनेम ही लगाया जाता है. कोई महिला अपनी पसंद या सुविधा से दूसरी शादी कर सकती है और समाज में इसे लेकर किसी तरह की रुढ़िवादी सोच नहीं है. खास बात यह है कि इसे दुनिया की सबसे बड़ी मातृसत्तात्मक समाज व्यवस्था में से एक के तौर पर गिना जाता है.

    अब कुछ दिलचस्प तथ्यों पर ध्यान देते हैं: जैसा कि हमने समझा कि यह मूल रूप से मातृसत्तात्मक समाज है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि पूरी तह से महिलाएं ही यहां सत्ता की नियामक हैं. अब आप सोच सकते हैं कि इन दोनों बातों में विरोधाभास है और इसका क्या मतलब हुआ? चलिए फिर हम आपको आसान भाषा में सब समझाते हैं. संपत्ति और परिवार पर औरतों का हक है और बच्चों के नाम के साथ भी मां का ही उपनाम जुड़ता है. इसके बाद भी ऐसा नहीं है कि हर घर में और हर जगह आपको माताएं ही घरों की मुखिया के तौर पर दिखेंगी. ऐसा भी नहीं है कि नेतृत्व वाली सारी जगहों पर औरतें ही स्वाभाविक तौर पर दिखेंगी या उन्हें ही पद मिलेगा. इसमें कोई दो राय नहीं है कि महिलाएं नेतृत्व कर रही हैं, लेकिन उन्हें यह सिर्फ उत्तराधिकार या स्वाभाविक तौर पर नहीं मिल रहा है. जब ऐसा हो रहा है, तो यह सवाल भी उठना लाज़िमी है कि क्या इससे लैंगिक समानता का स्तर बेहतर हुआ है? क्या यह ऐसा समाज है जिसमें लिंग की सीमाओं से परे जाकर एक-दूसरे की सराहना हो रही है? हमारा मानना है कि ऐसा हुआ है. मेघालय में महिलाओं की भागीदारी हर ओर दिखती है. भारत के दूसरे राज्यों की तुलना में मेघालय में महिलाओं की भागीदारी और भूमिका ज़्यादा बेहतर तरीके से नज़र आती है.

    प्रबंधन, मालिकाना हक नहीं: सस्टेनेबल चीजों के साथ जीने की आदत
    एक बार यह सोचें कि लिविंग रूट ब्रिज (नदी किनारे लगे पेड़ों से बना रास्ता) बनाने के लिए क्या चाहिए: आप जिस नदी को पार कर दूसरी तरफ़ जाना चाहते हैं उसके किनारे में आपको पौधे लगाने होंगे. फिर आपको कुछ सालों का इंतज़ार करना होगा, जब तक कि पेड़ बढ़कर निश्चित आकार के न हो जाएं. एक दशक बाद आप उन पेड़ों की जड़ों और दूसरे हिस्सों को बढ़ते देखते हैं और फिर बांस की मचान बुनते हैं. इन्हें पेड़ों के सहारे जोड़ते हैं. फिर इनके मज़बूत होने का इंतज़ार करते हैं, ताकि उन पर चढ़कर आप उस पार पहुंच सकें. यह पूरी प्रक्रिया कितनी जटिल और लंबी लग रही है.

    इतना तो आप समझ ही गए होंगे कि यहां के लोगों को मेहनत करने से बिल्कुल भी परहेज़ नहीं है और यह दशकों तक बिना फल की उम्मीद किए मेहनत करते हैं. यह प्रकृति के लिए भी उनका प्रेम है. आप भी यह समझ रहे होंगे कि इन पुलों को बनाने की शुरुआत करने वाले लोग शायद ही कभी इन्हें पारकर दूसरी ओर जाते होंगे. यह अपने आप में कितनी अद्भुत और रोमांचित करने वाली बात है. इस समुदाय के लोग सिर्फ़ आज और अपने बारे में नहीं सोचते हैं. यह प्रबंधन का एक तरीका है – इस धरती से जो कुछ उन्हें मिला है उसे धरती को लौटाना, ताकि पृथ्वी की समृद्धि और हरियाली में कोई कमी न आए. यह प्रकृति के लिए लगाव और प्रेम है, जिसे दौलत से नहीं तौला जा सकता है.

    मेघालय के लोगों में प्रकृति संरक्षण की संस्कृति है, जिसे वे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक परंपरा के तौर पर पहुंचाते हैं. दुनिया भर के कई दूसरे आदिवासी समुदायों की तरह वह भी अपने-आप को प्रकृति से जोड़कर देखते हैं. यह मेघालय के स्थानीय लोगों को दुनिया से अलग बनाने के लिए काफी है. मेघालय के लोग खुद को बड़े पारिस्थितिकी तंत्र के हिस्से के रूप में देखते हैं. स्थानीय जनजातियां यह मानती हैं कि प्रकृति की संरक्षक भी वही हैं और उसका शोषण करने वाले भी वही हैं. यह सोच मेघालय के लोगों के जनजीवन और संस्कृति में ही नहीं सरकारी नीतियों में भी नज़र आता है.

    मेघालय की चर्चित चीजों में से एक UNESCO’s Biosphere Reserves – Nokrek National Park भी है. इसे साल 2009 में यूनेस्को की सूची में जोड़ा गया था. कई और पार्क और वन्यजीव अभयारण्य भी यहां मशहूर हैं. जैसे कि बालपक्रम राष्ट्रीय उद्यान, बाघमारा पिचर प्लांट वन्यजीव अभयारण्य, नोंगखिलेम वन्यजीव अभयारण्य, सिजू वन्यजीव पक्षी अभयारण्य और जीवित वनस्पति संग्रहालय वगैरह.

    IRS Resources at-2 LISS III सैटेलाइट डेटा, नवंबर 2017 से जनवरी 2018 के दौरान के आंकड़ों के आधार पर, राज्य में 17,118.79 स्क्वॉयर किमी. जंगल क्षेत्र हैं. यह राज्य के भौगोलिक क्षेत्र का 76.32% हिस्सा है. वन और पर्यावरण मंत्री, लहकमेन रिंबुई ने कहा, “सरकार के अधिकार क्षेत्र में आने वाला जंगल का हिस्सा सिर्फ 5 प्रतिशत है. बाकी का पूरा जंगल स्थानीय समुदाय और जिला परिषदों के अधिकार क्षेत्र में आता है.”

    विकास और परंपरा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं: आदिवासी पहचान और संस्कृति का संरक्षण
    1971 का मेघालय भूमि हस्तांतरण (विनियमन) कानून आदिवासी समुदाय की जमीनों की सुरक्षा के उद्देश्य से बनाया गया है. यह जनजातियों की जमीन को बाहरी ताकतों के कब्जे से रक्षा करता है. आदिवासी स्वामित्व वाली जमीन, गैर-आदिवासी को बेचने या अधिग्रहण से रोकती है. यह कानून जनजातीय पहचान को सुरक्षित करता है और प्रकृति को भी संरक्षित करता है. साथ ही, बाहरी ताकतें, आदिवासियों का शोषण न कर सके, इसके लिए भी काम करता है. स्थानीय परंपराएं भी जंगल वाली ज़मीन को बेचने से रोकती हैं. यह भी दिलचस्प है कि स्थानीय जनजातियों की मान्यताएं भी प्रकृति संरक्षण को बढ़ावा देने वाली हैं.

    मेघालय बायोडायवर्सिटी बोर्ड के मुताबिक, संरक्षित हरित क्षेत्र या जंगल लगभग 9000 हेक्टेयर भूमि क्षेत्र में फैला है. यहां 79 से ज्यादा संरक्षित वन हैं. इन वन क्षेत्रों के बारे में स्थानीय लोगों की मान्यता है कि इन जंगलों की रक्षा खुद वन देवता ही करते हैं. इन देवताओं को ‘रंगकेव’, ‘बासा’ या ‘लबासा’ के नाम से जाना जाता है. स्थानीय मान्यता है कि देवताओं ने जंगल से कुछ भी लेकर जाने पर रोक लगाई है. – चाहे वह कंकड़ हो, पेड़ का लट्ठा हो या एक पत्ता भी क्यों न हो! आप समझ सकते हैं कि जंगलों को बनाए रखने और उनके विकास के लिए ये मान्यताएं कितनी उपयोगी साबित हुई हैं. इसने जैव विविधता को भी बचाया है और इन जंगलों में कई लुप्तप्राय और दुर्लभ पौधों की प्रजातियां मिलती हैं. (शिलांग से मात्र 25 किमी की दूरी पर स्थित मावफलांग संरक्षित हरित क्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जाना जाता है. यह एक चर्चित पर्यटन स्थल और शैक्षिक केंद्र भी है.

    इन तथ्यों को जानने के बाद अगर आप सोच रहे हैं कि यहां की स्थानीय जजनजातियां वक्त के साथ आगे नहीं बढ़ पाई हैं, तो ऐसा नहीं है. मेघालय के हस्तशिल्प अब दुनिया भर में जाने जाते हैं. महिलाओं के नेतृत्व वाली सहकारी समितियां और स्वयं सहायता समूह आज दुनिया भर में हैंडीक्राफ़्ट प्रोडक्ट का निर्यात कर रही हैं. इन कार्यक्रमों से स्थानीय लोगों को रोज़गार भी मिला है और उनकी आय भी बढ़ी है. लाकाडोंग हल्दी को लोकप्रिय बनाने का श्रेय भी इसी समुदाय को जाता है. लाकाडोंग में करक्यूमिन की बहुत अच्छी मात्रा होती है और इस खूबी ने इसे दुनिया भर में सुपरफूड की पहचान दी है. लाकाडोंग की पैदावार आदिवासी संस्कृति से की जाने वाली पारंपरिक खेती का ही नतीजा है. इसके लिए विशेष देखभाल की ज़रूरत होती है. इस उत्पाद को दुनिया भर तक पहुंचाने में स्वयं सहायता समूहों की बड़ी भूमिका रही है.

    निष्कर्ष
    मेघालय राज्य में ही कुछ बात है और यहां के लोग भी करिश्माई हैं. इस सुंदर प्रदेश के बारे में ऑनलाइन भी बहुत कुछ जान सकते हैं, लेकिन वहां जाकर इस संस्कृति और प्राक़ृतिक सौंदर्य को अपनी आंखों से देखने का सुख ही कुछ और है. अगर आपने आज तक भारत के इस सुंदर हिस्से का भ्रमण नहीं किया है, तो यही मौका है. राज्य बनने के 50 साल पूरे होने की खुशी में पूरे साल उत्सव का माहौल रहेगा. इससे बेहतर समय इस प्रदेश को घूमने का नहीं हो सकता.

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    यह पार्टनर्ड पोस्ट है.

    Tags: Business news, Business news in hindi, Meghalaya

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